जोखिम पूंजी Venture Capital

साहस पूंजी  
Venture capital

साहस पूंजी दो शब्दों से मिलकर बना है साहस और पूंजी।साहस  का अर्थ जोखिम उठाना होता है और पूंजी का अर्थ संसाधनों में लगे कोषों से है । 
इस प्रकार साहस पूंजी का तात्पर्य किसी उद्योग में नई परियोजना के शुरू करने हेतु कोषों के प्रवाह से है जिस पर प्राप्त लाभ और हानि की संभावना अनिश्चितता ओं से भरी होती हैं।
 एक उद्योग को लगाने के लिए या नई  कंपनी की स्थापना के लिए या मौजूद उद्योग में नई परियोजनाओं पर काम करने के लिए जोखिम पूंजी की आवश्यकता होती है जिसे प्राप्त करना उद्यमी के लिए काफी कठिन कार्य है ।यह पूंजी निवेशकों के लिए जोखिम के साथ अप्रत्याशित लाभ या हानि से जुड़ा होता है। साहस पूंजी का अधिकतर भाग सामान्य अंश द्वारा प्राप्त किया जाता है पूंजी का कुछ भाग ही ऋणों से प्राप्त होता है । साहस पूंजी को सृजनात्मक पूंजी भी कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा आर्थिक क्रियाओं का सृजन किया जाता है ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है ।
इसके उपयोग हेतु काफी चतुराई की आवश्यकता होती है। किसी कंपनी के दीर्घकालीन जीवन के लिए जोखिम पूंजी के उपयोग की आवश्यकता होती है।

साहस पूंजी की मुख्य विशेषता 

1 साहस पूंजी किसी भी उद्योग के इकाई के लिए आवश्यक होता है ।

2 किसी फर्म द्वारा नए परियोजना पर काम करने के लिए विश्वास पूंजी की आवश्यकता होती है।
 
3 साहस पूंजी अनिश्चितता और जोखिम से भरा होता है कोसों के उपयोग को लेकर।
 
4 साहस का उद्देश्य लाभ कमाना होता है लेकिन हानि भी हो सकती है।
 
5 साहस पूंजी द्वारा प्राप्त लाभ या हानि अप्रत्याशित होते हैं ।

6 साहस पूंजी का उपयोग छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए किया जाता है ।

7 यह मांग पर् देयनहीं होता है जैसा ऋणों के संबंध में होता है।

साहस पूंजी का क्षेत्र
एक परियोजना के विकास की विभिन्न अवस्थाओं में जोखिम पूंजी की आवश्यकता होती है जो विभिन्न रूपों में होती है

1 परियोजना की पहली अवस्था इसमें परियोजना की शुरुआत के लिए प्रारंभिक पूंजी की आवश्यकता होती है जिसमें जोखिम पूंजी का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसे बीज पूंजी भी कहा जाता है 

2 परियोजना का क्रियान्वयन पर योजना को कार्यान्वित रूप देने के लिए भी साहस पूंजी आवश्यक होता है ।

3 उड़ान की अवस्था कोई व्यवसाय ईकाइ जब तेजी से उत्पादन करती है तो विपणन की व्यवस्था के लिए अतिरिक्त कोषों की आवश्यकता होती है जिसमें साहस पूंजी का योगदान होता है।

4 स्थापित अवस्था इस के अंतर्गत फर्म एक बार बाजार में स्थापित हो जाती है तो इसे विस्तार और इसके विविधीकरण के लिए उसकी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति व्यवसाय स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से करता है क्योंकि बाजार में स्थापित होने के बाद इसका पंजीयन हो जाता है और इसे साहस पूंजी प्राप्त करने के लिए विभिन्न रास्ते मिल जाते हैं।

साहस पूंजी के स्रोत
1 समता 
2 ऋण
3 आय नोट

1 समता
समता से तात्पर्य फॉर्म के शुरुआती व्यवस्था के लिए जोखिम उठाने वाले निवेशक की फर्म में हिस्सेदारी या उसके स्वामित्व से है जो फार्म के शुरू करने के पश्चात उस से प्राप्त होने वाले लाभ के रूप में प्राप्त होता है ।

2ऋण
यह रॉयल्टी के रूप में पुनर भुगतान योग्य होता है जब परियोजना विक्रय का सृजन करने लगती है साहस पूंजी द्वारा प्राप्त रॉयल्टी 2 से 15% तक हो सकती है कुछ फंड्स रॉयल्टी की तुलना में ज्यादा भुगतान का विकल्प भी देते हैं।

 3 आय नोट 
इसमें उद्यमी को ब्याज के साथ-साथ विक्रय पर भी रॉयल्टी चुकाना पड़ता है फंड असुरक्षित ऋण के रूप में विभिन्न विकास चरणों में 9% ब्याज पर उपलब्ध कराए जाते हैं और विक्रय पर रॉयल्टी भी उपलब्ध कराई जाती है।
भारत में साहस पूंजी उपलब्ध कराने वाली संस्थाएं
A अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
1आईडीबीआई का साहस पूंजी डिवीजन 
2 जोखिम पूंजी एवं टेक्नोलॉजी वित्त निगम लिमिटेड आईडीबीआई 
3भारतीय टेक्नोलॉजी विकास एवं सूचना कंपनी लिमिटेड (आईसीआईसीआई और यूपीआई द्वारा स्थापित) 

B राज्य वित्त निगम द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
1 गुजरात वेंचर फाइनेंस लिमिटेड 
2 आंध्र प्रदेश औद्योगिक विकास निगम 

C बैंक द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
केनरा बैंक बैंक शेयर कैपिटल फंड 
2 एसबीआई वेंचर कैपिटल फंड 
3 भारतीय विनियोग फंड 
4 इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग

D निजी क्षेत्र की कंपनियां 
1इंडस वेंचर कैपिटल फंड
2 20 सेंचुरी वेंचर और 
3 वेंचर कैपिटल फंड देसाई

Capital Market

Capital Markets (पूंजी बाजार )

वित्तीय बाजार का वह भाग जिसमें मध्यम अवधि और दीर्घ अवधि के प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय होता है पूंजी बाजार कहलाता लाता है। 

पूंजी बाजार के माध्यम से सरकार ,निजी निगम अपने दीर्घकालीन और मध्यकालीन पूंजी की व्यवस्था करते हैं इस पूंजी की पूर्ति व्यापारिक बैंक, एलआईसी ,जीआईसी, आईडीबीआई ,आईएफसीआई ,आईसीआईसीआई ,यूटीआई इत्यादि जैसी संस्थाओं द्वारा की जाती है। ये संस्थाएं पूंजी बाजार में प्रतिभूतियों में जनता के पैसे को निवेश करती हैं और इन प्रतिभूतियों के माध्यम से सरकार और निजी निगम औद्योगिक ढांचे को मजबूत करते हैं और उद्योग धंधे स्थापित करते हैं, उत्पादन का कार्य करते हैं। 

मुद्राबाजार और पूंजी बाजार में अंतर

(Difference between money market and capital market)

 *मुद्रा बाजार अल्पकालीन पुरुषों का बाजार होता है जबकि पूंजी बाजार मध्यकालीन और दीर्घकालीन कोसों का बाजार होता है ।

*मुद्रा बाजार में ट्रेजरी बिल जमा प्रमाण पत्र वाणिज्य कागज पत्र आदि का प्रयोग किया जाता है यानी इन्के माध्यम से लेनदेन का कार्य होता है जबकि पूंजी बाजार में अंशु पत्र ऋण पत्र गॉड इत्यादि का प्रयोग किया जाता है 

*मुद्रा बाजार को प्राथमिक बाजार भी कहा जाता है जबकि पूंजी बाजार को द्वितीयक बाजार कहा जाता है।

*मुद्रा बाजार में दलाल के बिना सौदा तय होते हैं जबकि पूंजी बाजार में दलाल द्वारा से सौदा तय किए जाते हैं।

*मुद्रा बाजार में प्रतिभूतियों का मूल्य बड़ा होता है जबकि पूंजी बाजार में प्रतिभूतियों का मूल्य छोटा होता है।

पूंजी बाजार का गठन 

1 श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार

 2 औद्योगिक प्रतिभूति बाजार

 1श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार 

यह पूर्णत सुरक्षित बाजार होता है जिसके पुनर्भूगतान मे कोई जोखिम नहीं होता है। यह सरकारी या अर्ध सरकारी प्रतिभूतियों का बाजार होता है। यह प्रतिभूतियां केंद्र सरकार, राज्य सरकार स्थानीय सरकार, राजकीय विद्युत बोर्ड ,स्वायत्त सार्वजनिक संस्थाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों की होती हैं। 

