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leasing पट्टेदारी

 पट्टादारी

 दो पक्षकारों के मध्य एक संविदा है जिसमें संपत्ति का स्वामी एक निश्चित समय अवधि के लिए अपनी संपत्ति को एक निश्चित किराए के बदले दूसरे पक्षकार को प्रयोग करने का अधिकार देता है।

संपत्ति का स्वामी पट्टादाता और प्रयोग करने वाला पक्षकार पट्टाधारी कहलाता है । 
किराए की राशि मासिक त्रैमासिक छमाही या वार्षिक हो सकती है।
पट्टे की अवधि पूर्ण होने पर संपत्ति को स्वामी को लौटा दिया जाता है या पुनः पट्टे का संविदा कर लिया जाता है।
पट्टेदारी जो पुनः पट्टे के अंतर्गत आती है वह अल्पकाल के लिए होती है ।
दीर्घकालीन पट्टे के संविदा में पट्टाधारी पट्टे पर या तो काय करता है या नए सिरे से पट्टा करने का विकल्प रखता है।

 पट्टे के प्रकार
 
1सेवा पट्टा या परिचालन पट्टा

 यह अल्पकालीन पट्टा होता है जिसकी अवधि संपत्ति के जीवनकाल से कम होती है।
संपत्ति के जीवन काल से पट्टे की अवधि कम होने के कारण इससे प्राप्त राशि द्वारा संपत्ति को अपलिखित नहीं किया जा सकता है परिणाम स्वरूप पट्टादता को निवेश की लागत और उस पर प्राप्त प्रत्याय के लिए या तो दोबारा पट्टा का संविदा करना पड़ता है या अपनी संपत्ति को बेचना पड़ता है ।
इस प्रकार पट्टा दाता के लिए यह पट्टा जोखिम भरा होता है जबकि पट्टाधारी के लिए यह उपयुक्त होता है।
 सेवा पट्टा का उपयोग कंप्यूटर, गाड़ी, वाहन, डाटा प्रोसेसिंग, संदेश वाहन प्रणालियों के लिए किया जाता है जिसमें रखरखाव के लिए विशेषज्ञता प्राप्त तकनीकी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।

2 वित्तीय पट्टा 

यह दीर्घकालीन पट्टा होता है जिसमें निवेश की लागत और
 प्रत्याय की रकम संतोषजनक रूप से पट्टादाता को मिल जाती है ।
यह संविदा एक बार होने के बाद इसके समाप्ति के पहले इसे रद्द नहीं किया जा सकता है।
 इसमें नवीनीकरण का विकल्प बहुत कम होता है क्योंकि पट्टे की अवधि लंबी होती है ।
इस पट्टे में सामान्यतः संपत्ति के अनुरक्षण बीमा और सेवा के लिए पट्टाधारी दायी होता है।

वीत्तीय पट्टा के स्वरूप या प्रकार

1 बिक्री तथा प्रति मुद्रा 

2 प्रत्यक्ष पट्टा देना
 
3 उत्तोलक युक्त पट्टा

4 सरल पटा या संशोधित पट्टा 

5 प्राथमिक एवं द्वितीयक पट्टा

1 बिक्री या प्रति मुद्रा पट्टा 

 इसके अंतर्गत एक फर्म द्वारा अपनी संपत्ति को बेचा जाता है और क्रेता द्वारा उस संपत्ति को विक्रेता को पट्टे पर देना होता है। इस प्रकार पट्टे के इस स्वरूप द्वारा विक्रेता फर्म को रोकड़ की प्राप्ति हो जाती है और संपत्ति के प्रयोग का अधिकार भी होता है जिसके लिए वह किराया पट्टे का भुगतान करता है। ऐसी कंपनियां कार्यशील पूंजी की कमी के कारण ऐसा काम करती हैं। इसमें बीमा कंपनियां लिज़िंग कंपनियां ,पेंशन फंड, निजी वित्त कंपनियां और अन्य वित्तीय संस्थाएं आती हैं ।

2 प्रत्यक्ष पट्टा देना
 
इसके अंतर्गत एक फर्म ऐसी संपत्ति के प्रयोग का अधिकार प्राप्त करती है जिसकी वह पहले से स्वामी नहीं होती है प्रत्यक्ष पट्टा में पूर्तिकर्ता  या निर्माता या लीजिंग कंपनी के माध्यम से संपत्ति की व्यवस्था की जाती है।
प्रथम स्थिति में निर्माता या पूर्तिकर्ता पट्टादाता की भूमिका निभाता है जबकि द्वितीय स्थिति जिसमें संपत्ति की व्यवस्था लीजिंग कंपनी द्वारा की जाती है पट्टादाता की भूमिका निभाता है।
यह कंपनी निर्माता या पूर्तिकर्ता से संपत्ति के क्रय का अनुबंध करती है और संपत्ति के पट्टे के लिए पट्टादाता के साथ अनुबंध करती है। 

3 सरल पटा या संशोधित पट्टा

सरल पट्टा के अंतर्गत कंपनी के प्रत्याशित जीवन काल में ही संभवतः किराया चुकाने की अपेक्षा की जाती है जबकि संशोधित पट्टे के अंतर्गत पट्टाधारी के अनेक विकल्प होते हैं वह संपत्ति को क्रय कर सकता है या उसे वापस कर पट्टा समाप्त भी कर सकता है।। 

