रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India )

किसी भी अर्थव्यवस्था के मौद्रिक मौद्रिक संतुलन के लिए केंद्रीय नियंत्रण की आवश्यकता होती है। यह  नियंत्रण उस अर्थव्यवस्था के केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित होता है। यहां अर्थव्यवस्था से तात्पर्य किसी देश की भौगोलिक और राजनीतिक सीमा के अंतर्गत आने वाली अर्थव्यवस्था से है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत के केंद्रीय बैंक की भूमिका निभाता है। इस ब्लॉक में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बारे में हम संक्षिप्त जानकारी लेंगे।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

👍1913 चैंबर्लिन आयोग द्वारा भारत में केंद्रीय बैंक की सिफारिश की गई।

👍1927 हिल्टन यंग आयोग द्वारा भारत में केंद्रीय बैंक की सिफारिश की गई।

👍1933 गोलमेज सम्मेलन में भारत को राजनीतिक अधिकार के साथ-साथ केंद्रीय बैंक स्थापित करने का भी निर्णय किया गया।

👍1934 भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया गया ।

👍1935 रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को स्थापित किया गया

पूंजी


*शुरू में आरबीआई की पूंजी ₹5 करोड़ थी जो 100-100 रुपए के 500000 अंशों में  विभक्त थी।इसमें 40% के करीब शेयर केंद्र सरकार के थे बाकी निजी अंशधारकों के पास थे।

👍आरबीआई का राष्ट्रीयकरण- 1 जनवरी 1949

प्रबंध संचालन

☺कुल सदस्य 20

 जिसमें 

*गवर्नर- 1

*डिप्टी गवर्नर 4 

*वित्त मंत्रालय का सरकारी अधिकारी - 1

*भारत सरकार द्वारा मनोनीत संचालक -10 

*स्थानीय बोर्ड के संचालक - 4

* मुख्य कार्यालय -मुंबई 

कार्य

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कार्य को तीन भागों में बांटा जा सकता है 

1 केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य 

इसके अंतर्गत बैंक की भूमिका व्यापक रूप में होती है 

👍यह नए नोटों का निर्माण करता है।

👍सरकार के बैंक के रूप में कार्य करता है ।

👍यह देश के सभी बैंकों के बैंक के रूप में और संकटकाल में अंतिम ऋण दाता के रूप में भूमिका निभाता है ।

👍यह सरकार द्वारा निर्धारित दरों पर विदेशी विनिमय का क्रय विक्रय करता है।

👍मौद्रिक नीति के अंतर्गत साख नियंत्रण के लिए किए जाने वाले उपाय परिमाणात्मक नियंत्रण और गुणात्मक नियंत्रण दोनों ही इसके द्वारा किए जाते हैं 

अन्य कार्य 

👍आर्थिक आंकड़े और सूचनाएं इकट्ठा करता है।

👍मुद्रा का हस्तांतरण करता है ।

👍निर्यात को प्रोत्साहन देता है ।

👍और बैंकिंग शिक्षा से संबंधित कार्य करता है।

2 साधारण बैंकिंग से संबंधित कार्य 

👍निक्षेप स्वीकार करना- इसके अंतर्गत बैंक सरकार की ओर से निक्षेप को स्वीकार करता है इसके अतिरिक्त अन्य बैंकों के निक्षेप को भी स्वीकार करता है।

👍वाणिज्यिक बिलों का क्रय विक्रय करता है।

👍श्रेणी की प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय  करता है ।

👍सरकार के लिए आईएमएफ वर्ल्ड बैंक एशियन डेवलपमेंट बैंक से ऋण प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

👍मूल्यवान धातुओं का क्रय विक्रय करना  करता है ।

👍कृषि बिलों का क्रय विक्रय करता है ।

3 विकास से संबंधित कार्य

इसमें बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार, कृषि से संबंधित ऋण उपलब्ध कराना ,उद्योगों को साथ उपलब्ध करना, कीमत स्तर में स्थिरता बनाए रखना शामिल है।

आरबीआई द्वारा किए गए कार्यों का मूल्यांकन

👍वित्तीय समावेशन( financial inclusion )ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार किया गया ।

👍Cach benefit transfer  द्वारा वृद्धा पेंशन ,किसान सम्मान निधि योजना, विधवा पेंशन इत्यादि के अंतर्गत सरकारी सुविधाओं को जनता तक पहुंचाया गया| 

👍सस्ती मौद्रिक नीति द्वारा मूल्य स्थिरता को बनाए रखते हुए साख सृजन का कार्य किया गया।

👍COVID-19 के कारण मौद्रिक नीति के अंतर्गत जो परिमाणात्मक निर्धारित दरें हैं उनको स्थिर या कम करने का प्रयास किया गया।

👍सार्वजनिक ऋण ,सरकारी कोषों की सुरक्षा और सरकार की ओर से किए जाने वाले लेनदेन में इसका अच्छा सहयोग रहा।

👍कृषि से संबंधित अल्पकालीन और दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराने में इसने महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

👍वर्तमान में बहुत से बैंकों में हुए घोटालों के कारण जो क्षति हुई उन बैंकों के उत्थान के लिए उनका विलय अन्य  बैंकों में इसके द्वारा किया गया।

👍बैंक घोटालों और उसकी गैर निष्पादित संपत्तियों में वृद्धि को देखते हुए बैंकों की नई शाखाओं को खोलने पर आरबीआईद्वारा रोक लगा दिया गया ।

👍कुछ बैंक जो अपनी अच्छी साख और जमा के कारण लाभ की स्थिति में है उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए निजी स्वामित्व का रूप दे दिया गया।

चुनौतियां 

बैंकों की बढ़ती देनदारियों और ऋणों की वसूली आरबीआई के सामने सबसे बड़ी समस्या है।महामारी से जुझती अर्थव्यवस्था महंगाई के साथ-साथ सुस्त हो गई है। ऐसे में बैंक अपनी वनइंडिया बैंकिंग सिस्टम के अंतर्गत बैंकों का विलय कर रहा है ताकि आरबीआई द्वारा बनाए गए नियमों को अच्छे तरीके से बैंकों पर लागू किया जा सके और उन पर बेहतर नियंत्रण और निगरानी हो सके। वर्तमान संकट से निकलना आरबीआई और सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।☺☺



currency manipulation (मुद्रा हेरफेर)

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में द्विपक्षीय सौदों के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसी मुद्राएं कठोर मुद्रा( Hard currency )की श्रेणी में आती हैं ।
कठोर मुद्राओं से आशय ऐसी मुद्रा से है जिसे क्रय कर किसी देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर के भुगतान में उपयोग किया जाता है ऐसी मुद्राएं कठिनाई से प्राप्त की जाती हैं।

डॉलर उसी मुद्रा में से एक है यानी कठोर मुद्रा है जिसे अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए प्रत्येक देश द्वारा अपने पास रखना होता है ।

बात करते हैं करेंसी मैनिपुलेशन की यानी मौद्रिक हेरफेर की 
 
इसके अंतर्गत किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा कृत्रिम तरीके से अपने देश की मुद्रा का अवमूल्यन कर दिया जाता है जिससे विदेशी विनिमय बाजार में डॉलर की कमी दिखाकर अपने देश के निर्यात को बढ़ाया जा सके।
 
किसी देश द्वारा अपने मुद्रा के अवमूल्यन के पीछे एक कारण होता है निर्यात को प्रोत्साहन देना और आयात को हतोत्साहित करना ।

इसे ऐसे समझते हैं 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय बाजार में यदि आरबीआई यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत का केंद्रीय बैंक रुपया को डॉलर की तुलना में कम कर देता है तो भारत की वस्तु जो अमेरिका में बेची जाती है यानी जिनका  निर्यात अमेरिका में किया जाता है उन वस्तुओं को क्रय करने के लिए अमेरिकी लोगों को कम पैसे  डॉलर में देने पड़ते हैं। इसीलिए वह वस्तुओं के क्रय की मात्रा बढ़ा देते हैं जिससे भारत का निर्यात बढ़ जाता है दूसरे  अर्थ में भारतीय वस्तुएं उनके लिए सस्ती हो जाती हैं।

इसके विपरीत अमेरिका से कोई वस्तु जब भारत आया की जाती है तो उस वस्तु को भारतीय लोगों को खरीदने के लिए ज्यादा रुपया देना पड़ता है क्योंकि रुपए का मूल्य आरबीआई के द्वारा अंतरराष्ट्रीय विनिमय मुद्रा बाजार में कम कर दिया जाता है अर्थात अमेरिकी वस्तुएं जो भारतीय लोगों के द्वारा खरीदी जाती हैं वह महंगी पड़ती हैं जिससे भारतीय उन वस्तुओं को कम मात्रा में खरीदते हैं इस प्रकार आयात को हतोत्साहित किया जाता है।

अब चलते हैं करेंसी मैनिपुलेटर के तरफ जिसके श्रेणी में भारत को अमेरिका द्वारा रखा गया है या अमेरिकी सरकार के ट्रेजरी डिपार्टमेंट द्वारा दिया जाने वाला एक लेबल है जिसका प्रयोग अमेरिका अपने व्यापारिक देशों पर करता है उसे ऐसा लगता है कि किसी देश द्वारा अपनी मुद्रा का अंतरराष्ट्रीय विनिमय मूल्य  जानबूझकरकम  कर दिया गया है जिसका लाभ उस देश को डॉलर की तुलना में ज्यादा होता है और अमेरिकी निर्यात घट जाता है।

इसमें उस देश के एक वित्तीय वर्ष के व्यापार अधिशेष जुड़ी थी और विदेशी मुद्रा भंडार को शामिल किया जाता है।

निर्धारित मापदंड

*1 अमेरिका के साथ व्यापार करने वाले देश का ट्रेड सरप्लस 20 अरब डॉलर  या उससे अधिक हो दूसरे शब्दों में उस देश का निर्यात आयात की तुलना में अधिक हो जो 20 अरब डॉलर  या उससे ज्यादा हो .