 इस बाजार में सरकारी या गैर सरकारी प्रतिभूतियों का लेनदेन होता है यह प्रतिभूतियां पूर्ण रूप से सुरक्षित होती हैं इसीलिए स्वर्ण रेखा किन प्रतिभूतियां कहलाती है ।

सरकारी प्रतिभूतियों में अनेक संस्थाएं सौदा करती हैं क्योंकि नियम अनुसार उन संस्थाओं को अपने कोष का एक निश्चित भाग इन प्रतिभूतियों में निवेश करना पड़ता है। 

 आरबीआई द्वारा खुले बाजार की क्रियाएं सरकारी प्रतिभूतियों को खुले बाजार में खरीदने और बेचने से संबंधित होती हैं जिससे मौद्रिक नियंत्रण अर्थव्यवस्था का होता है।

2 औद्योगिक प्रतिभूति बाजार 

इस बाजार में विभिन्न  उद्योगों की कंपनियों द्वारा नए और पुराने प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय किया जाता है । इन प्रतिभूतियों  का क्रय विक्रय का केंद्र स्टॉक एक्सचेंज होता है । यह सरकार की वित्तीय नीति, आरबीआई की मौद्रिक नीति, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नीतियों द्वारा प्रभावित होता है। 

औद्योगिक प्रतिभूति बाजार को भी दो भागों में बांटा गया है 

क प्राथमिक प्रतिभूति बाजार और 

ख द्वितीयक प्रतिभूति बाजार

क प्राथमिक प्रतिभूति बाजार 

इस बाजार के अंतर्गत कंपनियों द्वारा प्रवर्तन के लिए कोषो की आवश्यकता होती है जिसके लिए वह नए अंश ऋण पत्र या बॉन्डको निर्गमित करते हैं।

ख द्वितीयक बाजार

 इसमें विद्यमान कंपनियों के अंश पत्र और ऋण पत्र का क्रय विक्रय किया जाता है। इन प्रतिभूतियों द्वारा कंपनियां अपने दीर्घकालिन कोषो की पूर्ति करती हैं। इस बाजार में व्यवहार करने वाले विभिन्न मध्यस्थ व्यापारिक बैंक ,दलाल और अन्य संस्थाएं होती हैं।

पूंजी बाजार के उपकरण- सरकारी प्रतिभूतियां, अंश पत्र।

अंशपत्र 

अंकपत्र दो प्रकार के होते हैं समता अंश और पूर्वाधिकार अंश।

समता अंश 

यह उद्योग के वित्त व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। अधिकतर कंपनियां अपनी पूंजी का अधिकतर भाग इस अंश  को निर्गमित कर प्राप्त करती हैं जिसके माध्यम से यह स्थाई पूंजी की व्यवस्था करती हैं। कंपनी को लाभ होने पर इन अंशो पर लाभांश दिया जाता है और इन अंशो के धारक ही कंपनी के वास्तव में स्वामी होते हैं।

 समता अंशो के प्रकार

 ब्लूचीप अंश

यह अंश उन कंपनियों द्वारा निर्गत किया जाता है जिनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है ।

विकास अंश

 यह उन कंपनियों द्वारा जारी किया जाता है जिनका विकास तेजी से होता है ।

चक्रीय या गैर चक्रीय अंश

 जिन कंपनियों के अंशों में उतार चढ़ाव होते होता है वह चक्रीय अंश कहलाते हैं जैसे सीमेंट, ऑटोमोबाइल, निर्माण कंपनियों के अंश।

 गैर चक्रिय अंश में उतार-चढ़ाव नहीं होता है जैसे बीमा कंपनियों के अंश।

स्वेट शेयर

जो शेयर कंपनी के डायरेक्टर और कर्मचारियों को निशुल्क दिए जाते हैं स्वीट शेयर कहलाते हैं ।

अल्फ शेयर

 वे शेयर जो बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद अच्छा प्रत्यय देते हैं अल्फा शेयर कहलाते हैं।

 सुरक्षात्मक शेयर 

ह शेयर अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव के बावजूद भी एक निश्चित प्रत्यय देते हैं।


Money Market

 Money Market मुद्रा बाजार 

(मुद्रा बाजार का अर्थ, मद्रा बाजार की विशेषताएं, मुद्रा बाजार के कार्य,मुद्रा बाजार के अंग)

मुद्रा बाजार का अर्थ

 वित्त बाजार का वह भाग जहां अल्पकालीन प्रतिभूतियों का लेनदेन होता है या अल्पकालीन परिसंपत्तियों का क्रय विक्रय होता है मुद्रा बाजार कहलाता है।

 मुद्रा बाजार की विशेषताएं 

*मुद्रा बाजार एक अल्पकालीन बाजार होता है जिसकी अवधि 1 वर्ष से कम की होती है।
* इसमें अल्पकालीन ऋण ओं का लेनदेन होता हैः 
* इसमें अल्पकालीन ऋण के लिए जिन प्रतिभूतियों या परिसंपत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है उनके अलग-अलग उप बाजार होते हैं।
* यह उद्योगों को कार्यशील पूंजी के लिए धन प्रदान करता है।
*अल्पकालीन ऋण की अवधि 14 दिन 91 दिन और 364 दिन तक के होते हैं।
* मुद्रा बाजार एक ऐसा बाजार होता है जिसके माध्यम से अधिशेष धन घाटे वाले क्षेत्रों में जाते हैं ताकि अस्थाई तरलता के संकट से निपटा जा सके।
 *भारत में दो मुद्रा बाजार केंद्र कोलकाता और मुंबई में है जिन्हें नेशनल मनी मार्केट कहा जाता है।अबअहमदाबाद का स्थान आ रहा है।
*इस बाजार में दलाल का कोई योगदान नहीं होता है।

मुद्रा बाजार के कार्य
*मुद्रा बाजार व्यवसाय निजी संस्थाओं अन्य वित्तीय संस्थाओं गैर वित्तीय संस्थाओं को अल्पकालीन कोर्स उपलब्ध कराता है।
* अतिरिक्त निधियों निधियां जो मुद्रा बाजार में उपलब्ध होती हैं उनका लाभकारी उपयोग मुद्रा बाजार के माध्यम से उपलब्ध होता है।
*यह निधियां बैंक अन्य वित्तीय संस्थाओं व्यवसायिक निगम राज्य व स्थानीय सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं ।
*मुद्रा बाजार अल्पकालीन विधियों को एक बाजार से दूसरे बाजार में भेजने के लिए सस्ता और सुविधा उपलब्ध कराता है 
*एक विकसित मुद्रा बाजार  मुद्रा बाजार को केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों के विभिन्न उपकरणों द्वारा प्रभावित करता है जिससे मुद्रा की आपूर्ति और मांग में स्थिरता बनी रहती है ।
*मुद्रा बाजार में अल्पकालीन विधियों का लेनदेन होता है जहां वचतो का निवेश भी होता है इसलिए निवेश द्वारा प्राप्त संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाता है।

मुद्रा बाजार के अंग 
संगठित मुद्रा बाजार ,असंगठित मुद्रा बाजार और उप बाजार

संगठित मुद्रा बाजार (Organized Money Market)
इसमें आरबीआई शीर्ष संस्था होती है जिसके अधीन राष्ट्रीय कृत बैंक एसबीआई अनुसूचित और गैर अनुसूचित बैंक आते हैं।

असंगठित मुद्रा बाजार (unorganized matket)
इसमें देसी बैंकर ,महाजन ,साहूकार ,चिटफंड आदि आते हैं ।

उप बाजार 
इसके अंतर्गत अल्पसाख सूचना बाजार ,व्यापारिक बिल बाजार, वाणिज्य पत्र बाजार, जमा पत्र बाजार, अंतर बैंक भागीदारी प्रमाण पत्र आते हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात है हमने पिछले ब्लॉक में संगठित बाजार के अंतर्गत आने वाले कुछ संस्थाओं के बारे में बताया है और असंगठित बाजार के बारे में आने वाले ब्लॉक में चर्चा होगी ।अभी उप बाजारों  की संक्षिप्त जानकारी हम ले लेते हैं।

अल्प सूचना बाजार(Call Money Market)
इस बाजार में अल्पकालीन निधियों की अवधि 14 दिनों तक की होती है यह पूर्णता तरल होता है इस बाजार में उपलब्ध प्रतिभूतियां नकद के लगभग बराबर होती हैं जिस दर पर बाजार में को सुधार दिया या लिया जाता है उसे अल्प सूचना साख दर का जाता है।