4 प्राथमिक एवं द्वितीयक पट्टा

 प्राथमिक पट्टे के अंतर्गत पट्टा किराया इस प्रकार से तय किया जाता है कि पट्टे के प्रारंभिक अवधि में ही संपत्ति की लागत और अपेक्षित लाभ प्राप्त हो जाता है और अंतिम अवधि में नाम मात्र का किराया दिया जाता है। दूसरे शब्दों में प्राथमिक अवधि में किराया द्वितीयक अवधि के किराए से अधिक होता है ।

5 उत्तोलक युक्तपट्टा 

इस पट्टे के अंतर्गत पट्टादाता संपत्ति को ऋण द्वारा प्राप्त करता है और उसे पट्टे पर किराए के रूप में देता है।
 पट्टे की संपत्ति दिए गए ऋण के रूप मोर्गेज  रखी जाती है और पट्टे से प्राप्त राशि द्वारा ऋण का भुगतान किया जाता है। इस प्रकार पट्टादार ऋणी के साथ-साथ स्वामी दोनों की भूमिका निभाता है।

पट्टा और किराया क्रय में अंतर 

1 पट्टे में स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं होता है जबकि किराया क्रय में स्वामित्व का हस्तांतरण होता है।

2 पट्टे में पूरा किराया कर में कटौती के रूप में दिखाया जाता है जबकि किराया क्रय में केवल ब्याज को घटाया जाता है ।

3 पट्टा में पट्टेदार द्वारा दावा नहीं किया जा सकता है संपत्ति को लेकर जबकि किराया क्रय में मूल्यह्रास और अन्य भत्ते को लेकर दावा किया जा सकता है।

4 पट्टे में अवशिष्ट मूल्य को पट्टादारद्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जबकि किराया क्रय में पूरे किस्त के भुगतान के बाद संपत्ति के विशिष्ट मूल्य को प्राप्त किया जा सकता है।
 पट्टा दारी और किराया क्रय पद्धति में संक्षिप्त अंतर के बाद हम किराया क्रय की संक्षिप्त जानकारी लेंगे

किराया क्रय 

यह संपत्ति क्रय की ऐसी विधि होती है जिसमें संपत्ति को तत्काल क्रेता को विक्रेता द्वारा हस्तांतरित किया जाता है उसके स्वामित्व को नहीं जब तक की भुगतान किस्तों की समाप्ति नहीं हो जाती है।

 इस प्रकार इसकी विशेषताएं निम्न है 

1 वस्तु को विक्रेता को तत्काल हस्तांतरित कर दिया जाता है । 

2वस्तु की लागत का भुगतान क्रेता द्वारा किस्तों में किया जाता है ।

3 किस्तों की अंतिम राशि देते ही विक्रेता द्वारा वस्तु का स्वामित्व हस्तांतरित कर दिया जाता है ।

4 किसी किस्त के बकाया रहने पर विक्रेता वस्तु को वापस ले सकता है और 

5 जितनी क़िस्तों को भुगतान पहले किया जा चुका है उसे संपत्ति का किराया भाड़ा समझा जा सकता है।

पट्टाधारी को पट्टा देने के लाभ

1 पट्टादारी पट्टा धारक को यह अवसर देता है कि वह बिना संपत्ति को क्रय किए उसका प्रयोग कर सकता है। 

2 पट्टे पर संपत्ति लेकर कार्य करने में संपत्ति के क्रय व्यवसाय में पट्टे पर संपत्ति लेकर व्यवसाय में उसकी स्थापना ऋनों के जोखिम से पट्टाधारी बचता है।
 
3 आधुनिक तकनीकों में तेजी से परिवर्तन के कारण संपत्ति के ऑपरेशन का जोखिम कम होता है और पट्टा धारक के लिए यह लाभप्रद होता है।

 4 बिक्री और पुनः उस संपत्ति को पट्टा पर लेने के कारण पट्टाधारक अपनी नकदी स्थिति को सुधारने योग्य हो जाता है ।

5 पट्टा एक प्रकार का वित्तीय समझौता होता है जिसका उल्लेख तो लेखांकन दृष्टि से होता है आर्थिक चिट्ठे में पट्टे दार के एक बोझ के रूप में होता है लेकिन संपत्ति के प्रयोग को गुप्त करके वह फर्म के ऋण द्वारा पूंजी निर्माण को प्रभावित नहीं करता।

 6 पट्टा किराया कर योग्य लाभों में सहायक होता है और पट्टा दाता को कर दायित्व में कमी करता है और पट्टा धारी के कर देनदारीयों को भी घटाता है। 

7 सेवा पट्टा या संचालन पट्टा पट्टेधारी को इस योग्य बनाता है कि पट्टा समाप्त कर दिया जाए। स्थिर संपत्ति को यह वित्त प्रदान करने का एक बहुत सुविधाजनक और लचीला तरीका है। 

8 पट्टे के अनुबंध में डिस्पोजल के विक्रय का कोई अनुबंध नहीं होता है ।

9 पट्टा समझौता के अंतर्गत यदि संपत्ति के रखरखाव का प्रवधान पट्टा दाता का हो तो पट्टा धारी को प्रशासनिक और रखरखाव के खर्च बसते हैं ।

हानियां 

1पट्टा धारी संपत्ति का मालिक नहीं है इसीलिए वह संपत्ति में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है ।

2 संपत्ति के स्वामित्व के कुछ भाग कुछ लाभ होते हैं जैसे ह्रास और निवेश जिनसे पट्टाधारी वंचित रहता है ।

3 यदि पट्टा धारी पट्टे का समापन समय से पहले करता है तो उसे पेनल्टी देना पड़ता है ।