2 उस देश का करंट अकाउंट सर प्लस उसके जीडीपी का 2% या उससे ज्यादा हो और

3 उस देश के द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार की खरीद की मात्रा जीडीपी के 2% या उससे ज्यादा हो।


उपरोक्त मापदंडों में से किसी दो मापदंड को पूरा करने पर वह देश करेंसी मैनिपुलेटर की श्रेणी में आता आ जाता है 

करेंसी मैनिपुलेटर की श्रेणी में आने पर उस देश पर तात्कालिक कार्यवाही नहीं की जाती है लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसकी छबि कम होती है और आने वाले दिनों में डॉलर को प्राप्त करना उस देश के लिए कठिन होता है यानी डॉलर में खरीद मुश्किल होने से उस देश की मुद्रा मजबूत हो जाती है ।इसका निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है 

भारत को इस श्रेणी में रखने के कारण

☺भारत का ट्रेड सरप्लस 20 अरब $ से ज्यादा है 

☺विदेशी मुद्रा भंडार की खरीद 2 प्रतिशत से ज्यादा है

सुझाव

अमेरिकी हस्तक्षेप से बचने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में डॉलर के जगह अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का संचय करना चाहिए ।

साथ ही भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार यूरोप और अन्य एशियाई देशों के साथ यूरो और स्थानीय मुद्राओं में करना चाहिए इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अमेरिकी मुद्रा के प्रभुत्व को देखते हुए अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं का विदेशी संजय को इस अनुपात में रखना चाहिए कि अन्य देशों के साथ व्यापारिक भुगतान संतुलन से संबंधित समस्याएं न हो।


मौद्रिक नीति और आरबीआई के मौद्रिक नियंत्रण के उपकरण

भारतीय अर्थव्यवस्था में मौद्रिक प्रवाह और उसके  नियंत्रण का अधिकार देश के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ( RBI)को दिया गया है मौद्रिक और साख नियंत्रण का कार्य आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति द्वारा तय करती है यह ब्लॉग आरबीआई के मौद्रिक नियंत्रण के उपकरण से संबंधित है आइए चर्चा करते हैं
मौद्रिक नीति

किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह का नियंत्रण जिस विधि द्वारा किया जाए मौद्रिक नीति कहलाती है। 

मुद्रा के प्रवाह से तात्पर्य मुद्रा की मात्रा से है जो अर्थव्यवस्था में मौजूद करेंसी और साख की मात्रा से संबंधित होता है ।

किसी भी देश के आर्थिक विकास में उस देश के केंद्रीय बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उस देश के अंदर मुद्रा के प्रवाह के नियंत्रण का दायित्व भी उसी देश के केंद्रीय बैंक का होता है।

इसलिए हम कह सकते हैं कि मौद्रिक नीति से तात्पर्य देश के केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाए जाने वाले उन उपायों से है जिनके द्वारा अर्थव्यवस्था में करेंसी और साख की मात्रा को नियंत्रित किया जाता है.

*साख यानी उधार देने का कार्य वाणिज्यिक बैंकों द्वारा ज्यादा से ज्यादा लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है । इसलिए केंद्रीय बैंक उन बैंकों पर नियंत्रण रखता है और साख पर भी नियंत्रण रखता है जिससे मुद्रा का प्रसार या मुद्रा संकुचन की स्थिति उत्पन्न ना हो।

*साख नियंत्रण के लिए केंद्रीय बैंक आरबीआई द्वारा विभिन्न प्रकार की नीतियां अपनाई जाती हैं
 
1परिमाणात्मक साख नियंत्रण नीति 

 2 चयनात्मक साख नियंत्रण नीति 

1 परिमाणात्मक साथ नियंत्रण नीति

साख नियंत्रण की इस नीति में आरबीआई बैंकों के नकद कोसों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है जिससे साख नियंत्रण में सहायता मिलती है इसमें बैंक दर ,खुले बाजार की क्रियाएं ,परिवर्तनशील नकद आरक्षण और वैधानिक तरल कोष सम्मिलित होते हैं।

बैंक दर

 *बैंक दर वह दर है जिस पर आरबीआई अन्य बैंकों को अल्पकालीन ऋण देता है ।

 *यह ऋण बैंकों को दिन प्रतिदिन के नकद लेनदेन से संबंधित कार्यों के लिए होता है जिसे बैंक आरबीआई के पास अपनी प्रथम श्रेणी के प्रतिभूतियों को जमानत के रूप में रखकर प्राप्त करते हैं ।

*बैंक दर बढ़ जाने पर बैंकों के पास मुद्रा कम आती है जिससे बाजार में मुद्रा का प्रवाह साख के रूप में कम होता है । इसके विपरीत बैंक दर घट जाने पर बैंकों के पास मुद्रा अधिक आती है जिससे बाजार में मुद्रा का प्रवाह साख के रूप  में बढ़ जाता है.
 
*बैंक दर वह उपकरण है जिसके द्वारा बैंकों के साख नियंत्रण में मदद मिलती है.


खुले बाजार की क्रियाएं

खुले बाजार की क्रियाओं के अंतर्गत आरबीआई सरकारी प्रतिभूतियों का खुले बाजार में क्रय-विक्रय करता है इसके अतिरिक्त प्रथम श्रेणी के बिल और प्रतिज्ञा पत्र का भी प्रयोग करें करता है.
 
*जब आरबीआई इन प्रतिभूतियों को खुले बाजार में  क्रय करता है तो बैंक के पास नगद कोषों में वृद्धि होती है जिससे साख सृजन होता है और जनता के पास रुपया अधिक जाता 
है ।

*इसके विपरीत जब खुले बाजार में आरबीआई प्रतिभूतियों का विक्रय करता है तो बैंकों के पास नकद कोषों में कमी आती है क्योंकि इन प्रतिभूतियों को बैंकों को खरीदना आवश्यक होता है इसका परिणाम बैंकों के नकद कोष के कमी के रूप में होता है जिससे साख की मात्रा कम होती है और लोगों के पास  पैसा कम होता है.

परिवर्तनशील नकद आरक्षण कोष

इसके अंतर्गत बैंक अपने  मांग जमा और सावधि जमा दोनों का एक निश्चित भाग आरबीआई के पास जमा करता है।

 जब कभी आरबीआई को साख को कम करना पड़ता है तो वह नकद आरक्षण कोष को बढ़ा देता है और साख को अधिक करना पड़ता है तो वह नकद आरक्षण कोष को घटा देता है ।

नकद आरक्षण को  3 से 15% के बीच निर्धारित किया जा सकता है।

वैधानिक तरलता अनुपात

 इसके अंतर्गत व्यापारिक बैंकों को अपनी कुल संपत्ति के एक निश्चित भाग को तरल रूप में रखना होता है और यह अनुपात तरलता अनुपात कहलाता है।

*तरलता अनुपात में कमी या वृद्धि से साख सृजन पर प्रभाव पड़ता है। तरलता अनुपात में  वृद्धि का अर्थ है कि बैंकों को अपनी जमा को ऋण के रूप में ना देकर उसे सरकारी और अनुमोदित प्रतिभूतियों में लगाना पड़ता है जिससे साख का सृजन कम होता है और बैंक व्यापार और उद्योग जगत को ऋण और अग्रिम नहीं दे पाते हैं।
2 चयनात्मक साख नियंत्रण नीति

यह साख नियंत्रण की नीति सिर्फ चयनित क्षेत्रों में आरबीआई अपनाती है यानी अर्थव्यवस्था के किसी खास भाग में यदि साख नियंत्रण की आवश्यकता होती है तो उसी क्षेत्र में साख नियंत्रण की नीति अपनायी जाती है।
 

*कुछ विशेष वस्तुओं या प्रतिभूतियों को धरोहर के रूप में रखकर ऋण लेने पर आरबीआई ब्याज की दरों को ऊंची कर देता है । इनमें ऐसी वस्तुएं शामिल होती हैं जिनकी कालाबाजारी या जमाखोरी पर मूल्यों में वृद्धि कर दी जाती है जैसे चीनी ,तेल वनस्पति घी ,गुड़ इत्यादि।

*आरबीआई कृषि से संबंधित फसलों की आपूर्ति कीमतों की प्रवृत्ति के आधार पर अग्रिम की सीमा का  निर्धारण करता है इसके अतिरिक्त कृषि पर आधारित ऋणों की वसूली और उधार देने की सीमा के विस्तार के लिए वाणिज्यिक बैंकों को अनुमति देता है ।

*साख नियंत्रण के अंतर्गत आरबीआई चयनित क्षेत्र के साथ सीमा का निर्धारण करता है जिससे उस क्षेत्र में अति पूंजीकरण की स्थिति ना हो ।

*कुछ अन्य क्षेत्रों में ऋण देने पर प्रतिबंध लगाता है।

*आरबीआई परिपत्रों या सम्मेलन के माध्यम से बैंकों पर नैतिक दबाव बनाता है जो ऋण और अग्रिम में कमी के सुझाव के संबंध में होते हैं। 

*आरबीआई प्रत्यक्ष रूप से किसी वाणिज्यिक बैंक के विशेष लेनदेन की मना -ही कर सकता है।






भारत में बैंकिंग व्यवस्था का स्वरूप

पिछले  ब्लॉग में वाणिज्यिक बैंक के बारे में संक्षिप्त चर्चा की गई । वाणिज्यिक बैंक के पश्चात इस ब्लॉग में हम भारत में बैंकिंग व्यवस्था के स्वरूप की चर्चा करेंगे क्योंकि इसकी जानकारी के बिना अन्य जानकारियां अधूरी है। बैंकिंग स्वरूप को जानने के लिए हम इसे तीन काल खंडों में विभाजित करते हैं 

1 स्वतंत्रता से पहले (1947 से पूर्व )

2 स्वतंत्रता के पश्चात (1947 के बाद )

3 वर्तमान स्वरूप

1 स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले (1947 के पूर्व)