व्यापारिक बिल बाजार(Commercial Bill Market)
इसमें अल्पकालीन व्यापारिक दिलों का क्रय विक्रय होता है ।व्यापारिक बिल में लिखने वाला व्यक्ति द्वारा जारी किया जाता है। इसमें किसी वाहक को या आदेशित व्यक्ति  को वह मुद्रा की निश्चित राशि के भुगतान का आदेश होता है ।दूसरे शब्दों में विनिमय बिल एक लिखित आदेश होता है जिसमें ऋणदाता ऋणी को मुद्रा की एक निश्चित रकम स्वयं को या आदेशित व्यक्ति को या वाहक को भुगतान  करने का आदेश देता है।

कार्य की दृष्टि से बिल बाजार का विभाजन

*प्रचलित बाजार 
इसमें दलाल बट्टा करने वाले व्यापारी या कंपनियों से सौदा तय करते हैं और कमीशन लेते हैं ।

*बिल ब्रोकर 
यह कंपनियां खुद ही बिलों का बट्टा करती हैं ।

*बट्टा कंपनियां
यह व्यापारियों से डिस्काउंट पर बिलों को खरीदकर उन्हें पूंजी प्रदान करते हैं।

*स्वीकृति बाजार
 इस बाजार में अल्पकालीन बिलों पर वित्तीय मध्यस्थों की स्वीकृति होती है जिन पर स्वीकृति मध्यस्थों द्वारा दे दी जाती है उनकी साख और विनिमय सध्यता बढ़ जाती है और उनकी पुनर्टौती भी आसानी से हो जाती है।

Note
         
विनिमय बिल के पक्षकार
 बिल लिखनेवाला, बिल स्वीकार करने वाला और जिसे बिल की रकम का भुगतान किया जाता ह

बिल की विशेषता 
यह एक लिखित आदेश होता है ।
यह शर्त रहित आज्ञा पत्र होता है ।
इस पर ऋणी के हस्ताक्षर होते हैं। इसपर एक निश्चित रकम लिखी होती है ।
रकम का भुगतान किसी व्यक्ति या वाहक को किया जाता है।

बिल बाजार की कमियां
यह कृषि संबंधी आवश्यकताओं से कोई मतलब नहीं रखते हैं।
 ऋणऔर बिल की रकम की न्यूनतम सीमा निर्धारित होने के कारण छोटे बैंक इस योजना से लाभ नहीं उठा सकते ।
देसी बैंकर और  गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं बिनिमय में बिल से संबंधित कार्य नहीं करते हैं इनके द्वारा सामान्यता मुद्रा बाजार से ही साख सृजन होता है}

ट्रेजरी बिल बाजार
ट्रेजरी बिल बाजार में ट्रेजरी बिलों का क्रय विक्रय होता है।

ट्रेजरी बिल 
यह एक सरकारी प्रतिभूति होती है जिसे आरबीआई द्वारा एक प्रतिज्ञा पत्र के रूप में जारी किया जाता है जिसमें निश्चित तिथि पर एक रकम आरबीआई द्वारा भुगतान की गारंटी दी जाती है।
विशेषता 
यह एक वित्तीय उपकरण है जिसे अंकित मूल्य से कम मूल्य पर ही आरबीआई द्वारा निर्गत किया जाता है किंतु परिपक्वता की अवधि पूर्ण होने पर अंकित मूल्य के बराबर भुगतान किया जाता है। 

भारत में दो प्रकार के ट्रेजरी बिल होते हैं तदर्थ और सामान्य।
 तदर्थ बिलों के प्रयोग की अनुमति राज्य सरकारों और शासकीय विभागों और  देशों के केंद्रीय बैंक को ही है।

ट्रेजरी बिल आरबीआई द्वारा सरकार के एजेंट के रूप में कोष प्राप्त ने के लिए जारी किया जाता है जबकि व्यापारिक बिल निजी वित्तीय संस्था के द्वारा कोस प्राप्त करने के लिए जारी किया जाता है।

वाणिज्य पत्र बाजार(commercial Bill Market)
यह असुरक्षित विनिमय साध्य अल्पकालीन प्रतिज्ञापत्र होते हैं जिनकी एक निश्चित परिपक्वता तिथि होती है विशेषता यह अल्पकालीन प्रतिज्ञापत्र होता है इस प्रपत्र की जिम्मेदारी जारीकर्ता वाणिज्य बैंक तक ही सीमित होती है या अंकित मूल्य से कम मूल्य पर जारी किया जाता है इसकी परिपक्वता की अवधि 3 महीने से 6 महीने तक की होती है इस पर एक निश्चित ब्याज दर होता है इसे खुले रूप में हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है ।

वाणिज्य पत्रों का महत्व 

*कम ब्याज दरों पर कंपनी को ऋण प्राप्त हो जाता है।

*खुले बाजार प्रतियोगिता द्वारा बैंकों को ऋण दरों में 
 कमी करना पड़ता है।

*उद्योग जगत को ऋण प्राप्त करने में और उनकी व्यवस्था के एक भाग के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जमा प्रमाण पत्र (Certificate of Deposits)
जमा प्रमाण पत्र बैंकों द्वारा सावधि जमा के स्वामित्व के लिए निर्धारित किया जाता है 

विशेषता 
*यह अंकित मूल्य से कम उस पर जारी किया जाता है परिपक्वता पर अंकित मूल्य धारक को भुगतान किया जाता है ।
*इसकी परिपक्वता अवधि 30 दिन से 1 वर्ष तक की होती है इस पर स्टांप  ड्यूटी देय हैः।
*अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी करने पर इसे यूरो प्रमाण पत्र कहा जाता है।






वित्तीय बाजार ( Financial Market)


वित्तीय बाजार (Financial Market)

सामान्य अर्थ में बाजार से तात्पर्य स्थान विशेष पर क्रेता विक्रेता का इकट्ठा होना और वस्तुओं का क्रय विक्रय करना है लेकिन इन बाजारों की तरह वित्त बाजार का कोई स्थान नहीं होता। इसमें वे सभी क्षेत्र शामिल किए जाते हैं जहां वित्तीय परिसंपत्तियों का लेनदेन यानी क्रय विक्रय होता है। वित्तीय परिसंपत्तियों के अंतर्गत निम्न चीजें आती हैं ऋण और जमा शेयर ,बाँण्ड, सरकारी प्रतिभूतियां ,बिल, चेक आदि।

वित्तीय बाजार की विशेषताएं
*वित्तीय बाजार का संबंध अन्य बाजारों की तरह किसी निश्चित क्षेत्र से नहीं होता यह व्यापक क्षेत्र होता है

*वित्तीय बाजार में परिसंपत्तियों में अल्पकालीन परिसंपत्तियों और दीर्घकालीन कालीन परिसंपत्तियों का क्रय विक्रय होता है या लेनदेन होता है।

*वित्तीय बाजार कोषों के मांग और पूर्ति में संतुलन से संबंधित होता है।

* इस बाजार में तरलता और सुरक्षा पर ध्यान दिया जाता है।

वित्तीय बाजारों का वर्गीकरण
वित्तीय बाजाार को दो भागों बाटा जाता है

 1संगठित बाजार
 
2 असंगठित बाजार 

1संगठित बाजार

 इसमें उन वित्तीय संस्थाओं को शामिल किया जाता है जो आधुनिक एवं यूरोपीय शैली में कार्य करते हैं और उन पर मौद्रिक अधिकारियों का नियंत्रण होता है 

संगठित वित्तीय बाजार को भी दो भागों में बांटा जाता है 

क मुद्रा बाजार और

ख पूंजी बाजार

क मुद्रा बाजार

इसमें अल्पकालीन निधियों (funds) का लेनदेन होता है। इसमेंRBI UTI LIC GIC इत्यादि शामिल है । 
इसके महत्वपूर्ण घटकों को उपबाजार भी कहा जाता है।
इसके उप बाजार भी कई प्रकार के होते हैं 

*अल्पसाख मुद्रा बाजार 
*बिल बाजार 
*ट्रेजरी बिल बाजार 
*जमा प्रमाण पत्र बाजार

अल्पसाख मुद्रा बाजार 
इसमें ऋण की अवधि 1 से 14 दिनों की होती है ।

बिल बाजार
 इसमें अल्पकालीन विनिमय बिलों की कटौती  कर ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं।