4 पट्टा धारी संपत्ति के अशिष्ट मूल्य से वंचित रहता है।

पट्टादाता को पट्टे से लाभ

1 कर दायित्व में कमी आती है 

2 पूंजी की लागत और उस पर उचित प्रत्यय प्राप्त होता है ।

3 पट्टे पर प्राप्त लागत और लाभ अन्य परियोजनाओं की अपेक्षा तेजी से लाभ देते हैं ।

4 लीजिंग कंपनियों द्वारा संपत्ति तरह के समझौते से पट्टादाता लाभ की स्थिति में होता है ।

हानियां

 1 पट्टादाता को उच्च प्रचलन का जोखिम उठाना पड़ता है ।

2 पट्टादाता को वर्तमान समय में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है ।

3 मुद्रास्फीति के कारण संपत्ति के मूल्य में कमी होती है इसके बावजूद भी पटादाता को पिछली लागत पर आधारित स्थिर किराया ही मिलता है। 

4 पट्टा व्यापार में जो निश्चित समय अंतराल पर किराए की राशि का भुगतान प्राप्त होता है उस राशि के प्रवाह में बाधाएं आती हैं

 5 पट्टा दाता को संपत्ति की लागत को प्राप्त करने में लंबा समय लग जाता है जो पट्टा किराए के रूप में प्राप्त होता है।
 .   



Mutual funds पारस्परिक निधियां

पारस्परिक निधि Mutual fund

पारस्परिक निधि एक संस्था है जो वित्तीय मध्यस्थ की भूमिका निभाता है ।यह जनता के बचत को इकट्ठा कर कंपनियों के विभिन्न प्रतिभूतियों में इस प्रकार विनियोग करता है कि निवेशक को लगातार रिटर्न मिलता रहे और जोखिम भी कम हो ।
SEBIअधिनियम 1996 के अनुसार ,

"पारस्परिक निधि एक कोष है जो ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया जाता है ताकि वह जनता को इकाइयों को बेचकर मुद्रा अर्जित कर सके।
वह एक या एक से ज्यादा स्कीमों के प्रतिभूतियों में  विनियोग करने से संबंधित हैजिसमें मुद्रा बाजार भी शामिल है। "

भारत में सबसे पहले 1964 में यूटीआई द्वारा पारस्परिक निधि का काम शुरू किया गया। पारस्परिक निधि को विनियोग ट्रस्ट, बनियोग कंपनी के रूप में भी जाना जाता है। इसे यूएसए में विनियोग ट्रस्ट कहा जाता है। निवेशकों के जरूरत के हिसाब से पारस्परिक निधियों को पांच भागों में बांटा गया है

 1 स्वामित्व के आधार पर 

इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की पारस्परिक निधियां और निजी क्षेत्र की पारस्परिक निधियां शामिल होती हैं ।

2 कार्य योजना के अनुसार 

इसमें खुली अंतिम योजना ,बंद अंतिम योजना और अंतर योजना शामिल है ।

3 पोर्टफोलियो के अनुसार 

इसमें आय कोष ,वृद्धि कोष, परिवर्तन विरोधी कोष, समता कोष, बांड कोष, विशिष्ट कोष ,उत्तोलक कोष, कर निर्धारण कोष, इंडेक्स फंड ,मुद्रा बाजार की पारस्परिक निधियां शामिल होती हैं। 

4 स्थापना के अनुसार 

इसमें घरेलू कोष औरऑफ शोर कोष शामिल है ।

5 बाजार पूंजीकरण के अनुसार

बाजार पूंजीकरण के अनुसार इसे तीन भागों में विभक्त किया जाता है लघु ,मध्यम और वृहद पूंजी वाले पारस्परिक निधियां।

पारस्परिक निधि के लाभ 

1 विभिन्न निवेशकों द्वारा जुटाए गए धन द्वारा पारस्परिक निधि प्रबंधक विभिन्न प्रतिभूतियों में इस प्रकार धन का विनियोग करते हैं जिससे जोखिम कई हिस्सों में बंटकर कम हो जाता है और उचित रिटर्न की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।

 २ छोटे बचतकर्ता है द्वारा पारस्परिक निधि में प्रयोग किया जाता है। पारस्परिक निधि के प्रबंधक बाजार विश्लेषक होते हैं जो विभिन्न प्रतिभूतियों की स्थिति को अच्छी तरह से जानते हैं उन प्रतिभूतियों में ही इन बचतों का निवेश इनके द्वारा किया जाता है। 

3 इनका लाभ यह है कि इस योजना में विनियोग करने पर जल्दी ही प्रतिभूतियों को नकद में बदला जा सकता है।

 4 इसमें अन्य प्रतिभूतियों की अपेक्षा जोखिम कम होता है ।

5 कई ऐसी योजनाएं हैं  जिसमें  पारस्परिक निधियों में ज्यादा पैमाने पर विनियोगकरनेपर बड़े पैमाने की बचत होती है जिससे लागत कम होता है और लाभ प्राप्त होता है ।

6 पारस्परिक निधि विनियोग लचीला होता है और जरूरत के अनुसार विनियोग किए गए राशि को निकाला जा सकता है।