जेंसी हाउसेस की स्थापना आधुनिक बैंकिंग प्रणाली का पहला पड़ाव था ।यह अपने व्यवसाय के साथ-साथ जनता की जमानों को स्वीकार करते थे और जरूरत पड़ने पर जनता को यह व्यापार से संबंधित ऋण भी प्रदान करते थे ।शुरू में इन हाउसेज के पास पूंजी की कमी थी लेकिन धीरे-धीरे पूंजी बढ़ने के कारण इनके स्वरूप में परिवर्तन हुआ जिससे संयुक्त पूंजी वाले बैंकिंग प्रणाली का जन्म हुआ।
* उसके पश्चात तीन प्रेसिडेंसी बैंकों की स्थापना हुई जो आधुनिक बैंक थे

 1806 बैंक ऑफ कोलकाता ,कोलकाता 

1840 बैंक ऑफ़ मुंबई ,मुंबई 

1843 बैंक ऑफ़ मद्रास ,मद्रास

* यह बैंक ईस्ट इंडिया कंपनी के धन की आवश्यकता ओं को पूरा करने के लिए स्थापित किए गए और इन्हें निर्गमन का भी अधिकार दिया गया । 

*1921में इन तीनों बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का निर्माण किया गया ।

*ज्वाइंट स्टॉक बैंकिंग सिस्टम यानी संयुक्त पूंजी बैंकिंग प्रणाली के अंतर्गत अन्य बैंक जो स्थापित किए गए वह सीमित दायित्व के सिद्धांत पर आधारित थे।
 
इनकी संख्या 14 के करीब थी ।

*अवध कमर्शियल बैंक पूर्ण रूप से भारतीय प्रबंध द्वारा संचालित पहला बैंक था।

*1905 -1913 तक अन्य बैंक स्थापित हुए जिनमें बैंक ऑफ इंडिया ,पंजाब नेशनल बैंक ,सेंट्रल बैंक बैंक ऑफ बड़ौदा ,इलाहाबाद बैंक ,इंडियन बैंक, बैंक ऑफ मैसूर शामिल हैं।

*19 13 -17 के बीच बैंकों पर संकट आने के कारण बहुत सारे बैंक बंद हो गए ।

*1921 में कोलकाता ,मद्रास और मुंबई इन तीनों स्थानों के प्रेसिडेंसी बैंकों को एक कर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का निर्माण किया गया ।

*1926 में हिल्टन यंग कमीशन की सिफारिश पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम 1934 पारित किया गया और 1 अप्रैल 1935 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को स्थापित किया गया।

* रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को केंद्रीय बैंक से संबंधित कार्य सौपे गए।

2 स्वतंत्रताा के  पश्चात (1947 के बाद)

*स्वतंत्रता के पश्चात रिजर्व बैंक का 1 जनवरी 1949 को राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

*बैंकिंग कंपनियों के विसंगतियों को दूर करने के लिए भारतीय बैंकिंग नियमन अधिनियम 1949 पारित किया गया ।

*बैंकिंग नियमन अधिनियम 1949 के अंतर्गत आरबीआई को बैंकिंग संस्थाओं के नियम बनाने और नियंत्रण हेतु विस्तृत विस्तृत अधिकार दिए गए ।

*विकास बैंकों की स्थापना की गई जो एक ऋणदातृ  के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं जिनमें आईएफसीआई आईडीबीआई, आई सी आईसीआई ,एस एफ सी इत्यादि मुख्य हैं।

*सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण कर 1 जुलाई 1955 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया स्थापित किया गया।
*
 1959 को एसबीआई -1959 अधिनियम के अंतर्गत 8 अन्य एसबीआई के सहायक बैंक बनाए गए जिसमें एसबीआई बीकानेर और एसबीआई जयपुर का एकीकरण 1963 को होने के कारण इनकी संख्या 7 हो गई 

*सहकारी बैंकों की स्थापना 1954 में अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति की सिफारिशों पर किया गया जिसमें त्रिस्तरीय बैंकिंग संरचना है।

* क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना 1975 में शुरू की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में साख सुविधाएं पहुंचाने के लिए व्यापारिक बैंक द्वारा इनको स्थापित किया गया ।

*राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना 1982 को की गई।

 *ग्रामीण साख उनके नियमन और शोध एवं अनुसंधान कार्य द्वारा ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए इसे स्थापित किया गया था ।

*आयात निर्यात बैंक -1982 में इसे स्थापित किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए साख सुविधाएं प्रदान करना है।

3 वर्तमान स्वरूप

*वर्तमान स्वरूप को इस प्रकार वर्गीकृत करते हैं
* शीर्ष बैंकिंग संस्थाओं के अंतर्गत तीन संस्थाएं आती हैं 

क .रिजर्व बैंक

ख .राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक 

ग .आयात निर्यात बैंक
 

*अन्य बैंकिंग संस्थाओं में शामिल है

a वाणिज्यिक बैंक 

bसहकारी बैंक 

c भूमि विकास बैंक

d औद्योगिक विकास बैंक.

a वाणिज्यिक बैंक इसे भी तीन भागों में बांटा जाता है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ,निजी क्षेत्र के बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

*सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में स्टेट बैंक समूह और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक आते हैं.

b सहकारी बैंक इसकी संरचना त्रिस्तरीय होती है राज्य सरकारी बैंक, जिला सहकारी बैंक और प्राथमिक एवं समितियां इसके अंतर्गत आते हैं.

c भूमि विकास बैंक

 इसके अंतर्गत राज्य भूमि विकास बैंक और प्राथमिक भूमि विकास बैंक खाते हैं.

d औद्योगिक विकास बैंक

 इसे दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है जिसमें 

*अखिल भारतीय स्तर पर आईएफसीआई आईसीआईसीआई और आईडीबीआई आते हैं 

*और राज्य स्तर पर राज्य वित्त निगम और राज्य औद्योगिक विकास बैंक आते हैं.

दोस्तों कैसी लगी आज की पोस्ट कमेंट जरूर करें.










 

वाणिज्यिक बैंक एवं उसके कार्य

 आज हम भारत में बैंकिंग व्यवस्था के अंतर्गत वाणिज्यिक बैंक की बात करेंगे लेकिन उसके पहले बैंक शब्द के बारे में, बैंकिंग के बारे में संक्षिप्त जानकारी ले  लेते हैं

बैंक शब्द की उत्पत्ति

बैंक शब्द की उत्पत्ति इटालियन भाषा के Banco शब्द से हुई है फ्रांसीसी इसे Banke कहने लगे और आगे चलकर अंग्रेज Bank कहकर संबोधित करने लगे।
Bank शब्द की उत्पत्ति कहीं से भी हुई हो लेकिन इसकी उत्पत्ति यूरोपीय शब्द से ही मध्यकालीन यूरोप में हुई है।

बैंक की परिभाषा

सामान्य अर्थ में बैंक एक ऐसी संस्था है जो low rate of interest जमा स्वीकार करती है और high rate of interest  साख का सृजन करती है यानी उधार देती है। 
अर्थात वह संस्था जो मुद्रा जमा के रूप में स्वीकार करती है और साख सृजन का कार्य करती है कहलाती है
बैंक की परिभाषा विभिन्न विद्वानों द्वारा अलग-अलग तरह से दी गई है परंतु हम यहां विशेषकर भारत के संदर्भ में इसकी परिभाषा को देखेंगे जो भारतीय बैंकिंग अधिनियम के अंतर्गत परिभाषित है

बैंकिंग कंपनी अधिनियम 1949 के अंतर्गत

बैंकिंग कंपनी वह कंपनी है जो बैंकिंग का कार्य करती है ।

बैंकिंग से तात्पर्य जनता को उधार देने के लिए या विनियोग  के लिए जमा स्वीकार करना और मांग पर अथवा समय पूर्ण होने पर चेक द्वारा विकर्ष  द्वारा या आदेश द्वारा उनके भुगतान करने से है।

वर्तमान संदर्भ में बैंक से हमारा तात्पर्य वाणिज्यिक बैंक से है। यह हमारे जीवन का एक अंग बन गया है विशेषकर कोविड-19 के चलते हैं ।इस संक्रमण काल में सरकार से लेकर आम जनता तक के कार्यों में वाणिज्यिक बैंक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। चलिए वाणिज्यिक बैंक के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हैं-

वाणिज्यिक बैंक

वह बैंक जो लाभ के उद्देश्य से बैंकिंग का कार्य करते हैं वाणिज्यिक बैंक कहलाते हैं 

अर्थात यह लो रेट ऑफ इंटरेस्ट पर जमा स्वीकार करते हैं और हाई रेट ऑफ इंटरेस्ट पर साख यानी उधार का सृजन करते हैं इस प्रकार रेट ऑफ इंटरेस्ट के अंतर द्वारा ही इन्हें लाभ होता है.