 ट्रेजरी बिल बाजार 
इसमें सरकारी बिलों की सौदेबाजी होती है। सरकारी बिल के भुगतान की गारंटी आरबीआई द्वारा दी जाती है।

जमा प्रमाण पत्र बाजार 
जमा प्रमाण पत्र वाणिज्य बैंकों का एक निश्चित अवधि के लिए सावधि जमा के स्वामित्व का बाजार में बिक्री योग्य दस्तावेज होता है जिसे वाणिज्यिक  बैंकों द्वारा निर्मित किया जाता है ।जमा के आधार पर इसकी परिपक्वता की अवधि 30 दिन से 1 वर्ष तक की होती है।

ख पूँजी बाजार
यह दीर्घकालीन निधियों का बाजार होता है जिसमें वित्तीय संस्थाएं निजी बचतों को जुटाकर दीर्घकालीन फंड प्रदान करती हैं।इसके अंतर्गत IFCI, ICICI ,IDBI IRDB, LIC ,GIC ,SIDBI आदि आते हैं।

पूंजी बाजार के घटक

इसेेे भी दो भागों में बांटा जाता है 

*श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार और 

*औद्योगिक प्रतिभूति बाजार 

श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार 

यह सरकारी प्रतिभूतियों का बाजार है 
केंद्र और राज्य सरकारें स्थानीय निकाय ,बैंक और वित्तीय संस्थाओं को दीर्घकालीन बॉण्ड और प्रतिभूतियां बेचती है।
 इनको केंद्र सरकार का समर्थन होता है ।
यह पूरी तरह से सुरक्षित होती है।
 इन्हें स्वर्णरेखा के प्रतिभूतियां भी कहा जाता है 

औद्योगिक प्रतिभूति 
बाजार इसमें औद्योगिक कंपनियों के नए पुराने शेयर और ऋण पत्रों का व्यापार होता है ।
 इसे भी दो भागों में बांटा जाता है 

प्राथमिक बाजार 
इसमें पब्लिक लिमिटेड कंपनियों के नए यीशु लाए जाते हैं। इसमें शेयर परिवर्तनीय ऋणपत्र शेयर और ऋण पत्र सीधे जनता को निर्गमित किए जाते हैं।

द्वितीयक बाजार
 इसमें पुराने अंश पत्र और ऋण पत्रों का क्रय -विक्रय होता है। इसे पुराने निर्गमन का बाजार भी कहा जाता है।
2 असंगठित वित्तीय बाजार 
 इस बाजार की कार्यप्रणाली अनौपचारिक होती है। इसकी कार्यप्रणाली से लेकर नियम तक अलग-अलग होते हैं। इसका विनियामक नियंत्रण नहीं होता है ।इसमें देशी साहूकार ,देशी बैंकर सम्मिलित होते हैं।

इस पोस्ट में वित्तीय बाजार की संक्षिप्त जानकारी है। यह जानकारी कैसी लगी जरूर बताएं☺😊


AIIB 2015

Asian Infrastructure Investment Bank
(एशियन इन्फ्राट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक)

चीन के पहल से एशिया प्रशांत क्षेत्र में एक बहुउद्देशीय विकास बैंक की शुरुआत की गई जिसका लक्ष्य क्षेत्र में आधारभूत संरचनाओं का विकास करना और सदस्य देशों का विकास करना था । 
एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक के तर्ज पर इसे स्थापित किया जाना था जिसे ऑफीशियली तौर पर दिसंबर 2015 में स्थापित किया गया। इसकी व्यवसायीक  शुरुआत जनवरी 2016 में हुई।
Head quarter (हेड क्वार्टर) 
बीजिंग चीन
Goals (लक्ष्य)
एशिया प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के  आधारभूत संरचनाओं का विकास करना और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना।
Priorities (प्राथमिकता)
ऊर्जा विद्युत उत्पादन, यातायात ,व्यापारिक वस्तुओं के आवागमन के लिए क्षेत्रीय आधारभूत संरचना का विकास और पर्यावरण संरक्षण ।
Initial Capital (प्रारंभिक पूंजी )
100 ट्रिलियन डॉलर जिसमें 20% राशि  paidup है और 80% called up है।
इसमें चीन का वोटिंग शेयर 30 बिलियन डॉलर का है उसके बाद भारत का 6.8 बिलीयन डॉलर है  है उसके बाद रूस का है  बाकी में अन्य देश शामिल है।
भारत एआईआईबी के फाउंडर मेंबर में से एक है एआईआईबी के ऑथराइज्ड कैपिटल में यह दूसरा सबसे बड़ा भागीदार देश है।
Board of Governors(बोर्ड ऑफ गवर्नर्स)
सदस्य देश के एक गवर्नर और एक अल्टरनेट गवर्नर होते हैं यह सदस्य देश द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
Board of Directors (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स )
इसके सदस्यों की संख्या 12 होती है जो बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य नहीं हो सकते 
इसमें से 9 सदस्यों को रीजनल मेंबर्स के गवर्नर के द्वारा चुना जाता है अन्य तीन सदस्य एशिया पेसिफिक रीजन के बाहर के गवर्नर के द्वारा चुने जाते हैं।
डायरेक्टर ऐसे व्यक्ति होते हैं जो आर्थिक और वित्तीय मामले के अच्छे जानकार हो 
डायरेक्टर गवर्नर के प्रतिनिधि के रूप में होते हैं ।
बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स बैंक के सामान्य संचालन, नीतियों के निर्धारण और निर्णय लेने के प्रति उत्तरदाई होते हैं।
सीनियर मैनेजमेंट 
Members( सदस्य)
सदस्य  6
प्रेसिडेंट 1, वाइस प्रेसिडेंट 5
समस्त कार्यों को छह सदस्यों का ही ग्रुप देखता है इस प्रकार बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और सीनियर मैनेजमेंट दोनों के लगभग एक ही प्रकार के कार्य होते हैं।
International Advisory panel
(इंटरनेशनल एडवाइजरी पैनल)
उद्देश्य
प्रेसिडेंट और सीनियर मैनेजमेंट का सपोर्ट करना साथी नीतियों और संचालन में सहायता करना।
नोट -  प्रेसिडेंट इंटर नेशनल एडवाइजरी पैनल के सदस्यों की नियुक्ति 2 वर्षों के लिए करता है जिन्हें नए सिरे से अगले 2 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है या अन्य नए व्यक्ति की नियुक्ति की जा सकती है ।
*पैनल वर्ष में दो बार मिलता है वार्षिक वार्षिक मीटिंग के समय और बैंक हेड क्वार्टर में ।
*पैनल के सदस्यों का कोई वेतन नहीं होता एक सम्मानजनक छोटी राशि दी जाती है।
AIIB की सदस्यता 
विश्व बैंक ,एशियाई विकास बैंक के सदस्य इसके सदस्य बन सकते हैं ।
रीजनल और नन रीजनल एशिया और एशिया के देश इसके सदस्य बन सकते हैं।
 बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन इसके सदस्य बन सकते हैं।
भारत और AIIB
भारत के नजरिए की बात करें तो भारत को प्रथम 10 वर्षों में 4.5 ट्रिलियन डॉलर वित्त की आवश्यकता है जो इसके बुनियादी जरूरतों घरेलू विकास के लिए आवश्यक है।
देश के आंतरिक वित्त प्रबंधन द्वारा विभिन्न क्षेत्र की परियोजनाओं में निवेश की मांग को देखते हुए यह जुटा पाना कठिन है इस प्रकार बहुउद्देशीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति  AIIBद्वारा होगी और इसके लिए मंजूरी भी मिल चुकी है जो चरणबद्ध तरीके से भारत को प्राप्त हो रहा है ।
2020 में ही बैंक द्वारा 75 करोड़ अमेरिकी डॉलर के ऋण की मंजूरी दी गई ताकि भारत कोरोनावायरस लड़ाई में कमजोर तबके की सहायता कर सकें ।
आगामी बैठक 
एआईआईबी के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा 2021 के वार्षिक बैठक की घोषणा की गई ।
यह बैठक 27-28 अक्टूबर 2021 को दुबई यूएई में होगी 
यह पहली बार है जब स्थापना के बाद इस की वार्षिक बैठक मध्य पूर्व एशियाई देश में की जाएगी।
2021 के बैठक में आय आय बी के सदस्य देश साझेदार संस्थाएं व्यापारिक कंपनियां लोक सामाजिक संगठनों और विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए एक मंच तैयार करेगा ।
बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक 2020 में चीन के बीजिंग शहर में हुई थी।
क्या एआईआईबी के माध्यम से चीन द्वारा सदस्य देशों को सहायता  लेनी चाहिए विशेषकर भारत के संदर्भ में
*चीन द्वारा सर्वप्रथम इस बैंक की स्थापना का सुझाव 2009 में ही दिया गया था ।
*अन्य विश्वस्तरीय वित्तीय संस्थाएं विशेषकर विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक पर अमेरिका और जापान का प्रभुत्व होने के चलते चीन या रूस जैसे देश अन्य सदस्यों की तरह ही देखे जाते थे और जब इस संस्था से फंडिंग की बात आती है तो यह जापान और अमेरिका की स्वीकृति के बिना सदस्य देशों को नहीं दे सकता है। उनके प्रभुत्व और हस्तक्षेप के कारण ही चीन द्वारा  AIIB स्थापना की पहल की गई ।
*चीन के पास आवश्यकता से अधिक मुद्रा भंडार होने के कारण भी उसे ऐसी संस्था की आवश्यकता थी जिनके माध्यम से वह इसका उपयोग कर सकें ।
*चीन की मनसा को सभी देश जानते हैं कि उसकी विस्तार वादी नीति   तिब्बत.  बांग्लादेश नेपाल के  अलावा अन्य देशों  को परेशान कर सकते हैं इसीलिए आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देश प्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद लेने से डर रहे हैं ।
*चीन इस बैंक के माध्यम से सदस्य देशों की मदद कर अपनी उदारवादी छवि को विश्व के सामने लाना चाहता है ।
*चीन यह मानता है कि भारत में विकास की असीम संभावनाएं हैं और विकास के लिए भारत के पास खुद के आंतरिक संसाधन है भारत में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित है ।
*भारत को AIIB के माध्यम से दी जाने वाली सहायता या ऋणअंतरराष्ट्रीय समझौते के अंतर्गत दिए जाते हैं जिसमें अन्य दूसरे देश भी शामिल है