7 सेबी द्वारा इसे सुरक्षा प्रदान की जाती है।

8 कुछ पारस्परिक निधियों में निवेश करने पर कर से राहत भी मिलती है।

भारत में पारस्परिक निधियां

भारत में पारस्परिक निधियों का विकास तीन चरणों में हुआ
 प्रथम चरण 1964 से 1987 तक का था जिसमें यूटीआई ही अकेला था। 
1987 में बैंकिंग विनियम अधिनियम द्वारा संशोधन करके भारत सरकार ने वाणिज्य बैंकों को पारस्परिक निधि शुरू करने की आज्ञा दे दी है।
वाणिज्यिक बैंकों द्वारा पारस्परिक निधि शुरू कर दिए जाने से हर प्रकार के समाज के बच्चों से पैसा इकट्ठा किया जाने लगा।
 एसबीआई ने भी 1987 में ही इसकी शुरुआत की। पीएनबी ने 1990 में ,एलआईसी ने 1989 में और जीआईसी ने 1990 में ही पारस्परिक निधि की शुरुआत की थी ।
कुल 31 पारस्परिक निधियों की शुरुआत यूटीआई को छोड़कर 1993 तक हुई जिसमें 10 सार्वजनिक समूह के और एक प्राइवेट क्षेत्र के थे।
1993 के बाद प्राइवेट संस्थाओं द्वारा पारस्परिक निधियों में प्रवेश किया गया ।
वर्तमान में पारस्परिक निधियोंके संपत्ति का 50% हिस्सेदारी इन्हीं संस्थाओं की है।

भारत में पारस्परिक निधियों की समस्याएं 

1 पारस्परिक निधियों में निवेश करने वाले जब किसी निधि से बाहर निकलना चाहते हैं तो उनके बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं होता बुरी डिलीवरी कई प्रकार की समस्याएं खड़ी कर देती है 

2 निवेशकों को आवश्यकता के मुताबिक पारस्परिक निधियों की कमी है। 

3 इन नदियों पर शोध की कमी के चलते इनके शोध के लिए वाहे स्रोतों पर निर्भर करना पड़ता है इस प्रकार पर्याप्त विकास के लिए यह आवश्यक है कि शोध एवं विकास पर भारत सरकार द्वारा या अन्य भारतीय संस्थाओं द्वारा मुद्रा खर्च की जाए ।

4 पारस्परिक निधियों द्वारा होने वाली हानि रक्षा की गारंटी नहीं दी जाती इसका कारण इसमें जोखिम होता है। 

5 इसमें विनियोगकों की शिकायतों का शीघ्र निपटारा करने में देर होती है ।

6जोखिम प्रबंध में कमी के कारण अपेक्षित रिटर्न  बनियोगर्को को मिल नहीं पाता।

Depositary System

निक्षेपागार प्रणाली 

 इस प्रणाली में जहां लिखित दस्तावेज रहित शेयर व्यापार और जी वविभएकीकृत( डिमॉनेटाइज्डम) प्रकार के प्रतिभूतियों की   के निपटान को आधुनिक तकनीकी द्वारा सक्षम बनाया जाता है । इस नए सिस्टम में कागजी काम का समापन, निपटाने का समय तथा तरलता में बढ़ोतरी पाई जाती है।

निक्षेपागार प्रणाली की रचना

1 निक्षेपागार  सहभागी

 2 लाभकारी निवेशक

 3 जारीकर्ता

 4 निक्षेपागार

1 निक्षेपागार सहभागी

यह निक्षेपागार का एजेंट होता है अगर कोई विनियोजन निक्षेपागार की सेवा लेना चाहता है तो उसे डीपी के यहां अपना अकाउंट खोलना पड़ता है . निक्षेप से संबंधित सभी कार्य निक्षेपागार  सहभागी द्वारा उसी अकाउंट के द्वारा किया जाता है .इस प्रकार  निक्षेपागार सहभागी, निवेशक के बीच कड़ी का काम करता है. 

निक्षेपागार सहभागी द्वारा इसके लिए एक डीमैट अकाउंट खोला जाता है. डिमैट अकाउंट खोलते समय  निक्षेपागारसहभागी और निवेशक के बीच एक ठहराव होता है ननिक्षेपागार सहभागी बैंक, वित्तीय संस्था, दलाल या अन्य गैर बैंकिंग वित्तीय संस्था हो सकते हैं. 

डीपी की सूची- 

केनरा बैंक,सिटीबैंक, डच्च बैंक ,  आईसीआईसीआई बैंक ,आईडीबीआई इत्यादि.

2 लाभकारी निवेशक 

यह व्यक्ति ही प्रतिभूति का वास्तविक स्वामी होता है जिसका नाम निक्षेपी यहां रिकॉर्ड होता है .वही प्रतिभूतियों के पासबुक एंट्री के रूप में जमा करवाता है उसके पास प्रतिभूति से संबंधित अधिकार व दायित्व होते हैं. 

3 जारीकर्ता

जारीकर्ता कंपनी प्रतिभूतियों को जारी करता है .यह प्रतिभूतियों के पंजीकृत मालिकों के नाम निक्षेपी आदि के रिकॉर्ड को रजिस्टर में बनाए रखता है. जारीकर्ता अंशधारियों की सूची जो निक्षेप से जुड़े हैं उन नियमों को भेजता है.

4 निक्षेपागार

यह एक फर्म है जहां पर बिन युवक की प्रतिभूतियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में होल्ड कर रखा जाता है .निक्षेपागार ग्राहकों के प्रतिभूतियों के रूप में कार्य करता है जिसका नाम रिकॉर्ड में प्रकाशित होता है. भारत में इस समय दो ननिक्षेपागार हैं

1 राष्ट्रीय प्रतिभूति निक्षेपागार और 

2 केंद्रीय प्रतिभूति सेवाएं लिमिटेड

1 राष्ट्रीय प्रतिभूति निक्षेपागार लिमिटेड 

National Security Depository Ltd

 भारत का पहला निक्षेपागार संगठन एनएसडीएल था जिसे आईडीबीआई ,यूटीआई और एनएसई ने प्रमोट किया इस के स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य था कि पूंजी बाजार में प्रतिभूतियों का व्यापार इलेक्ट्रॉनिक रूप में किया जाए. 