उदाहरण के लिए मान लीजिए बैंक के बचत खाते में जमा राशि पर 3% का ब्याज देता है अब उसी राशि का कुछ भाग बैंक साख सृजन के लिए उपयोग करता है जो 5% है तो बैंक द्वारा प्राप्त लाभ 2% होगा।
वाणिज्यिक बैंक अनेक प्रकार के कार्य करते हैं जिन्हें तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

1 मुख्य कार्य 

2 पूर्ण कार्य 

3 सामाजिक कार्य

1 मुख्य कार्य

मुख्य कार्य में बैंक जमा है स्वीकार करना और साख यानी उधार देना सम्मिलित है। जमाए स्वीकार करने के अंतर्गत बैंक अपने यहां विभिन्न प्रकार के जमा की प्रकृति के अनुसार जनता के खाता खोलते हैं जिनमें जनता अपनी सुविधा के अनुसार रुपया जमा करती है. इन सुविधाओं के आधार पर बैंक अपने यहां निम्न प्रकार के खाते खोलते हैं

क ) बचत खाता

ख) चालू खाता

ग) सावधि जमा खाता

घ) आवर्ती जमा खाता

ङ) बुनियादी बचत खाता

क  बचत खाता

यह खाता हर प्रकार के बैंक में खोला जा सकता है जिस में जमा की एक न्यूनतम राशि प्रत्येक बैंक द्वारा अलग-अलग निर्धारित की जाती है जो  ₹1000 या उससे अधिक होती है । जनता द्वारा जो न्यूनतम राशि खाते में जमा की जाती है उस पर ब्याज बैंक द्वारा दिया जाता है या जो भी राशि बचत खाते में शेष होती है उस पर ब्याज की राशि बैंक देते हैं।
सुविधानुसार जनता इस बात  खाते में राशि जमा कर सकती है या निकासी कर सकती है । जमा और निकासी के लिए बैंक द्वारा मांग पर देय जमापत्र, चेक बुक या एटीएम कार्ड की सुविधा दी जाती है।

ख  चालू खाता

इस प्रकार के खाते की सुविधा बैंक द्वारा व्यवसायी या गैर व्यवसायिक संगठनों  (अनाथालय ,स्कूल, क्लब, अस्पताल ) को दिए जाते हैं। इसमें जमा की जाने वाली राशि की सीमा नहीं होती और जमा व निकासी प्रतिदिन कितनी बार भी की जा सकती है। इस पर पाबंदियां नहीं होती है। इसलिए व्यवसायिक संगठन इस खाते को ही खुलवाते हैं। बैंक द्वारा इन संगठनों  को ओवरड्राफ्ट की सुविधाएं दी जाती हैं । खाते में जमा और निकासी की सुविधाओं के लिए बैंक द्वारा एक निश्चित राशि प्रतिवर्ष ली जाती है।

ग  सावधि जमा खाता

इस खाते में जमा राशि एक निश्चित अवधि के लिए होती है जो 10 वर्ष तक की हो सकती है। प्रायः जमा कर्ता जो जोखिम नहीं उठाना चाहता है और जिसके पास अधिक राशि है वह अपनी राशि का कुछ हिस्सा बैंक के पास सावादी खाते में जमा कर देता है जिस पर बैंक द्वारा दिया गया  ब्याज उसके बचत खाते से अधिक होता है।

घ  आवर्ती जमा खाता

इस खाते के अंतर्गत बैंक द्वारा जमा करता से एक निश्चित राशि प्रतिमाह या एक निश्चित समय अंतराल पर 1 वर्ष के लिए या 5 वर्ष तक किया जाता है इस अवधि के पूर्ण होते ही जमा करता को यह राशि ब्याज समेत वापस कर दी जाती है।

ङ  बुनियादी बचत खाता

इस खाते की शुरुआत 2012 में आरबीआई के निर्देशानुसार किया गया था जिसे अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के अतिरिक्त विदेशी बैंकों द्वारा खोलने का निर्देश दिया गया . इसके अंतर्गत खाताधारक को जीरो बैलेंस पर खाता की सुविधा दी जाती है जिसमें न्यूनतम बैलेंस की कोई आवश्यकता नहीं है। इस खाते की सुविधा गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को ध्यान में रखकर दी गई . इस खाते से  निकासी की संख्या सीमित है . कोई भी व्यक्ति इस खाते से निकासी 1 महीने में 4 बार से ज्यादा नहीं कर सकता है. निकासी के लिए वह एटीएम या आधार संख्या का प्रयोग कर सकता है. आज ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक कॉरस्पॉडेंट द्वारा यह सुविधा जनता को दी जाती है जिसमें सरकारी योजना, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन ,किसान समृद्धि योजना के अंतर्गत दी जाने वाली राशि जनता को दी जाती है।

(B )जमाए स्वीकार करने के अतिरिक्त बैंक द्वारा साख निर्माण का कार्य किया जाता है। यह अपने प्रारंभिक जमा से अधिक राशि उधार देते हैं और साख का निर्माण करते हैं.

(C) ऋण देना बैंक लोगों को या व्यवसायिक संगठनों को ऋण प्रदान करते हैं यह ऋण नकद साख या अधिविकर्ष के रूप में होते हैं।

नकद साख के अंतर्गत बैंक जमानत के रूप में ग्राहकों की संपत्ति रखने के पश्चात उसका मूल्यांकन कर एक निश्चित सीमा तक ऋण  निकालने का अधिकार देता है और ऋण के रूप में निकाली गई राशि पर ही ब्याज देय होता है जैसे बैंक किसी ग्राहक के गोदाम की चाबी अपने पास रखता है तो उसी आधार पर वह उस ग्राहक को ऋण प्रदान  करता है।

अधिविकर्ष की सुविधा बैंक द्वारा चालू खाते के  ग्राहकों को दी जाती है। इसके अंतर्गत आवश्यकता पड़ने पर बैंक ग्राहकों के खाते में जमा राशि से अधिक राशि की अनुमति देता है ।उदाहरण के लिए यदि चालू खाते में जमा राशि ₹5000 हैं और ग्राहक को ₹7000 की आवश्यकता पड़ती है तो वह ₹7000 की निकासी चेक द्वारा कर सकता है।

(D) विनिमय पत्रों की कटौती 

इसकेेेे अंतर्गत बैंक  विनिमय पत्रों की कटौती करता है और उसके बदले ऋण प्रदान करता है. यह विनिमय पत्र व्यापारिक बिल होते हैं जिनपर प्रचलित ब्याज दर को वह प्राप्त करता है। विनिमय पत्र की अवधि पूरी हो जाने पर ऋण की राशि वसूल हो जाती है।

(E) सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद

बैंक अपने जमा का एक हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों को क्रय करने में लगाते हैं दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सरकारी प्रतिभूतियों क्रय का अर्थ है बैंक द्वारा सरकार को उधार दिया गया। बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद सबसे सुरक्षित उधार देने का तरीका है।

2 गौण कार्य

एजेंसी के रूप में

इसके अंतर्गत बैंक ग्राहकों के प्राप्त बिल ,चेक ,प्रतिज्ञा पत्र आदि की राशि एक निश्चित कमीशन के अंतर्गत कलेक्ट करता है.

*ग्राहकों की ओर से भुगतान  है .

*भुगतान का संग्रह करता है .

*प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय करता है .

*धन का हस्तांतरण करता है इत्यादि.

ग्राहकों को अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना

*ग्राहकों के लॉकर के रूप में काम करता है
 
*प्रतिभूतियों का अभिगोपन करता है

 *विदेशी विनिमय में सहायता करता है

*व्यापारिक आंकड़े और सूचनाएं इकट्ठा करता है

3 सामाजिक कार्य


*औद्योगिकरण में मदद करता है 

*उद्योगों के पूंजी निर्माण में सहायता करता है 

*वित्तीय कोषों के प्रवाह में मदद करता है 

*रोजगार के लिए वित्तीय सहायता देता है

 *भुगतान की सुविधा प्रदान करता है 

*निवेश से संबंधित परामर्श देता है 

इस प्रकार वाणिज्यिक बैंक हमारे दैनिक कार्यों के लिए और भविष्य की सुरक्षा के लिए मौद्रिक आधार प्रदान करता है और हमारी बचत को इकट्ठा कर उद्योग के पूंजी निर्माण द्वारा अर्थव्यवस्था का विकास करता है उसे मजबूती प्रदान करता है।







क्या है औद्योगिक रुग्णता (industrial sickness )

इस ब्लॉग में हम महत्वपूर्ण टॉपिक औद्योगिक रुग्णता के बारे में संक्षिप्त जानकारी लेंगे तो चलिए देखते हैं औद्योगिक रुग्णता के बारे में-

किसी भी देश के विकास का आधार औद्योगिक विकास होता है जो अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान करता है । कोयला और लोहा ऐसे दो उद्योग आधारभूत उद्योग हैं जिन पर अन्य उद्योग टिके होते हैं ।देश काल और परिस्थिति के अनुसार उद्योग के स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं नए उद्योग स्थापित होते हैं पुराने उद्योग समाप्त हो जाते हैं या फिर समय के अनुसार अपने को परिवर्तित कर लेते हैं।
औद्योगिक रुग्णता के अंतर्गत औद्योगिक इकाइयां उसी समय परिस्थिति और नवनिर्माण के दौर से गुजरने के क्रम में अपनी पुरानी स्थिति में बने रहते हुए अपने अस्तित्व को बचाने में सफल नहीं हो पाती हैं और रुग्ण  इकाइयों की श्रेणी में आ जाती हैं । यह स्थिति उनकी वर्तमान वर्ष में होती तो है ही साथ ही आने वाले वर्षों में भी इसकी संभावना बनी रहती है।

सामान्य अर्थ में इसे ऐसे समझते हैं

*ऐसी औद्योगिक इकाई जिसके current assets current liabilities   से कम रहे हैं।

*जिसके current liabilities और current assets  प्रतिदिन की  व्यवसाय  जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती हैं और यही स्थिति लगातार बनी रहती है औद्योगिक रुग्ण  इकाई कहलाती है ।

आरबीआई के अनुसार एक औद्योगिक इकाई उस स्थिति में रुग्ण  मानी जाती है जिसे
*वर्तमान वर्ष में नकद हानि हुई है 
*और आगामी 2 वर्षों में उसे नकद हानि रहने की संभावना होती है।

औद्योगिक रुग्णता के कारण

A प्रारंभिक कारण 

1अनुभव के अभाव के कारण उद्योग उद्योग के स्वामी द्वारा गलत उद्योग का चयन किया जाता है और गलत परियोजना का चयन उसकी रुग्णता को जन्म देता है.