*भारत एआईआईबी का फाउंडर मेंबर है जिसकी अंश भागीदारी चीन के बाद सबसे ज्यादा है।
 उपरोक्त तथ्यों द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि एआईआईबी से प्राप्त वित्तीय सहायता या ऋण चीन और भारत दोनों देशों के हित में है।

NABARD 1982

NABARD 1982
 National Bank for Agriculture & Rural Development
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक

*1979  आरबीआई द्वारा एक कमेटी का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष श्री बी शिवरामन थे।

* 1981 संसद द्बारा नाबार्ड के गठन  का अनुमोदन किया गया ।

*12 जुलाई 1982 नाबार्ड अस्तित्व में आया ।

*स्थापना के समय

प्रारंभिक पूंजी    100 करोड़ रुपए थी।

*31 मार्च 2019 तक

 चुकता पूंजी       12500 करोड़ रूपए है।

*प्रबंधक संचालन कुल सदस्य   15 

जिसमें 

अध्यक्ष  1
 
एमडी 1 

*दोनों का कार्यकाल 5 वर्ष है।

राज्य सरकारों के संचालक   4 

केंद्र सरकार के संचालक   3

 व्यापारिक बैंक के संचालक     1 

राज्य सरकारी बैंक के संचालक     2 

रिजर्व बैंक के संचालक        3 

*इन सब की अवधि 3 वर्षों के लिए होती है।

नाबार्ड के वित्त के स्रोत 

अंश पूंजी, रिजर्व और फंड्स, बॉड्स, डिवेंचर ,विशेष कोष जमाए उधार और देयताएं।
 
कार्य

*ग्रामीण ऋण का 50% से अधिक हिस्सा ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक द्वारा दिए जाते हैं जो नाबार्ड द्वारा इन बैंकों को ऋण प्रदान करने के लिए दिए जाते हैं ।

*देश में फूड पार्क के विकास के लिए और उन क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को स्थापित करने के लिए नाबार्ड द्वारा सर्वाधिक ऋण की सुविधा प्रदान की जाती है।

* सहकारी बैंकों को सीधे वित्त की सुविधा दी जाती है।

* ग्रामीण आधारभूत सुविधा विकास निधि द्वारा राज्य सरकार ,सरकारी उपक्रम ,पंचायत, स्वयं सहायता समूह और गैर सरकारी संगठनों को ऋण प्रदान किया जाता है। 

*ग्रामीण आधारभूत परियोजनाओं के विकास के लिए यह वित्त (ऋण )उपलब्ध कराता है।

* प्राथमिक कृषि साख समिति यानी पैक्स के सदस्यों को साख और अन्य सुविधाएं नाबार्ड द्वारा दी जाती हैं ।

*किराए पर कृषि उपकरणों की सुविधा और फसलों के स्टोरेज की व्यवस्था के लिए वित्तीय सहायता  नाबार्ड देता है ।

*कृषि आधारित उत्पादों के परिवहन और विपणन की सुविधा भी पैक्स के माध्यम से नाबार्ड द्वारा दी जाती है।

*प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के अंतर्गत वाटर शेड कार्यक्रम के लिए वित्त पोषक के रूप में भी नाबार्ड महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

* मौसमी कृषि कार्य के लिए इसके द्वारा राज्य सहकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को रियायती दर पर अल्प अवधि के लिए पुनर्वित सुविधा प्रदान की जाती है।


*मत्स्य पालन ,बुनकरों के लिए ,पारस्परिक सहायता समितियों ,सहकारिता क्षेत्र के लिए कार्यशील पूंजी और विपणन के लिए अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के माध्यम से नाबार्ड ऋण प्रदान करता है ।

*किसानों की फसलों के लिए अल्पावधि ऋण नाबार्ड मध्य अवधि के ऋण में बदल देता है बशर्ते की फसल का नुकसान प्राकृतिक आपदा द्वारा हुआ है।

 नोट -नाबार्ड के कार्यों को उद्देश्य के रूप में लिखा जा सकता है।


EXIM BANK- 1982

एक्सिम बैंक 1982 
 भारत सरकार ने भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए और देश के विदेशी व्यापार और निवेश एकीकृत रूप से संचालित करने के लिए EXIM BANK की स्थापना की थी।

* यह भारत के बाहर विदेशी व्यापार को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण संस्था के रूप में कार्यरत है।

*यह एक ऐसी संस्था है जो एक्सपोर्ट इंपोर्ट से संबंधित 
भारतीय लघु और मध्यम उद्योगों की भागीदारी में प्रमुख भूमिका निभाता है।

*इसकी स्थापना के लिए भारतीय संसद द्वारा 1981 में एक बिल पारित किया गया।

* 1982 में इसकी स्थापना हुई और मार्च 1982 से इसने  कार्य करना शुरू किया।

* प्रधान कार्यालय   मुंबई

* स्थापना के समय 
अधिकृत पूंजी 500 करोड़ रूपये

*संचालक मंडल के कुल निर्देशकों की संख्या 12

 जिसमें 

* भारत सरकार के उच्च अधिकारी 5

*अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक के निर्देशक 3 

*उद्योग ,/व्यापार विशेषज्ञ 4 

*आरबीआई, आईडीबीआई, ईसीजीसी लिमिटेड द्वारा मनोनीत सदस्य 3

वित्तीय उत्पाद- क्रेता ऋण ,विदेश निवेश वित्त, ऋण व्यवसाय, कारपोरेट बैंकिंग 

*वित्तीय वर्ष 2019 -20 में कर पश्चात लाभ में वृद्धि 51.22%  2018-19 की तुलना में

कार्य

*यह देसी निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा वाले बाजार में प्रवेश की सुविधाओं सुविधाएं देता है।

*विदेशी खरीदारों के लिए लघु और मध्यम उद्योग की वस्तुओं की खरीदारी के लिए ऋण की सुविधाएं उपलब्ध कराता है।

* विदेशी आयातकों की तरफ से पेड इन एडवांस की सुविधा भी भारतीय निर्यातकों को बैंक देता है 

*यह भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजार में पहुंचने में मदद करता है।

* भारतीय निर्यातकों को वैश्विक स्तर पर स्थापित कर इंडिया ब्रांड को प्रमोट करता है

* बैंक निर्यात से पहले और निर्यात के बाद के जरूरतों को पूरा करने के लिए वित्त प्रदान करता है।

*यह निर्यातकों द्वारा निर्यात किए जाने वाले उत्पादों के शोध और विकास के लिए वित्त प्रदान करता है।