निक्षेपागार से संबंधित नियम भारत सरकार द्वारा 1995 में बनाया गया और सेबी द्वारा 1996 में इस संदर्भ में दिशानिर्देश जारी किए गए. 

NSDL के कार्य 

1 यह डिपॉजिटरी के रूप में कार्य करता है अर्थात यह प्रशासनिक निकाय होते हैं जो प्रतिभूति ,वित्तीय साधनों और निवेश के शेयरों को डिमैटेरियलाइज्ड रूप में रखते हैं

 2 यह निवेशकों के लिए बैंक के तरह कार्य करता है .

3 यह सुविधाजनक इलेक्ट्रॉनिक रूप में स्टॉक बोनस और डिवेंचर के स्वामित्व की अनुमति देता है.

4 वित्तीय साधनों को भौतिक रूप में रखने में काफी जोखिम उत्पन्न होता है. यह संगठन इस समस्या से छुटकारा दिलाता है और मार्केट अधिग्रहण के भंडारण के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम प्रदान करता है 

5 यह डिपॉजिटरी सेवाओं में लेनदेन के लिए मदद करता है जिसके चलते इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के  निवेश में काफी उछाल आ गया है.

 6 विशेष सेवा - इसमें कल्पित नगद का बांटना, स्कंद उधार, स्पीड तथा इंटरनेट आधारित डिमैट लेखा धारियों के लिए सेवा प्रदान करना शामिल है . 

केंद्रीय निक्षेपागार सेवाएं लिमिटेड 

Central Depository Services Ltd

सीडीएसएल द्वारा 1999 में अपना कार्य शुरू किया गया इसे बीएसए द्वारा प्रमोट किया गया अन्य बैंकों यथा एसबीआई एचडीएफसी यूपीआई आदि द्वारा भी इसे प्रमोट किया गया इसके स्थापना के पीछे का उद्देश्य था सभी भागीदारों को विश्वसनीय एवं सुरक्षित निक्षेपागार सेवा सही लागत पर मिल सके. 

सीडीएसएल के कार्य 

1 सीडीएसएल का नेटवर्क पूरे देश में फैला होने के कारण निवेशक अपने जरूरत के मुताबिक डी पी का चुनाव करता है.

2 सीडीएसएल डीपी की सेवाएं दे सकता है क्योंकि यह केंद्रीकृत डेटाबेस वास्तुशास्त्र पर आधारित है .

3 सीडीएसएल निम्नतम टैरिफ दरों को रखता है ताकि निवेशकों के लिए उचित निक्षेप आगार सेवाएं प्रदान की जा सके. 

4 डीमैट खाता धारक इंटरनेट पर अपने खातों तक पहुंच सकता है क्योंकि डीपीएस इंटरनेट उपयोग करने के लिए सीडीएसएल के साथ पंजीकृत होता है. 

5 कोई भी डीपी या एक निवेशक सीडीएसएल से स्पष्टीकरण और सहायता ले सकता है.

6 सीडीएसएल रिकार्डों को स्टोर करता है जो प्रतिनिधियों के स्वामित्व के बारे में बताते हैं.

निक्षेपागार प्रणाली के लाभ 

A निवेशकों को लाभ 

1 कोषों का जल्दी हस्तांतरण 

एकबार प्रतिभूतियां निवेशकों के खाते में क्रेडिट हो जाती हैं तो निवेशक उन प्रतिभूतियों का वैधानिक मालिक बन जाता है.

2 फिजिकल सर्टिफिकेट के सारे जोखिम खत्म

 फिजिकल रूप में स्टॉक के चोरी का जोखिम जलने का डर बना रहता है परंतु निक्षेपागार योजना में ऐसी कोई समस्या नहीं होती है. 

3 लेखों का विवरण 

विनियोगक निक्षेपागार सहभागी से समय-समय पर लेखे का विवरण प्राप्त करता है और हर महीने एनएसडीएल लेखे का विवरण विनियोगक को जांच करके भेजती है. 

4 दलाली में कमी कागजी काम कम होने के चलते दलाली में 0.25% की कमी आई है.

B जारीकर्ता को लाभ 

1 इसमें पंजीकरण लागत तथा अंश हस्तांतरण की लागत कम हो जाती है. 

2 इससे समय की बचत होती है 

3 इसमें विदेशी निवेशक को बिना खर्च किए आकर्षित किया जा सकता है.

C मध्यस्थों को लाभ 

1 जल्द निपटारा 

2 चोरी धोखाधड़ी के कम अवसर 

3 बुरी सुपुर्दगी का कम जोखिम

क्रेडिट रेटिंग Credit Rating

क्रेडिट रेटिंग का सामान्य अर्थ
क्रेडिट रेटिंग किसी भी देश संस्था या व्यक्ति आदि के कर्ज लेने या उसे चुकाने की क्षमता का मूल्यांकन होता है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसीया परोक्ष रूप से यह बताती हैं कि देश संस्था या व्यक्ति आर्थिक रूप से कितना मजबूत है । उसको कर्ज देना जोखिम से भरा है या नहीं अर्थात वह कर्ज चुकाने की क्षमता रखता है या नहीं।

 क्रेडिट रेटिंग का महत्व

A लोन देने वाले बैंक के लिए

 1 बेहतर निवेश का फैसला 

कोई भी बैंक या उधार देने वाली कंपनियां किसी जोखिम भरे ग्राहक को पैसा नहीं देना चाहती हैं ।क्रेडिट रेटिंग कंपनी को उधार देने वाला व्यक्ति या कंपनी की क्रेडिट योग्यता और जोखिम के बारे में पता चलता है।