2 परियोजना के चयन करने के पश्चात उसे विलंब से शुरू करने पर और विलंब से पूरा करने पर परियोजना की लागत बढ़ जाती है जो औद्योगिक इकाई के जन्मजात रुग्णता का कारण बनती है

3 औद्योगिक इकाई के लिए अनुपयुक्त स्थान का चयन, गलत तकनीकी का उपयोग और प्लांट और मशीनरी का अनुप्रयोग उस इकाई के रुग्ण होने का कारण होती है। 

4 वित्त केअभाव के कारण औद्योगिक इकाई अल्प पूंजीकरण की समस्या का शिकार होती है जिसके चलते शुरू से ही औद्योगिक इकाई रुग्ण  हो जाती है।

B आंतरिक कारण

1 अकुशल प्रबंध -

एक बीमार इकाई के आंतरिक प्रबंध में कमी के कारण प्रबंध के विभिन्न कार्यों में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता है जैसे कच्ची सामग्री अगर देर से प्राप्त होती है तो विक्रय के लिए निर्मित माल का अभाव होता है यानी प्रबंध के विभिन्न कार्य जो विभिन्न विभागों द्वारा संचालित किए जाते हैं उनमें परस्पर तालमेल स्थापित नहीं हो पाता है जो औद्योगिक रुग्णता का कारण होती है.

2 औद्योगिक संबंधों का अभाव

औद्योगिक  संबंध से तात्पर्य मजदूर और स्वामी के मध्य होने वाले संबंधों से है आए दिन इनमें विवाद होते रहते हैं यह विवाद मुख्यता उत्पादन की तकनीकी में परिवर्तन ,
छटनी से संबंधित, मजदूरी को लेकर होते हैं । इन विवादों के चलते हड़ताल होते हैं जिससे औद्योगिक इकाई  रुग्ण  हो जाती है।

3 स्वामित्व को लेकर मतभेद

ऐसी बहुत सी हो दोगी कि कहां है जो शुरू से ही एक स्वामित्व के अंतर्गत थी औद्योगिक विकास के कारण वह विस्तृत होकर कंपनी का रूप ले लेती हैं जिसपर स्वामित्व किसी परिवार का होता है लेकिन स्वामित्व वर्चस्व को लेकर आंतरिक राजनीति होने लगती है जिसके कारण उस इकाई के संचालन पर प्रभाव पड़ता है और वह इकाई रुग्ण हो जाती है।

 C बाह्य कारण

1 आर्थिक शिथिलता 

ऐसे उद्योग जिनमें वस्तु की मांग लो क्लोज पूर्ण होती है फोन में आर्थिक मंदी के कारण उत्पादन को कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है यह उद्योग कॉटन और टेक्सटाइल इंजीनियरिंग इलेक्ट्रॉनिक गुड्स होते हैं जिनमें उत्पादन बंद होने के कारण औद्योगिक रुग्णता आ जाती है।

2 बिजली

बढ़ते औद्योगीकरण के कारण बिजली की मांग ज्यादा होती है जिसकी  आपूर्ति समय पर नहीं हो पाती है। इसी कारण से कुछ औद्योगिक इकाइयों को अपने उत्पादन को कम करना पड़ता है या उन्हें बंद करना पड़ता है जो औद्योगिक रुग्णता का कारण बनती है.

3 अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति

वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत भूमंडलीकरण के कारण सभी देश आयात निर्यात द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। बहुत सारे देश तेल का आयात करते हैं लेकिन तेल के मूल्य में वृद्धि से वस्तुओं के आयात और निर्यात में कमी आती है जिसका प्रभाव उद्योग जगत पर पड़ता है और भी कारण जैसे विदेशी सहायता ,टेक्नॉलेजी का आयात ऐसे कारण हैं जो उद्योग को प्रभावित करते हैं। उनमें किसी भी प्रकार का प्रतिकूल परिवर्तन औद्योगिक इकाइयों की  रुग्णता  का कारण बनता है।

4 सरकार की नीतियों में परिवर्तन

 सरकार द्वारा टैक्स बढ़ाना साख नीति में वृद्धि करना, लेबर पॉलिसी में परिवर्तन करना प्रत्यक्ष रूप से उद्योग को प्रभावित करती है जो विक्रय में कमी करती हैं और नकद हानि का कारण बनती है. और वह औद्योगिक इकाई बीमार हो जाती है आनेे वाले दिनों में उसेे हानि की संभावना हो जाती है।

अब प्रश्न है बीमार इकाई को पहचाना कैसे जाए ?

इसके कुछ लक्षण होते हैं जिन लक्षणों के आधार पर हम बीमार इकाई की पहचान कर सकते हैं

1 बैंकों के साथ मधुर संबंध नहीं होना

जिस औद्योगिक इकाई के बारे में हमें पता करना है कि वह एक बीमार यूनिट है कि नहीं तो उसके बैंक के साथ  संबंध  को जानेंगे । इसके अंतर्गत बैंक द्वारा दिए जाने वाले ऋण की राशि का भुगतान इस यूनिट द्वारा समय पर किया गया है कि नहीं इसको देखते हैं। यदि लिए गए ऋण का भुगतान समय पर नहीं किया जाता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि बैंक के साथ इस यूनिट के संबंध अच्छे नहीं है दूसरे शब्दों में debt equity ratio ठीक नहीं है.

2 नकद प्रबंध में कठिनाई

इसके अंतर्गत औद्योगिक इकाई में cash का inflow  यदि स्थिर नहीं होता है तो यह गड़बड़ी पैदा होती है। कभी  cash inflow स्थिर रहता है outflow  ज्यादा हो जाता है कभी outflow  स्थिर रहता है और inflow कम हो जाता है जिसके चलते cash management  में कठिनाई होती है ।

3 पूंजी संगठन

यदि औद्योगिक इकाई की पूंजी में equity कम और debt ज्यादा है तो वह sick unit होगी।

4 वैधानिक कानून के पालन का अभाव

दि उस औद्योगिक इकाई के द्वारा वैधानिक कानून का पालन नहीं किया जा रहा है जैसे समय पर करों का भुगतान करना ,समय पर बैंक द्वारा लिए गए ऋण  को चुकाना ,आवश्यक सूचना है जो किसी प्रकार के परिवर्तन से संबंधित हैं उसे रजिस्टार को देना यदि वह कंपनी प्रॉपर तरीके से नहीं करती है तो यह उसके sick unit होने के लक्षण है।

5 यदि उस व्यवसाय की इकाई  fixed assets  ज्यादा होंगी और current assets  कम होगी तो भी वह इकाई  बीमार इकाई होगी.

6 यदि औद्योगिक इकाई के कार्यशील पूंजी में कमी होती है तो भी वह औद्योगिक इकाई बीमार इकाई के रूप में पहचानी जाती है जिसकी पहचान stock turn over ratio,  current ratio,working capital ratio liquidity ratioसे करना आसान होता है।

7  यदि उस व्यावसायिक इकाई के sales  में लगातार कमी आ रही हो तो भी उसकी पहचान बीमार इकाई के रूप में की जाएगी.

मित्रों ब्लॉक में कुछ त्रुटियां हो सकती हैं जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं । उन  त्रुटियों के निवारण हेतु और ब्लॉग को और बेहतर बनाने हेतु आप अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में जरूर दें.





परियोजना


 पिछले ब्लॉग में परियोजना निर्माण के बारे में परियोजना के बारे में  चर्चा कर रहे थे। इस ब्लॉग में हम परियोजना क्या है इसका संक्षिप्त परिचय देख लेते हैं और परियोजना के वर्गीकरण ,परियोजना के कौन कौन से चरण हैं उसके बारे में और परियोजना चक्र के बारे में जानेंगे तो चलिए शुरू करते हैं परियोजना के बारे में।

परियोजना

किसी भी कार्य को व्यवस्थित तरीके से संपादित करने के लिए उसका विश्लेषण कर उसकी रूपरेखा तैयार करना ताकि पूर्व निर्धारित उद्देश्य को पूरा किया जा सके परियोजना कहलाती है। 
सरकार द्वारा या किसी व्यवसायिक संगठन द्वारा किसी खास उद्देश्य से किए जाने वाले कार्य के लिए एक रूपरेखा तैयार की जाती है जिसके उद्देश्य निश्चित होते हैं और समयावधि और स्थान सभी निश्चित होते हैं।
विभिन्न विद्वानों द्वारा परियोजना को इस प्रकार परिभाषित किया गया है 

जे प्राइस गिटिन्जर के अनुसार

परियोजना लाभ प्राप्त करने के लिए संसाधनों के उपयोग में शामिल गतिविधियों का समूह है.

क्लिफोर्ड के अनुसार

प्रयोजना एक अनियमित दिनचर्या वाली जटिल गतिविधि है जिसे संसाधनों में लगी निश्चित राशि और एक निश्चित समय के भीतर पूरा करना आवश्यक होता है.

डेनिस लॉक के अनुसार

परियोजना एक संगठनात्मक इकाई है जो एक पूर्व निर्धारित प्रदर्शन  निर्देशों के अनुरूप बजट के भीतर एक निश्चित समय में एक विकास उत्पाद के सफल समापन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समर्पित है.

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि परियोजना पूर्व निर्धारित लक्ष्य को एक निश्चित अवधि में संसाधनों के   कुशलतम उपयोग द्वारा प्राप्त करने की एक रूपरेखा है।

 उपरोक्त परिभाषा द्वारा परियोजना की निम्न विशेषताएं प्रकट होती हैं-

1 परियोजना किसी कार्य को करने की एक रूपरेखा है

2 यह एक निश्चित अवधि के लिए होती है.

3 यह एक निश्चित बजट से संबंधित होता है.

4 इसमें निश्चित बजट में संसाधनों के कुशलतम उपयोग पर ध्यान दिया जाता है.

5 विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया जाने वाला एक प्रारूप है.

6 यह जोखिम और अनिश्चितता से भरा होता है.

परियोजना के चरण


1  परियोजना के प्रथम चरण में विचारोंं का सृजन और  और उन विचारोंंंमे से बेहतर विचार का चयन कर परियोजना की पहचान की जाती है.
2 दूसरे चरण में बाजार ,वित्त ,आर्थिक और तकनीकी विश्लेषण किया जाता है और एक बेहतर परियोजना तैयार की जाती है उसकी रिपोर्ट तैयार की जाती है जिसे प्रोजेक्ट रिपोर्ट कहा जाता है.