* निर्यात बढ़ाने के लिए गैर परियोजना संबंधित वित्तीय सुविधाएं बैंक द्वारा दी जाती हैं जिससे उत्पादन उपकरण लगाए जाते हैं।

* यह विदेशी व्यापार की समस्याओं का विश्लेषण कर सरकार को सुझाव देता है।

*यह विदेशों में कंपनियों की पहुंच बनाने के लिए भारतीय कंपनियों के विदेशी उपक्रम या इसकी सहायक कंपनियों में निवेश करता है

Administered Interest Rates in India

भारत में प्रशासित ब्याज दरें 
(Administered Interest Rates in India)

आर्थिक विकास में प्रशासित ब्याज दरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो मुद्रा की आपूर्ति और उसके साख से संबंधित होती है। 

कहने का अर्थ है ब्याज दरें अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के मौद्रिक नीति से संबंधित होती हैं जबकि प्रत्यक्ष रूप से आरबीआई इस को प्रभावित करता है। 

यह दरें बचतों को प्रभावित करती हैं उसे प्रोत्साहित करती हैं और विनियोग को एक नई दिशा देती हैं जिनसे औद्योगिकरण की प्रक्रिया तेज होती है।

 इन दरों के घटने या बढ़ने से मौद्रिक तरलता पर प्रभाव पड़ता है जो अर्थव्यवस्था के मौद्रिक आपूर्ति को समय-समय पर समायोजित करती हैं।

भारत में प्रशासित ब्याज दरों के नियमन के कारण
(Causes of regulated administered rates in India)
मुख्य कारण 

*बचत को प्रोत्साहित करना जिससे पूंजी निर्माण के लिए पर्याप्त राशि अर्थव्यवस्था को मिल सके।

* बचत के महत्वपूर्ण हिस्से को प्राथमिक क्षेत्र की ओर प्रवाहित करना जिससे सामुदायिक कल्याण का कार्य किया जा सके।
(प्राथमिक क्षेत्र -कृषि परिवहन लघु उद्योग इत्यादि) 

*अर्थव्यवस्था में तरलता को बनाए रखना ।

*मुद्रा के मांग और आपूर्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करना ।
*मुद्रास्फीति और विस्फिती जैसे कारणों से अर्थव्यवस्था को बचाना।

गौण कारण

*ऋण दाताओं के मध्य अंतर प्रतिस्पर्धा को कम करना ।

*वाणिज्य बैंकों के ऋण पर दिए जाने वाले ब्याज दरों में स्थिरता लाना।

ब्याज दरों के नियंत्रण के उपकरण
( Instruments for controlling of interest rates)

खुले बाजार की क्रियाएं

इसके अंतर्गत आरबीआई प्रथम श्रेणी के प्रतिभूतियों जो पराया सरकारी प्रतिभूतियां होती हैं जिनके भुगतान के पीछे सरकार की गारंटी होती है को खुले बाजार में क्रय विक्रय करता है जिसका प्रभाव वाणिज्यिक बैंकों की ब्याज दरों पर पड़ता है।

बैंक दर 

इस दर से संबंधित ही अन्य ब्याज दरें होती हैं बैंक दर  होता है जिस पर आरबीआई द्वारा आने वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालीन ऋण प्रदान किए जाते हैं। बैंक दर मे परिवर्तन से बाजार दरों में भी परिवर्तन होता है।

परिवर्तनशील नकद आरक्षण कोष

बैंक अपने जमा का एक निश्चित भाग आरबीआई के पास रखते हैं आरबीआई द्वारा इसमें समय के साथ-साथ परिवर्तन किए जाते हैं जिससे ब्याज दरों पर प्रभाव पड़ता है।

चयनात्मक साख नियंत्रण

अर्थव्यवस्था के किसी विशेष क्षेत्र में पूंजी निर्माण की दर को कम करने के लिए साख नियंत्रण का प्रयास किया जाता है । इस प्रकार का नियंत्रण चयनित साख नियंत्रण कहलाता है ।पूंजी निर्माण की प्रक्रिया द्वारा उत्पादन प्रभावित होती है जिससे उस क्षेत्र के वस्तुओं की कीमतों पर इसका प्रभाव पड़ता है ।

कर में छूट देकर या करो को बढ़ाकर

सरकारी प्रतिभूतियों में बचतो की विनियोग करने पर करों में छूूट दी जाती है जिससे बचतकर्ता इन प्रतिभूतियों में विनियोग के लिए कुछ प्रोत्साहित होता हैै।

अन्य प्रतिभूतियो में विनियोग करनेेेेेेे पर करारोपण किया जाता है जो उसे हतोत्साहित करता है ।

आर्थिक सुधारों के अंतर्गत आरबीआई द्वारा नियंत्रित ब्याज दरों मे परिवर्तन समय की मांग थी। 

बैंकों पर आरबीआई के प्रभुत्व के चलते बैंक के कार्य संचालन में लिए जाने वाले निर्णय पूर्ण तः आरबीआई के प्रभाव में थे। 

चक्रवर्ती समिति की अनुशंसा पर ब्याज दरों के विनियमन का प्रयास किया गया ।इसके लिए पहला कदम 1985 में उठाया गया ।

अब तक ब्याज दरों के विनियमन के लिए उठाए गए कदम

*मुद्रा बाजार की दरों को स्वतंत्र बाजार के हवाले कर दिया गया ।

*आरबीआई द्वारा ब्याज दरों की न्यूनतम और उच्चतम सीमा का निर्धारण किया गया जिसके अंतर्गत वाणिज्य बैंक अपनी ब्याज दर निश्चित करें ।

*परिवर्तनशील या गैर परिवर्तनशील ऋण पत्रों पर ब्याज दर का निर्धारण स्वतंत्र छोड़ दिया गया ।

*सावधी ऋणों पर ब्याज निर्धारण स्वतंत्र छोड़ दिया गया। 
*बैंक दरों से अन्य दरो को जोड़ दिया गया ।

*जमा प्रमाण, पत्र ट्रेजरी, बिल वाणिज्य पत्र के ब्याज दरों को बाजार -निर्धारित कर दिया गया।

ब्याज दरों के विनियमन की सीमाएं

*ब्याज दरों को पूर्णतः स्वतंत्र नहीं किया गया ।

*आरबीआई द्वारा आंशिक रूप से नियंत्रित होते हुए भी आरबीआई के अधीन कार्यरत वाणिज्यिक बैंकों की ब्याज दरें समान हो जाती है ।

*बैंकों के पास उपायुक्त आधार संरचना की कमी है।

*अल्पकालिन  मुद्रा की कमी से अल्पकालिक नितियोंकी कमी होती है जो ब्याज दरों से उत्पन्न होने वाले दबाव को कम कर सके ।

*उच्च स्तरीय कार्य कुशल और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी के कारण स्वतंत्र बाजार में व्यवहार करना जोखिम भरा कदम है जो बैंकों के लिए हितकारी नहीं है।

SIDBI 1990

SIDBI  भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक

*स्थापना और कार्य प्रारंभ  1990

*इसने आईडीबीआई बैंक के स्वामित्व के आधीन सहायक बैंक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया।

*यह भारत सरकार वित्त मंत्रालय के अंतर्गत संचालित होता है।

* इसका मुख्य कार्यालय लखनऊ में है ।

*आरबीआई द्वारा इसका विनियमन और पर्यवेक्षण किया जाता है 

उद्देश्य 

*राज्यों में विशेषकर पिछड़े क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर औद्योगिक विकास करना।

*औद्योगिक उपक्रम (सूक्ष्म लघु और मध्यम )का प्रवर्तन करना और उनके प्रबंधन से संबंधित सलाह देना 

*उपक्रमों को वित्तीय सहायता प्रदान करना ।

*औद्योगिक उपक्रमों के लिए आधारभूत सहायता जैसे भवन ,विद्युत, संयंत्र ,प्लांट ,मशीनरी आदि की व्यवस्था देना ।

*नए उद्यमियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।

* नयी परियोजनाओं पर विचार कर उसे वित्त प्रदान करना।

प्रबंध 

इस निगम की स्थापना कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कुछ हद तक हुई है फिर भी कुछ राज्यों में विधान मंडल द्वारा विशेष बिल लाकर इसे राज्य स्तरीय वैधानिक दर्जा दिया गया है ।

राज्य स्तरीय संस्था का पूर्ण स्वामित्व राज्यों के अधीन होता है और उसके पूंजी का विनियोजन भी राज्य सरकारें करती हैं।