 2 लोन राशि की सुरक्षा

 ज्यादा क्रेडिट रेटिंग लोन राशि की सुरक्षा का आश्वासन देता है क्योंकि उसका लोन समय पर ब्याज के साथ वापस हो जाएगा 

B उधार कर्ताओं के लिए 

1 लोन की मंजूरी
 
ज्यादा क्रेडिट रेटिंग मिलने पर उधार लेने वाले ग्राहक को बिना जोखिम वाले ग्राहक के रूप में देखा जाता है और बैंक उसे आसानी से ऋण उपलब्ध करा देते हैं।

 2 कम ब्याज दर 

बैंक विभिन्न प्रकार के ग्राहकों के लिए विभिन्न श्रेणियों के ब्याज दर निर्धारित करते हैं जिन ग्राहकों की क्रेडिट रेटिंग ज्यादा होती है उन्हें विशेष ब्याज दर पर लोन दिए जाते हैं जोकि कम होते हैं।

क्रेडिट रेटिंग की प्रवृत्ति

1सूचनाओं पर आधारित

 क्रेडिट रेटिंग सूचनाओं पर आधारित होता है जिसमें विभिन्न कंपनियों द्वारा साझा की गई सूचनाओं की गोपनीयता के साथ कंपनियों से उसके संबंधों पर उसके साथ मूल्यांकन की क्षमता निर्भर करती है इसलिए क्रेडिट रेटिंग के समय यह एजेंसियां सूचनाओं की गोपनीयता पर विशेष ध्यान देती हैं ।

2एक से ज्यादा एजेंसियों द्वारा क्रेडिट रेटिंग 

सामान्यतः पूर्ण विकसित पूंजी बाजार में एक ही क्रेडिट एजेंसी द्वारा साख मूल्यांकन का कार्य किया जाता है एक से अधिक एजेंसियों के मौजूद रहने पर क्रेडिट रेटिंग में विभिन्नता आ जाती है और कर्ज के मुद्दे पर अलग-अलग रेटिंग निर्धारित की जा सकती है ।
3 पहले से रेटेड संस्थाओं के मामले की निगरानी

 कई ऐसे कारक हैं जो ऋण जारी करने वाली संस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा उन पर निगरानी रखा जाए और रेटिंग का अपडेट जारीकर्ता के साथ संपर्क कर परस्पर क्रिया करने के बाद करना चाहिए।
 
4 क्रेडिट रेटिंग का प्रकाशन 

भारत में केवल जारीकर्ता के प्रार्थना पर ही क्रेडिट रेटिंग का प्रकाशन किया जाता है ।

5 क्रेडिट रेटिंग के विरुद्ध अपील करने का अधिकार

 यदि जारीकर्ता क्रेडिट रेटिंग से असंतुष्ट है तो वह मूल्यांकन एजेंसियों से अतिरिक्त सूचनाओं द्वारा समीक्षा करने के लिए कह सकता है । एजेंसियां एक समीक्षा करती हैं और तब अंतिम निर्णय पर पहुंचती है।
 
6 क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग 

इन एजेंसियों की रैंकिंग इनके सेवा की गुणवत्ता स्थिरता और एकता द्वारा की जाती है।

 7 ऋण पत्रों के लिए साख मूल्यांकन

 क्रेडिट रेटिंग एक विशेष ऋण पत्र के लिए जारी की जाती है जारीकर्ता के लिए नहीं । यह संभव है कि दो ऋण पत्रों को सामान कंपनियों द्वारा जारी किया गया हो और उनकी रेटिंग में परिपक्वता अवधि में भिन्नता के कारण अंतर आ जाए।

 8 उधार बनाम वित्तीय विश्लेषण 

क्रेडिट रेटिंग वित्तीय विश्लेषण की अपेक्षा कहीं ज्यादा व्यापक है। क्रेडिट रेटिंग जारीकर्ता के कहने पर और उसके सहयोग से किया जाता है । इसके विश्लेषण और प्रकाशन के लिए कहीं ज्यादा योग्य और अनुभवी व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।

क्रेडिट रेटिंग  लाभ

A निवेशकों की दृष्टि से 

1निवेशकों की सुरक्षा

क्रेडिट रेटिंग निवेशकों को जारीकर्ता कंपनियों के मजबूती के बारे में पहले ही सूचना देती है । क्रेडिट रेटिंग द्वारा निवेशक अपने निवेश को उच्च क्रेडिट रेटिंग वाले सुरक्षित और कम जोखिम वाले प्रतिभूतियों में अपने पैसे निवेश करने के लिए सुझाव देता है।

2 निवेशकों को निर्णय लेने की आजादी 
 
निवेशक क्रेडिट रेटिंग द्वारा जुड़े संकेतों पर अपने निर्णय लेते हैं । इसके लिए किसी व्यापारिक बैंक स्टॉक दलाल या पोर्टफोलियो मैनेजर ओं की सलाह की आवश्यकता नहीं होती ।

3 निवेश प्रस्तावों को समझने के लिए क्रेडिट रेटिंग से प्राप्त सूचनाओं पर निवेशकों का भरोसा होता है इसलिए वह क्रेडिट रेटिंग प्रतिभूतियों में आसानी से निवेश करती हैं।
 4 कंपनियों में निवेश से पहले उसके बारे में जानकारी लेने में व्यर्थ किए गए समय की बर्बादी से निवेशकों को मुक्ति मिलती है और वह निवेश के लिए जल्दी निर्णय लेते हैं।