3 परियोजना के तीसरे चरण में इसको लागू करने के लिए उसके विभिन्न पहलुओं की योजनाएं बनाई जाती हैं. इन सभी योजनाओं के माध्यम से परियोजना के विभिन्न पहलू लागू करने में प्रबंध की महत्वपूर्ण भूमिका होती है यह योजनाएं परियोजना प्रबंधक द्वारा बनाई जाती है.

4 चौथे चरण में इन योजनाओं को लागू कर इन्हें मूर्त रूप दिया जाता है.

5 अंतिम चरण में परियोजना अपना आकार लेकर मूर्त रूप में कार्य शुरू करने के लिए तैयार रहती है.

परियोजना चक्र

इसे संक्षिप्त रूप से कह सकते हैं परियोजना क्षेत्र के अंतर्गत परियोजना की पहचान ,तैयारी, परियोजना का आकलन, उसका कार्यान्वयन और मूल्यांकन आते हैं.

परियोजना के उद्देश्य

नवीन उत्पादों का सृजन👍
 
*आधुनिकीकरण👍
 
*निर्माण तकनीकी 👍
 
*यंत्र का प्रतिस्थापन👍

*पयरियोजना का विस्तार👍

परियोजना वर्गीकरण के आधार

क) परिमाण के आधार पर परियोजना को दो भागों में बांटा जाता है
 
1 ऐसी परियोजना इसके अंतर्गत आती है जिनके परिमाण का मूल्यांकन उचित होता है जैसे -बिजली उत्पादन, सिंचाई विकास, औद्योगिक विकास .

2 इसमें ऐसी परियोजनाएं आती हैं जिनके  परिमाण का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है. जैस शिक्षा ,स्वास्थ्य, रक्षा संबंध इत्यादी।

ख)क्षेत्र के आधार पर

विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के आधार पर भी परियोजना का वर्गीकरण किया जाता है इसमें कृषि क्षेत्र सिंचाई एवं ऊर्जा क्षेत्र खनिज संचार क्षेत्र इत्यादि आते हैं.

ग) आर्थिक -तकनीकी के आधार पर

इसमें कई तरह की परियोजनाएं आती हैं पूंजी पर आधारित परियोजना, श्रम आधारित परियोजना, कच्ची  सामग्री आधारित परियोजना ,इत्यादि।

घ) निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के आधार पर

इसमें आधुनिक परियोजना, किसी उद्योग के विस्तार की परियोजना शामिल की जाती है.

ङ) अन्य परियोजनाओं में कल्याण संबंधी परियोजना शोध एवं अनुसंधान से संबंधित परियोजनाएं सेवा परियोजनाएं शामिल की जाती हैं।





दोस्तों कैसी लगी परियोजना के बारे में संक्षिप्त जानकारी .......अपनी राय जरूर दें।



परियोजना निर्माण और परियोजना प्रतिवेदन

मित्रों पिछले ब्लॉग में हमने उद्यमिता विकास कार्यक्रम के बारे में जाना। उद्यमिता विकास कार्यक्रम के पश्चात एक बात स्पष्ट करना अनिवार्य हो जाता है कि किसी भी उद्योग को स्थापित करने के लिए उसकी रूपरेखा का तैयार होना आवश्यक होता है वह रूपरेखा प्रोजेक्ट या परियोजना कहलाती है

अब प्रश्न है परियोजना क्या है?

 किसी भी कार्य को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए उसे अच्छी तरीके से संपादित करने के लिए उसका विश्लेषण ,उस में आने वाली कठिनाइयों का अध्ययन, उसे सुगमता पूर्वक संचालित करने के तरीके और समय अवधि  इन सभी चीजों के बारे में जानना आवश्यक होता है  उससे लिए  एक रूपरेखा तैयार की जाती है. 

ठीक उसी प्रकार से पिरयोजना किसी भी उद्योग को स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया गया प्रारूप होता है जो निश्चित अवधि में निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार किया जाता है.
इसी से मिलता-जुलता है एक और प्रश्न है 

परियोजना निर्माण क्या है?

परियोजना निर्माण परियोजना विचार का सुव्यवस्थित विवरण होता है जिसमें परियोजना के विभिन्न घटकों का मूल्यांकन किया जाता है जिससे विनियोग संबंधित निर्णय लिए जा सके.

परियोजना निर्माण में कौन-कौन से लोग सम्मिलित होते हैं?

अर्थशास्त्री, बाजार विश्लेषक, अभियंता, लेखापाल सरकारी पदाधिकारी.

परियोजना की आवश्यकता क्यों होती है ?

नए उद्योगों को स्थापित करने के लिए या पुराने उद्योग की नई इकाइयों की स्थापना के लिए परियोजना निर्माण की आवश्यकता होती है.

परियोजना निर्माण के समय उद्यमी के सामने कौन-कौन सी कठिनाई आती है?

तकनीकी का चुनाव ,योग्य कर्मचारियों की भर्ती ,पूंजी की व्यवस्था करना और सरकारी नियम कानून यह सभी परियोजना निर्माण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयां हैं.

परियोजना निर्माण के कौन-कौन से तत्व हैं

परियोजना निर्माण के तत्व

1 व्यवहार्यता  विश्लेषण

2 तकनीकी आर्थिक विश्लेषण

3वित्तीय विश्लेषण

4 निवेश विश्लेषण

5 सामाजिक लागत लाभ विश्लेषण

6 परियोजना  आकलन

इनके बारे में संक्षेप में जानकारी लेंगे

1 व्यवहार्यता विश्लेषण 

इसके अंतर्गत यह मूल्यांकन करना होता है कि परियोजना का चुनाव लाभदायक होगा या नहीं.

2 तकनीकी आर्थिक विश्लेषण

तकनीकी विश्लेषण जहां तकनीकी के चुनाव से संबंधित है वहीं आर्थिक विश्लेषण संभावित मांग उत्पादन और अनुकूल चयन नीति से संबंधित है।

3 वित्तीय विश्लेषण

संसाधनों का मूल्यांकन करने के पश्चात कोषों के स्रोत का विश्लेषण किया जाता है।

4 निवेश विश्लेषण

परियोजना निर्माण के लिए विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता होती है. इन विभिन्न संसाधनों के लिए वित्त की आवश्यकता होती है. संसाधनों में निवेश होती हेतु उनका मूल्यांकन ही निवेश विश्लेषण से संबंधित होता है

5 सामाजिक लागत लाभ विश्लेषण

इसके अंतर्गत परियोजना का सामाजिक मूल्यांकन किया जाता है .सार्वजनिक क्षेत्र के परियोजनाओं में इस विश्लेषण की आवश्यकता होती है.

6 योजना आकलन 

यह किसी प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं की स्वतंत्र जांच है जो परिमाणात्मक आधार पर तथ्यों को बाहर लाता है.

मित्रों, परियोजना निर्माण से संबंधित संक्षिप्त जानकारी के पश्चात आगे हम जानेंगे परियोजना प्रतिवेदन के बारे में.

परियोजना प्रतिवेदन क्या है?

किसी परियोजना के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण जिसमें बाजार विश्लेषण ,तकनीकी विश्लेषण, वित्तीय विश्लेषण ,आर्थिक विश्लेषण ,पर्यावरण विश्लेषण और प्रबंधकीय विश्लेषण सम्मिलित होता है. इनके द्वारा प्राप्त तथ्यों को  विवरणों और प्रतिवेदन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है . इन सभी को मिलाकर एक मास्टर प्रतिवेदन तैयार किया जाता है जिसको परियोजना प्रतिवेदन कहा जाता है.

परियोजना प्रतिवेदन के उद्देश्य क्या है?

1यह मूल्यांकन करना कि संगठन के उद्देश्य को इसके द्वारा कहां तक पूरा किया जा सकता है।

 2 व्यवहार्यता अध्ययन के विभिन्न पहलुओं के आधार पर योजनाएं तैयार करना।

 3 उद्देश्य को कार्यान्वित करने के लिए संसाधनों को एकजुट करके धरातल पर उतारना 

4 प्रस्तावित कार्य को करने के तरीके का परीक्षण करना 

5वित्तीय कोषों के विभिन्न स्रोतों की व्यवस्था करना 

6 उद्देश्य को कार्यान्वित करने के लिए संसाधनों को एकजुट कर धरातल पर उतारना.

परियोजना प्रतिवेदन के विभिन्न पहलुओं के बारे में संक्षिप्त चर्चा  करते हैं

सामान्य सूचना
 - इसमें उद्योग की रूपरेखा संगठन संरचना उत्पाद सूचना और अन्य सूचनाएं सम्मिलित की जाती हैं 

परियोजना वर्णन 
 - इसके अंतर्गत प्लांट का स्थान,  कच्ची सामग्री, तकनीकी, बिजली ,इंधन ,पर्यावरण, प्लांट की क्षमता ,यातायात सुविधाएं आदि विभिन्न पहलुओं का वर्णन होता है।

 प्रवर्तक 

-इसमें प्रवर्तक की और अन्य महत्वपूर्ण कर्मचारियों की विस्तृत जानकारी होती है। 

उत्पाद 

-इसमें उत्पाद के आकार प्रकार प्रकृति को उनके प्रयोग की जानकारी दी जाती है 

बाजार

- इसमें अनुमानित मांग ,तीन वर्षों की अनुमानित बिक्री, प्रतियोगिता मध्यस्थ आदि के संबंध में सूचनाएं प्रदान की जाती हैं 

निर्माण प्रक्रिया एवं जानकारी

- इसमें उचित तकनीकी का चयन किया जाता है मशीन आपूर्तिकर्ताओं का चुनाव आदि की सूचना दी जाती है .