 संचालक मंडल के सदस्यों का चयन भी राज्य सरकारों द्वारा ही होता है। 

SIDBI का सबसे बड़ा अंश धारक SBI है जो लगभग 17% अंशो का धारक है ।

*SIDBIके अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक
                        श्री शिवसुब्रमण्यम रमन हैं ।
*संचालक मंडल के सदस्यों की संख्या 10 है।

SIDBI के कार्य 

*लघु और मध्ययम उद्योगों को स्थापित करने के लिए प्लांट और मशीनरी में निवेश करने के लिए जिनकी राशि ₹10करोड़ से कम हो 30 लाख से ज्यादा इकाइयों का सहयोग किया गया।

*लगभग दो करोड़ लोगों को रोजगार दिया गया है

*निर्यात में भागीदारी 35% के आसपास है ।

*औद्योगिक विनिर्माण क्षेत्र में 40% के आसपास है।
 
*बैंक की संपत्तियों में वृद्धि 2020 के अंत तक 1,87,540 करोड रुपए की है जो 2019 की तुलना में 20% ज्यादा है।

*ऋणों में वृद्धि भी 2019 की तुलना में 21% ज्यादा है। 

*शुद्ध लाभ 2020 में 2314.5 करोड रुपए है.☺😊

               

भारतीय औद्योगिक विनियोग बैंक ( IIBI 1971)

 

भारतीय औद्योगिक विनियोग बैंक

इतिहास 

*1971 में भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व के अंतर्गत भारतीय पुनर्निर्माण निगम लिमिटेड के नाम से स्थापित किया गया जिसका उद्देश्य तकनीकी और प्रबंधकीय क्षमता के कारण बंद होने वाली औद्योगिक इकाइयों का पुनर्निर्माण करना था ।

*1985 में इसे भारतीय पुनर्निर्माण बैंक के नाम से पुनर्गठित किया गया।

*1997 में इसे भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक लिमिटेड का नाम दे दिया गया।

*2005 में IIBI को IDBI में विलय पर विचार किया गया लेकिन IIBI द्वारा इंकार कर दिया गया ।

*2006 -07 मे भारत सरकार द्वारा इसे बंद करने का निर्णय लिया गया ।

*2012 में भारत सरकार द्वारा इसे बंद कर दिया गया ।

*मुख्य कार्यालय  -कोलकाता 

*अधिकृत पूंजी  - ₹1000 करोड़ रुपए 

कार्य 

*बीमार औद्योगिक इकाइयों का उत्थान करना 

*उद्योगों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करना 

*औद्योगिक इकाइयों के विकास विस्तार और नवीनीकरण के लिए वित्तीय सहायता देना

 *लिविंग और मर्चेंट बैंकिंग के कार्य करना

 *पूंजी बाजार से ऋण प्राप्त करना 

*उद्योगों को तकनीकी एवं प्रबंधकीय सहयोग देना उनका मार्गदर्शन करना😊😊

IDBI- 1964

IDBI भारतीय औद्योगिक विकास बैंक

परिचय 

*आईडीबीआई की स्थापना 1964 में संसद द्वारा एक बिल पारित कर की गयी।

*इस पर भारत सरकार का स्वामित्व है ।

*वर्तमान में कुल हिस्सेदारी का 77% भाग भारत सरकार के पास है।

इतिहास 

*आईडीबीआई की स्थापना एक औद्योगिक विकास संस्थान के रूप में भारत सरकार द्वारा आईडीबीआई एक्ट 1964 के अंतर्गत की गयी।

* यह 2004 तक एक विकास बैंक के रूप में कार्यरत रहा ।

*2004 में ही इसे बैंक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।

* यह लोक वित्त संस्थान के रूप में संबंधित था जो कंपनी अधिनियम 1956 के प्रावधानों के मुताबिक कार्यरत था। 

*प्रारंभ में यह रिजर्व बैंक की सहायक संस्था के रूप में कार्यरत था।

*1975 में इसे आरबीआई से अलग कर दिया गया ।

*1976 में यह एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था के रूप में भारत सरकार के अधीन पुनर्गठित किया गया।

उद्देश्य

आईएफसीआई, आईसीआईसीआई, आईआरसीआई एलआईसी, यूटीआई ,एसबीआई राष्ट्रीय कृत बैंकों के कार्यों को समन्वित करना ,उनका नियमन करना और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण करना ।

कार्य

*औद्योगिक उपक्रमों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करना ।

*औद्योगिक विकास में प्रयत्नशील उपक्रमों को प्रोत्साहित करना ।

*उद्योग के प्रवर्तन और विस्तार के लिए तकनीकी तथा प्रशासन की सहायता उपलब्ध करना ।

*उद्योगों के विकास से संबंधित बाजार सर्वेक्षण तथा शोध कार्य में भाग लेना ।

*बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा स्वीकृत किए गए औद्योगिक ऋणों को पुनर वित्त उपलब्ध कराना।

*निर्यात को निर्यात का वित्तपोषण करना ।

*अन्य विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं के अंशों एवं ऋण पत्रों में अभिदान करके उनकी सहायता करना।

 उत्पाद और सेवाएं

होम लोन ,संपत्ति से संबंधित ऋण शिक्षा से संबंधित ऋण, व्यक्तिगत ऋण ,प्रतिभूतियों के एवज में ऋण, रिजर्व मोरगेज ऋण ,ऑटो लोन।

सेवाएं

फोन बैंकिंग ,एस एम एस ,इंटरनेट बैंकिंग ,अकाउंट अलर्ट।

*देश में कार्यरत 
 शाखाएं 1892

*मुख्य शाखा      मुंबई 

*एटीएम            3388 

*मार्च 2021 तक 
कुल संपत्ति297,764.04करोड़ रुपये।

* चेयरमैन    एमआर कुमार 

*एमडी एवं सीईओ  राकेश शर्मा ☺☺

ICICI - 1955

 ICICI- भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम

स्थापना  जनवरी 1955 

उद्देश्य    

*निजी क्षेत्र में लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों के विकास के लिए ऋण प्रदान करना ।

*उद्योगों की स्थापना और पुराने उद्योगों के विस्तार के लिए ऋण प्रदान करना ।

नोट    इसे 1955 में एक निजी सीमित कंपनी के रूप में स्थापित किया गया था।

* रिटेल बैंकिंग क्षेत्र में निजी क्षेत्रों द्वारा भारत में कार्य शुरू करने के लिए 1955 में आवेदन किए गए थे जिसमेंICICI भी शामिल थ। इस प्रकार ICICIबैंक की स्थापना भी की गई ।

*1 अप्रैल 1996 को SCICI यानी शिपिंग क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कंपनी ऑफ इंडिया का ICICI में विलय कर दिया गया।

*2002 में आईसीआईसीआई का आईसीआईसीआई बैंक में विलय कर दिया गया जो अब विकास वित्त संस्थान नहीं है ।

आईसीआईसीआई बैंक

*स्थापना   1994

*प्रधान कार्यालय   मुंबई 

*संचालक मंडल के सदस्य  14 

जिसमें से एक की नियुक्ति वाणिज्य मंत्रालय द्वारा की जाती है।

 कार्य

*निवेश बैंकिंग से संबंधित कार्य

*बंधक संपत्तियों पर ऋण प्रदान करना

*निजी बैंकिंग का कार्य करना

 *क्रेडिट कार्ड .चेक बुक .नेट बैंकिंग की सुविधाएं प्रदान करना इत्यादि।

आईसीआईसीआई बैंक भारत का तीसरा सबसे बड़ा बैंक है जबकि निजी क्षेत्र की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा बैंक है।

इसकी 

*कुल शाखाएं    2883 

*एटीएम            10021

* कुल देशों में कार्यरत      19

 *वर्तमान अध्यक्ष     गिरीश चंद्र चतुर्वेदी 

*एमडी और सीईओ     संदीप बख्शी  हैं☺☺


वित्तीय मध्यस्थ (financial intermediary)

पिछले ब्लॉग में हमने वित्तीय प्रणाली के बारे में संक्षिप्त अध्ययन किया था । जिसमें वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटकों के बारे में चर्चा की गई थी। इस ब्लॉग में हम वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक को में से एक वित्तीय मध्यस्थ के बारे में चर्चा करेंगे।