 5 मध्यस्थों को उच्च क्रेडिट रेटिंग के पत्रों में निवेश करने के लिए अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का कम प्रयास करना पड़ता है।

B कंपनी के दृष्टि से लाभ

 1 कंपनी को बाजार द्वारा पूंजी प्राप्त करने में सुविधा होती है क्योंकि उच्च वर्ग की क्रेडिट रेटिंग निवेशक ओं में विश्वास पैदा करते हैं ।

2 निवेशक कभी भी सुरक्षित निवेश कम जोखिम और आसान उधार की रिटर्न को सुनिश्चित करता है इसलिए कंपनी उच्च क्रेडिट रेटिंग के ऋण पत्रों या बांड पर कम ब्याज लगाकर उधार की लागत को कम कर सकता है ।

3 एक कंपनी उच्च दर्जा बंदी यानी क्रेडिट रेटिंग द्वारा फंड को आसानी से पैदा कर लेती है इसके लिए उसे विज्ञापन और प्रेस पर कम खर्च करना पड़ता है ।

4 साख मूल्यांकन कंपनी की छवि को ग्राहकों  अंशधारकों निवेशक और लेनदार हूं की नजर मैं वृद्धि करता है निवेशक हूं को निवेश सुरक्षित महसूस होते हैं ।

5 क्रेडिट रेटिंग प्रदाताओं को उनके कार्यों के विस्तार के लिए प्रोत्साहित करती है या उनकी उत्पादन गतिविधियों में विविधता लाती है जिसका संबंध भविष्य में कंपनी की प्रगति से होता है।

क्रेडिट रेटिंग की हानियां

1 क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा विभिन्न कंपनियों के बहुत सारी सूचनाओं को प्रकट नहीं किया जाता है जो निवेश निर्णय को प्रभावित करती हैं क्योंकि महत्वपूर्ण सूचनाओं की कमी के कारण निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है।

 2 एक विशेष समय बिंदु पर कंपनियों का अध्ययन क्रेडिट एजेंसियों के द्वारा किया जाता है । इसमें आर्थिक राजनीतिक पर्यावरण और सरकार द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों का अध्ययन किया जाता है। इनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन क्रेडिट रेटिंग के संकेतों में बदलाव नहीं कर सकता है फलतःनिवेशकों का जोखिम बढ़ जाता है।

3 क्रेडिट रेटिंग क्षमता किसी भी कंपनी के सुदृढ़ता का प्रमाण पत्र नहीं है यह एक विचार है।
 
4 क्रेडिट रेटिंग का कार्य प्रतिकूल समय में किए जाने पर रेटिंग कंपनी की कम हो जाती है जो निवेशकों को भ्रामक निष्कर्ष पर ले जाते हैं जो कंपनी के हित में नहीं होता ।

5 कुछ पत्रों की रेटिंग विभिन्न क्रेडिट एजेंसियों द्वारा अलग-अलग तरीके से की जाती है जिससे रेटिंग में अंतर होता है और कंपनी में निवेश पर प्रभाव पड़ता है।

जोखिम पूंजी Venture Capital

साहस पूंजी  
Venture capital

साहस पूंजी दो शब्दों से मिलकर बना है साहस और पूंजी।साहस  का अर्थ जोखिम उठाना होता है और पूंजी का अर्थ संसाधनों में लगे कोषों से है । 
इस प्रकार साहस पूंजी का तात्पर्य किसी उद्योग में नई परियोजना के शुरू करने हेतु कोषों के प्रवाह से है जिस पर प्राप्त लाभ और हानि की संभावना अनिश्चितता ओं से भरी होती हैं।
 एक उद्योग को लगाने के लिए या नई  कंपनी की स्थापना के लिए या मौजूद उद्योग में नई परियोजनाओं पर काम करने के लिए जोखिम पूंजी की आवश्यकता होती है जिसे प्राप्त करना उद्यमी के लिए काफी कठिन कार्य है ।यह पूंजी निवेशकों के लिए जोखिम के साथ अप्रत्याशित लाभ या हानि से जुड़ा होता है। साहस पूंजी का अधिकतर भाग सामान्य अंश द्वारा प्राप्त किया जाता है पूंजी का कुछ भाग ही ऋणों से प्राप्त होता है । साहस पूंजी को सृजनात्मक पूंजी भी कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा आर्थिक क्रियाओं का सृजन किया जाता है ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है ।
इसके उपयोग हेतु काफी चतुराई की आवश्यकता होती है। किसी कंपनी के दीर्घकालीन जीवन के लिए जोखिम पूंजी के उपयोग की आवश्यकता होती है।

साहस पूंजी की मुख्य विशेषता 

1 साहस पूंजी किसी भी उद्योग के इकाई के लिए आवश्यक होता है ।

2 किसी फर्म द्वारा नए परियोजना पर काम करने के लिए विश्वास पूंजी की आवश्यकता होती है।
 
3 साहस पूंजी अनिश्चितता और जोखिम से भरा होता है कोसों के उपयोग को लेकर।
 
4 साहस का उद्देश्य लाभ कमाना होता है लेकिन हानि भी हो सकती है।
 
5 साहस पूंजी द्वारा प्राप्त लाभ या हानि अप्रत्याशित होते हैं ।

6 साहस पूंजी का उपयोग छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए किया जाता है ।