प्लांट और मशीनरी 

प्लांट और मशीनरी से संबंधित जानकारियां उपलब्ध होती हैं

 स्थान

 स्थान के अंतर्गत भवन प्लांट मशीनरी के लिए स्थान का वर्णन होता है ।

कच्ची सामग्री 

कच्ची सामग्री के अंतर्गत आपूर्तिकर्ता की जानकारी दी जाती है।
 परियोजना की लागत 
इसमें संसाधनों के लागतो को सम्मिलित किया जाता है ।

सामान्य प्रबंध और तकनीकी 

इसके अंतर्गत प्रवर्तक के कर्तव्य ,कार्यालय के कर्मचारियों के कर्तव्य, कुशल श्रमिक के बारे में उनके वेतन, मजदूरी,  संगठन की संरचना की जानकारी दी जाती है। 

वित्त प्रणाली 

इसमें समता पूंजी , ऋण पत्र, बैंक से प्राप्त उधार, प्रवर्तक ओं के योगदान का विस्तृत वर्णन होता है। 
 
कार्यशील पूंजी

- कार्यशील पूंजी से संबंधित सूचनाएं उपलब्ध की जाती है

 वित्तीय विश्लेषण

 -इसके अंतर्गत सम विच्छेद बिंदु, आंतरिक लाभांश की दर, कुछ वर्षों के आर्थिक चिट्ठे, प्रवर्तक ओं की प्रतिभूति से संबंधित सूचनाएं दी जाती है और अन्य सूचनाएं दी जाती हैं।

अब हम परियोजना प्रतिवेदन और परियोजना निर्माण में संक्षिप्त अंतर को देखेंगे

परियोजना प्रतिवेदन विनियोग के बाद की प्रक्रिया है जबकि परियोजना निर्माण एक अनुसंधान प्रक्रिया है जो विनियोग निर्णय से पहले निष्पादित किया जाता है परियोजना प्रतिवेदन में अस्थल समय सूची अभियंत्रिकी इत्यादि की जानकारी दी जाती है जबकि परियोजना निर्माण में परियोजना विचार के अलग-अलग बिंदुओं को ध्यान में रखा जाता है जैसे उद्देश्यों की पूर्ति तकनीकी सामाजिक वातावरण वित्त ।

परियोजना निर्माण के समय कुछ त्रुटियां हो होती हैं जिनको ध्यान में रखा जाता है यह त्रुटियां इस प्रकार हैं

कुछ उद्यमी अपने उपक्रम के लिए गलत उत्पाद का चयन कर लेते हैं जिसके चलते उत्पादन लागत उत्पादन की मात्रा प्रतियोगिता में समस्याएं उत्पन्न करते हैं .

क्षमता उपयोग का गलत अनुमान परियोजना के लिए कठिनाई उत्पन्न करता है .

उत्पादन के मांग और पूर्ति का अनुमान बाजार अध्ययन द्वारा किया जाता है लेकिन बाजार अध्ययन एक जटिल कार्य है इसलिए बिक्री सूचनाओं पर आधारित अनुमान से बचना चाहिए .

समय के साथ तकनीकी बदलाव होते रहते हैं उनके आधार पर तकनीकी का चयन किया जाता है गलत तकनीक सीमित साधन के साथ लागू नहीं हो सकता है.








उद्यमिता विकास कार्यक्रम

भूमिका
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का विकास उद्योग पर आधारित होता है यानी उद्योग अर्थव्यवस्था की धुरी  है जिसके चारों तरफ औद्योगिक गतिविधियां घूमते रहते हैं।लेकिन इन गतिविधियों को नित्य निरंतर बनाए रखने के लिए उद्यमियों का निरंतर विकास होना और नए उद्यमी पैदा होना आवश्यक होता है। किसी भी देश की सरकार द्वारा इस प्रकार के उद्यमियों को जो पहले से ही अस्तित्व में है और जो  नए व्यक्ति उद्यमी के रूप में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं उनके लिए उद्यमिता विकास से संबंधित कार्यक्रम चलाया जाते हैं। इस ब्लॉग में हम  उद्यमिता  विकास कार्यक्रम के बारे में जानेंगे.
उद्यमिता विकास कार्यक्रम को जानने से पूर्व संक्षेप में 
उद्यमिता विकास को जान लेते हैं यह है क्या.?

उद्यमिता विकास एक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्तियों को व्यावसायिक अनिश्चितताओं के बीच निर्णय लेने और जोखिम उठाने के लिए तैयार किया जाता है.

उद्यमी बनाए जाते हैं-

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उद्यमी के बारे में बताती है कि उद्यमी पैदा होते हैं जो अपनी सोच समझ अपने अनुभव से वातावरण के बाहरी और भीतरी  घटक के अनुसार व्यावसायिक निर्णय लेते हैं. यही क्रियाकलाप पारिवारिक पृष्ठभूमि में लोगों के द्वारा अपनाए जाते हैं जो उद्यमियों को पैदा करते हैं. वर्तमान संदर्भ में औद्योगिक वातावरण में एक  सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति छोटे व्यवसाय की स्थापना कर सकता है लेकिन इससे पूर्व उसे संबंधित व्यवसाय की जानकारी उसका प्रशिक्षण आवश्यक होता है .उसमें उद्यमियों के गुणों के विकास हेतु प्रशिक्षण दिया जाता है, जोखिम उठाने के लिए प्रेरित किया जाता है, सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की रियायत दी जाती हैं, बैंकिंग संस्थाओं द्वारा वित्त की सुविधाएं दी जाती हैं ताकि वह व्यक्ति स्वरोजगार द्वारा अन्य रोजगार पैदा कर सकें.

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की परिभाषा

जिस कार्यक्रम द्वारा व्यक्ति के उद्यमी कुशलता उद्देश्यों और क्षमताओं को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से तैयार किया जाता है उद्यमी विकास कार्यक्रम कहलाता है.

उद्यमिता विकास कार्यक्रम के उद्देश्य

*शंभावी उद्यमी की पहचान करना 

*उद्यमी के गुणों को अभिप्रेरणा द्वारा विकसित कर सशक्त बनाना 

*बाहरी वातावरण का विश्लेषण करना
 
*सही परियोजनाओं का चयन करना और उनको लागू करना 

*आधारभूत प्रबंध की योग्यता को लागू करना

विशेषता

*प्रशिक्षण हेतु उद्यमियों की पहचान करना और उनका चयन करना 

*प्रशिक्षु उद्यमियों की क्षमताओं को विकसित करना
 मूल प्रबंध का ज्ञान देना
 
*आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना 

*आधारभूत पूंजीगत ढांचे में सहायता करना 

*एक व्यवहारिक औद्योगिक वातावरण तैयार करना

*औद्योगिक परियोजनाओं को आरक्षित करना

 उद्यमिता विकास कार्यक्रम का महत्व

उद्यमिता विकास कार्यक्रम एक मानव साधन विकास कार्यक्रम है यह कार्यक्रम बेरोजगारी को दूर करने औद्योगिक इकाइयों की स्थापना उनके संवर्धन उनके विकास में सहायक होता है
या आर्थिक विकास की प्रक्रिया में निम्न प्रकार से सहायता करता है

1 रोजगार का सृजन करके

इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रशिक्षित व्यक्ति लघु या मध्यम उद्योग स्थापित करते हैं ।एक  व्यक्ति स्वयं रोजगार तो पता ही है साथ में अन्य व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर तभी सृजन करता है.

2 प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि

प्रशिक्षित उद्यमी द्वारा उद्योग स्थापित किए जाने से रोजगार का सृजन होता है जिसके कारण आर्थिक विकास होता है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है.

3 पूंजी निर्माण में सहायक

उद्यमी द्वारा खुदरा बचत को इकट्ठा कर उत्पादन के घटकों में  उपयोग किया जाता है और पूंजी निर्माण में सहायता मिलती है.

4 स्थानीय संसाधनों का उपयोग

उद्यमिता विकास कार्यक्रम द्वारा स्थानीय स्तर पर उद्यमों की स्थापना को प्रोत्साहन मिलता है इससे उद्यमी स्थानीय संसाधनों का समुचित उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं

5 संतुलित क्षत्रिय विकास

लघु इकाइयों की स्थापना के द्वारा पिछड़े क्षेत्रों का विकास होता है जिसके कारण स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन होते हैं बाजार का निर्माण होता है और अन्य रोजगार का भी सृजन होता है।

6 व्यावसायिक उपक्रम के स्थापना में सहायक

उद्यमिता विकास कार्यक्रम ने उपक्रमों की स्थापना में उद्यमी को उद्यमियों को आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध करता है जो उद्योग स्थापित करने में सहायक होते हैं.

7 आर्थिक स्वतंत्रता

उद्यमिता विकास कार्यक्रम के कारण ही नए और प्रतिस्पर्धात्मक उद्यमियों का बाजार में आगमन होता है जिससे ग्राहकों को अच्छी किस्म की वस्तुएं समुचित लागत पर प्राप्त होती है.

8 परियोजना में सहायक
किसी परियोजना का चुनाव करने के लिए उसका तकनीकी और वित्तीय विश्लेषण आवश्यक होता है . उद्यमिता विकास कार्यक्रम से परियोजना के प्रारूप को तैयार करने में सहायता मिलती है.

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की उपलब्धियां

1 इसनेेेेेेेेेे औद्योगिकरण की आधारभूत संरचना की है  और उसकी गति को बढ़ायाा है ।

2 इस कार्यक्रम द्वारा रोजगार की समस्याएं दूर हुई है.


3 इन कार्यक्रमों के माध्यम से नवीन उपक्रमों की स्थापना की गई है.

4 उद्यमियों के प्रशिक्षण के लिए कई जगहों पर प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं.

5 देश-विदेश में कई जगहों पर बड़ी संख्या में उद्यमिता विकास संस्थाओं की स्थापना की गई है ।जैसे प्रबंधकीय विकास संस्थान, भारतीय महिला विकास संस्थान, लघु उधमिता विकास मंडल ,लघु उद्योग सेवा संस्थान आदि.

 6 लघु उद्योग विकास खासकर पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों में होने से वहां विकास हुआ.