वित्तीय मध्यस्थ

 वित्तीय मध्यस्थ बचतकर्ता और निवेशकों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं । वित्तीय मध्यस्थ में वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक, ऋण समितियां, बीमा कंपनियां और अन्य वित्तीय संस्थाएं शामिल है। वित्तीय मध्यस्थों का मुख्य कार्य प्राथमिक प्रतिभूतियों को द्वितीयक प्रतिभूतियों में बदलना है।

प्राथमिक प्रतिभूतियां

ये प्रतिभूतियों प्रत्यक्ष रूप से जनता को निर्गमित किए जाते हैं इसमें कंपनी जनता से सीधे संपर्क स्थापित करती है।

 द्वितीयक प्रतिभूतियां

जो प्रतिभूतियां वित्तीय मध्यस्थों द्वारा जनता को जारी  की जाती है उनसे जिस कोष का निर्माण होता है उनको विभिन्न कंपनियों के प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है यानी उन कोषो से विभिन्न कंपनियों के शेयर ,बॉन्ड्स, ऋण पत्र का क्रय होता है। 

उदाहरण के लिए जनता द्वारा अपनी बचत से यूटीआई के प्रतिभूतियों को खरीदना प्राथमिक प्रतिभूति का उदाहरण है जबकि जनता से प्राप्त कोषो के द्वारा यूटीआई द्वारा धन का विनियोग अंशऔर ऋणपत्रों में करना यह द्वितीय प्रतिभूति के उदाहरण है।

वित्तीय मध्यस्थों की भूमिका

😊यह बचतों को एकत्रित कर उन्हें गति प्रदान करते हैं।

😊व्यापार के पूंजी निर्माण में मदद करते हैं ।

😊वित्तीय प्रणाली के अंतर्गत माल और सेवाओं के भुगतान के लिए सुविधाजनक तरीके इनके द्वारा प्रदान किए जाते हैं जो डेबिट कार्ड ,क्रेडिट कार्ड या चेक भुगतान के रूप में होते हैं।

😊वित्तीय प्रणाली की तरलता को बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।

😊यह निवेशकों को निवेश के अवसर चुनने में मदद करते हैं और संपत्तियों के जोखिम पूर्ण आवंटन में सहायता करते हैं।

वित्तीय मध्यस्थों के कार्य

😊बचतो को इकट्ठा करके उसे उद्योग जगत को और सरकार को फंड्स के रूप मेें प्रदान करते हैं ।

😊सावधि जमा या बीमा पॉलिसी द्वारा फंड्स को प्राप्त करते हैं और मुद्रा बाजार की प्रतिभूतियां खरीदते हैं। इस प्रकार यह कोषो के द्वारा साख सृजन करते हैं।

 😊अंतिम बचतकर्ता और निवेशकों के मध्य यह जोखिम उठाते हैं और उधारकर्ताओं के जोखिम को कम कर देते हैं ।

😊इनके द्वारा नयी संपत्तियों और  दायित्व का निर्माण किया जाता है ।

😊यह ग्राहकों के संपत्ति में यथा बॉन्ड्स, ऋण पत्र को नकद में बदलने के लिए तत्पर रहते हैं । इस प्रकार ये अर्थव्यवस्था में तरलता को बनाए रखने का काम करते हैं ।

😊वित्तीय मध्यस्थों की विद्यमानता के कारण ब्याज दरों में कमी आती है और विनियोग को प्रोत्साहन मिलता है जिससे पूंजी निर्माण की दर में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास प्रोत्साहित होता है।

वित्तीय मध्यस्थों के प्रकार

1 बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ

इसमें बाणिज्य बैंंक सरकारी बैंक और क्षेत्रीय बैंक सम्मिलित होतेे हैं ।
यह प्राथमिक प्रतिभूतियों  को क्रय करतेे हैं और स्वं ही प्रतिभूतियां और मांग जमाएँ प्रदान करते हैं ।
द्वितीय प्रतिभूतियों का निर्माण करते हैं।

विशेषता

*यह  बचतकर्ता से कोष  प्राप्त कर  प्राथमिक प्रतिभूतियों को खरीदते हैं ।

*बचतो को इकट्ठा कर ऋण योग्य कोष उत्पन्न कर ऋण दाताओं की भूमिका निभाते हैं।
*पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार में तरलता को बनाए रखते हैं और मुद्रा की मांग की पूर्ति करते हैं।
*संगठित क्षेत्र की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में यह सरकार और अन्य बड़े कारपोरेट को  कोष की प्राप्ति में सहायता करते हैं।

2 गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं 

इन्हें भी दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है संगठित क्षेत्र और गैर संगठित क्षेत्र।

संगठित क्षेत्र में आईडीबीआई ,आईएफसीआई; नाबार्ड आते हैं जबकि एलआईसी, जीआईसी ,यूटीआई ,पोस्ट ऑफिस विशिष्ट संस्थाएं हैं।
इसमें यूटीआई एक नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन है जबकि अन्य दो एलआईसी और जी आई सी बीमा धन जमा करती हैंऔर उसे प्रतिभूति बाजार में निवेश करती हैं।डाकघर छोटी बचत को गतिशील बनाते हैं।





वित्तीय प्रणाली (Financial System)

पिछले ब्लॉग में हमने विकास बैंक के बारे में जाना। विभिन्न प्रकार के विकास बैंकों के बारे में विस्तार से चर्चा आने वाले ब्लॉक में होगी। इस ब्लॉग में हम वित्तीय प्रणाली की संक्षिप्त चर्चा करते हैं। बैंक वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटकों में से एक हैं । अतः वित्तीय प्रणाली की जानकारी आवश्यक है। 

हम जानते हैं कि वित्त अर्थव्यवस्था की धुरी होती है जिसके चारों और आर्थिक क्रियाएं चक्कर लगाती हैं । इन आर्थिक क्रियाओं में वित्त यानी फंड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके द्वारा आर्थिक क्रिया संपन्न होती हैं । फंड का सृजन और इसके उपयोग वित्त की महत्वपूर्ण विशेषता होते हैं । इसके सृजन और उपयोग के लिए एक प्रणाली होती है जिसमें तीन लोग मुख्य भूमिका निभाते हैं जमाकर्ता, निवेशक और मांगकर्ता। इस प्रकार वित्तीय प्रणाली वह प्रणाली होती है जो  जमाकर्ता ,निवेशकर्ता ,मांगकर्ता के बीच फंड्स का आवागमन कराती है।

इसमें बहुत सी संस्थाएं सम्मिलित होती हैं जो समाज के बचत को इकट्ठा कर गतिमान करती हैंऔर विनियोग के लिए वित्तीय सेवाएं मुहैया करती हैं।

वित्तीय प्रणाली की विशेषता

☺यह अर्थव्यवस्था में तरलता को बनाए रखती है ।इसके लिए फंड्स को इकट्ठा कर उपयोगकर्ताओं को प्रदान किया जाता है।

उदाहरण ः

☺वाणिज्यिक बैंक द्वारा समाज की बचत को इकट्ठा कर फंड का निर्माण किया जाता है और निवेश कर्ताओं को या उद्योगों में पूंजी लगाने हेतु इसे ऋण के रूप उपलब्ध कराया जाता है। उद्योग स्थापित होने पर अर्थव्यवस्था गतिशील होती है और फंड्स के प्रवाह से अर्थव्यवस्था में तरलता भी बनी रहती है।

☺औद्योगीकरण को तीव्र करने के लिए उत्पादन और विपणन के लिए वित्त की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति वित्तीय तंत्र द्वारा की जाती है।

☺यह सरकार के फंड प्राप्ति का भी एक माध्यम है ।

☺मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार देश के वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण तंत्र होते हैं जो मुद्रा के प्रवाह को निर्बाध गति देते हैं
 
☺यह पूंजी निर्माण के महत्वपूर्ण शोध के रूप में कार्य करती है 

☺नई संपत्तियों के सृजन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक

1 आरबीआई (नियामक) भारत में वित्तीय प्रणाली की सर्वोच्च मौद्रिक और बैंकिंग संस्था है। इसके बारे में संक्षिप्त परिचय पिछले ब्लॉक में दिया जा चुका है।

2 वित्तीय मध्यस्थ इसे दो वर्गों में विभाजित करते हैं बैंकिंग मध्यस्थ और गैर बैंकिंग मध्यस्थ।

☺बैंकिंग मध्यस्थ में वाणिज्य बैंक, सहकारी बैंक व अन्य बैंक खाते हैं 
☺गैर बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ में एलआईसी जीआईसी म्यूच्यूअल फंड इत्यादि आते हैं।

कैसी लगी संक्षिप्त जानकारी कमेंट जरूर करें।




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