7 ग्राहकों को नई नई वस्तुओं की जानकारी हुई। अब कम कीमत पर अच्छी वस्तुएं उपलब्ध होने लगी है.
उद्यमिता विकास कार्यक्रम के चरण

उधमिता विकास कार्यक्रम के तीन चरण है
 
1 प्रशिक्षण पूर्व चरण
 2 प्रशिक्षण चरण 
  3  प्रशिक्षण पश्चात चरण

1 प्रशिक्षण पूर्व चरण प्रशिक्षण पूर्व चरण की नींद गतिविधियां है 
* पाठ्यक्रम का निर्धारण 
 *प्रशिक्षण शक्ति विभाग 
 *विज्ञापन का प्रवेश 
  *संभावित उद्यमियों का चयन

2 प्रशिक्षण चरण
इसका मुख्य उद्देश्य उद्यमियों में उद्यम के प्रति प्रेरणा एवं आवश्यक योग्यताओं को विकसित करना है. इसमें बाजार सर्वेक्षण परियोजना का निर्माण संभावना प्रतिवेदन उत्पादन एवं सेवा के विपणन आदि से परिचय कराया जाता है.

3 प्रशिक्षण पश्चात चरण
 प्रशिक्षण के पश्चात के चरण में यह सुनिश्चित किया जाता है कि पिछले अनुभव में कोई कमियां जो उजागर हुई हैं उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है जिन उद्यमियों ने गलत योजनाएं चुनी हैं उनको उचित सहायता दी जाती है.

उद्यमिता विकास कार्यक्रम के संचालन में समस्याएं

1 राष्ट्रीय स्तर पर कोई नीति नहीं

2 मूलभूत सुविधाओं की कमी
 
3 योग्य शिक्षक शक्ति की कमी 

 4 वित्तीय संस्थाओं पर  क्षीण व्यवहार 
 
 5 अफसरशाही 

6 अनुप्रयुक्त विधि 

7 प्रशिक्षण पूर्व परियोजना चयन की समस्या 

8 उद्यमिता विकास कार्यक्रम की अवधि 

9 दोषपूर्ण चयन प्रक्रिया 

10वां विभिन्न संस्थानों में समन्वय का अभाव

उद्यमिता विकास कार्यक्रम को सफल कैसे बनाया जाए?

उद्यमिता विकास कार्यक्रम को निम्न उपायों द्वारा सफल बनाया जा सकता है

 1 उद्यमिता विकास कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए क्रियाओं में उठती जन आवश्यक है.  इसमें उद्यमतीय सुविधाओं का प्रचार ,संभावित परियोजनाओं की पहचान ,उद्यमियों की समस्याओं के लिए मिले-जुले मंच आदि सम्मिलित हैं।

2 अल्पकालीन कार्यक्रमों का संचालन हमेशा होते रहना चाहिए इससे अध्यन सील एवं कार्यशील उद्यमियों को बहुत सहायता मिलती है .

3 कार्यक्रम की सफलता के लिए योग्य शिक्षकों का होना आवश्यक है उनकी योग्यता का निर्धारण होना चाहिए  वह स्वयं एक उद्यमी होना चाहिए जिसने अपनी कुशलता और अनुभवों से उद्यम को लाभ दिया हो।

4 उद्यमिता विकास कार्यक्रम के अंतर्गत संभावित परियोजना की रूपरेखा तैयार कर उसके अनुरूप उद्यमियों को प्रशिक्षण दिया जाए उन्हें वित्तीय सहायता दी जाए।

5 यह आवश्यक है कि उद्यमियों में उपलब्ध प्रेरणा प्रशिक्षण और अनुकूल वातावरण विकसित किया जाए.।

6 उद्यमिता विकास कार्यक्रम संचालित करने वाली संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वह एक और मांग का अध्ययन करें तथा दूसरी ओर उपलब्ध स्थानीय साधनों का आकलन करें.।

उद्यम का प्रवर्तन

भूमिका

उद्यमिता और उद्यमी को जानने के पश्चात अब प्रश्न यह उठता है कि उद्यम को स्थापित कैसे किया जाए ? जहां उद्यम स्थापित करने की बात आती है तब विचारों के सृजन से लेकर विभिन्न विचारों में से किसी एक विचार का चयन कर उसको कार्यान्वित रूप देने तक की समस्त क्रिया ही उद्यम की स्थापना से संबंधित होती हैं।
हमने पिछले ब्लॉक में उद्यमिता और उद्यम से संबंधित बातों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी ली। इस ब्लॉग में उद्यम की स्थापना और उससे पूर्व की क्रिया- विधियों  के बारे में जानकारी लेंगे । यह क्रियाविधि प्रवर्तन कहलाती है । अब प्रश्न उठता है "प्रवर्तन क्या है" आइए देखते हैं -

प्रवर्तन की परिभाषा

 प्रो. ई एस मेड के अनुसार

"प्रवर्तन में चार तत्व निहित होते हैं खोज, जांच, एकत्रीकरण और व वित्त."

 गुथमैन और डूगल के अनुसार

"प्रवर्तन उस विचारधारा के साथ आरंभ होता है जिससे किसी व्यवसाय का विकास किया जाना है और इसका कार्य कब तक चलता रहता है जब तक कि वह व्यवसाय एक चालू संस्था के रूप में अपना कार्य पूर्ण रूप से आरंभ करने के लिए तैयार नहीं हो जाता है."

 निष्कर्ष

प्रवर्तन ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी उपक्रम  की स्थापना के विचार से लेकर उसकी वास्तविक स्थापना तक के समस्त कार्यों को सम्मिलित किया जाता है.
प्रवर्तन की परिभाषा से ही इसकी लक्षण स्पष्ट हो गई या  इसके लक्षण स्पष्ट हो गए आइए देखते हैं इसकी विशेषताएं क्या है?

प्रवर्तन के लक्षण

☺प्रवर्तन के अंतर्गत किसी उद्योग को प्रारंभ किया जाता है.

☺ प्रवर्तन का कार्य विचारों की उत्पत्ति से लेकर व्यवसाय प्रारंभ करने तक की स्थिति तक लाने में समाप्त हो जाता है.

☺ प्रवर्तन में किसी उद्योग को प्रारंभ करने के लिए विभिन्न कार्य जैसे व्यवसाय की खोज की जांच उत्पादन के साधनों का एकत्रीकरण और वित्त व्यवस्था तक का कार्य सम्मिलित किया जाता है.

 अवसरों का विश्लेषण

अवसरों के विशेषण से आशय परियोजनाओं के विचारों के गुण दोष जोखिम बाधाओं और कमियों के व्यापक रूप में मूल्यांकन से है .नए विचारों ,नए अवसरों ,नए अन्वेषण और नई अवधारणाओं की पहचान कर परियोजनाओं को व्यवहारिक रूप देनेवाली बाधाओं ,रुकावटों एवं दुखो का सामना करने से है.

अवसरों के प्रकार

1 पर्यावरण में विद्यमान अवसर जैसे कागज का कारखाना, जूते का कारखाना
2 निर्मित अवसर जैसे टेलीविजन ,कंप्यूटर सॉफ्टवेयर बनाना मरम्मत करना

अवसर के घटक

1  संसाधन विश्लेषण
2 वित्तीय विश्लेषण
3 तकनीकी विश्लेषण
4 संयंत्रों के लिए स्थान और अभिन्यास विश्लेषण
5 मूल्यांकन विश्लेषण
6 बाजार मांग विश्लेषण

1 संसाधनों का विश्लेषण

किसी परियोजना को लागू करने के लिए संसाधनों की उपलब्धता और उनके स्रोतों को ध्यान में रखा जाता है संसाधनों से तात्पर्य भूमि भवन कच्चा माल यंत्र मानव शक्ति वित्त इत्यादि से है.

2 वित्ती विश्लेषण

इसके अंतर्गत परियोजनाओं के कुल लागत भूमि ,भवन ,यंत्र, कच्चा माल ,नकद, कार्यशील पूंजी ,सरकार से प्राप्त की तें विनियोग और प्रत्याय इत्यादि पर ध्यान दिया जाता है.

3 तकनीकी विश्लेषण

इसके अंतर्गत तकनीकी संभावनाओं का विश्लेषण किया जाता है तकनीकी दृष्टि से परियोजनाओं को लागू करने में यदि कोई समस्याएं आती हैं तो उन परियोजनाओं को त्याग दिया जाता है.

4 संयंत्रों के लिए उपयुक्त स्थान का चयन और अभिन्यास विश्लेषण

इसमें संयंत्र के स्थान का चयन करते समय कच्चे माल की आपूर्ति, इंधन ,जल ,परिवहन ,संचार, बाजार के निकटत सहायक उद्योगों की स्थिति पर भी ध्यान दिया जाता है. इसके अतिरिक्त उद्योग में संयंत्र को स्थापित करने के लिए आदर्श स्थान काफी महत्वपूर्ण योगदान होता है.

5 मूल्यांकन विश्लेषण

इसमें परियोजनाओं के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन लाभ देयता का मूल्यांकन ,सामाजिक लाभ देयता  का विश्लेषण संसाधनों और अन्य  प्रभाव का मूल्यांकन किया जाता है.

6 बाजार और मांग विश्लेषण

उत्पादों की मांग उत्पन्न करना एवं विक्रय करना सबसे अधिक  कठिन कार्य है .इसी कारण बाजार और मांग विश्लेषण को अवसर विश्लेषण का प्रारंभ बिंदु माना जाता है. इसके अंतर्गत वर्तमान उत्पादन की पद्धति, पूर्ति के स्रोत, विपणन प्रतिस्पर्धा ,भावी मांग का अनुमान, उपभोक्ताओं की रुचियां, सरकार की नीतियां, इत्यादि का अध्ययन किया जाता है और उनका विश्लेषण किया जाता है☺☺

उद्यमिता

  उद्यमिता  की परिभाषा उद्यमिता से आशय उद्यमी द्वारा किए जाने वाले  कार्यों  से है जिसमें उद्यमी किसी नए व्यवसाय को स्थापित करने से संबंधित ...