7 यह मांग पर् देयनहीं होता है जैसा ऋणों के संबंध में होता है।

साहस पूंजी का क्षेत्र
एक परियोजना के विकास की विभिन्न अवस्थाओं में जोखिम पूंजी की आवश्यकता होती है जो विभिन्न रूपों में होती है

1 परियोजना की पहली अवस्था इसमें परियोजना की शुरुआत के लिए प्रारंभिक पूंजी की आवश्यकता होती है जिसमें जोखिम पूंजी का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसे बीज पूंजी भी कहा जाता है 

2 परियोजना का क्रियान्वयन पर योजना को कार्यान्वित रूप देने के लिए भी साहस पूंजी आवश्यक होता है ।

3 उड़ान की अवस्था कोई व्यवसाय ईकाइ जब तेजी से उत्पादन करती है तो विपणन की व्यवस्था के लिए अतिरिक्त कोषों की आवश्यकता होती है जिसमें साहस पूंजी का योगदान होता है।

4 स्थापित अवस्था इस के अंतर्गत फर्म एक बार बाजार में स्थापित हो जाती है तो इसे विस्तार और इसके विविधीकरण के लिए उसकी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति व्यवसाय स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से करता है क्योंकि बाजार में स्थापित होने के बाद इसका पंजीयन हो जाता है और इसे साहस पूंजी प्राप्त करने के लिए विभिन्न रास्ते मिल जाते हैं।

साहस पूंजी के स्रोत
1 समता 
2 ऋण
3 आय नोट

1 समता
समता से तात्पर्य फॉर्म के शुरुआती व्यवस्था के लिए जोखिम उठाने वाले निवेशक की फर्म में हिस्सेदारी या उसके स्वामित्व से है जो फार्म के शुरू करने के पश्चात उस से प्राप्त होने वाले लाभ के रूप में प्राप्त होता है ।

2ऋण
यह रॉयल्टी के रूप में पुनर भुगतान योग्य होता है जब परियोजना विक्रय का सृजन करने लगती है साहस पूंजी द्वारा प्राप्त रॉयल्टी 2 से 15% तक हो सकती है कुछ फंड्स रॉयल्टी की तुलना में ज्यादा भुगतान का विकल्प भी देते हैं।

 3 आय नोट 
इसमें उद्यमी को ब्याज के साथ-साथ विक्रय पर भी रॉयल्टी चुकाना पड़ता है फंड असुरक्षित ऋण के रूप में विभिन्न विकास चरणों में 9% ब्याज पर उपलब्ध कराए जाते हैं और विक्रय पर रॉयल्टी भी उपलब्ध कराई जाती है।
भारत में साहस पूंजी उपलब्ध कराने वाली संस्थाएं
A अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
1आईडीबीआई का साहस पूंजी डिवीजन 
2 जोखिम पूंजी एवं टेक्नोलॉजी वित्त निगम लिमिटेड आईडीबीआई 
3भारतीय टेक्नोलॉजी विकास एवं सूचना कंपनी लिमिटेड (आईसीआईसीआई और यूपीआई द्वारा स्थापित) 

B राज्य वित्त निगम द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
1 गुजरात वेंचर फाइनेंस लिमिटेड 
2 आंध्र प्रदेश औद्योगिक विकास निगम 

C बैंक द्वारा प्रवर्तित कंपनियां 
केनरा बैंक बैंक शेयर कैपिटल फंड 
2 एसबीआई वेंचर कैपिटल फंड 
3 भारतीय विनियोग फंड 
4 इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग

D निजी क्षेत्र की कंपनियां 
1इंडस वेंचर कैपिटल फंड
2 20 सेंचुरी वेंचर और 
3 वेंचर कैपिटल फंड देसाई

Capital Market

Capital Markets (पूंजी बाजार )

वित्तीय बाजार का वह भाग जिसमें मध्यम अवधि और दीर्घ अवधि के प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय होता है पूंजी बाजार कहलाता लाता है। 

पूंजी बाजार के माध्यम से सरकार ,निजी निगम अपने दीर्घकालीन और मध्यकालीन पूंजी की व्यवस्था करते हैं इस पूंजी की पूर्ति व्यापारिक बैंक, एलआईसी ,जीआईसी, आईडीबीआई ,आईएफसीआई ,आईसीआईसीआई ,यूटीआई इत्यादि जैसी संस्थाओं द्वारा की जाती है। ये संस्थाएं पूंजी बाजार में प्रतिभूतियों में जनता के पैसे को निवेश करती हैं और इन प्रतिभूतियों के माध्यम से सरकार और निजी निगम औद्योगिक ढांचे को मजबूत करते हैं और उद्योग धंधे स्थापित करते हैं, उत्पादन का कार्य करते हैं। 

मुद्राबाजार और पूंजी बाजार में अंतर

(Difference between money market and capital market)

 *मुद्रा बाजार अल्पकालीन पुरुषों का बाजार होता है जबकि पूंजी बाजार मध्यकालीन और दीर्घकालीन कोसों का बाजार होता है ।

*मुद्रा बाजार में ट्रेजरी बिल जमा प्रमाण पत्र वाणिज्य कागज पत्र आदि का प्रयोग किया जाता है यानी इन्के माध्यम से लेनदेन का कार्य होता है जबकि पूंजी बाजार में अंशु पत्र ऋण पत्र गॉड इत्यादि का प्रयोग किया जाता है 

*मुद्रा बाजार को प्राथमिक बाजार भी कहा जाता है जबकि पूंजी बाजार को द्वितीयक बाजार कहा जाता है।

*मुद्रा बाजार में दलाल के बिना सौदा तय होते हैं जबकि पूंजी बाजार में दलाल द्वारा से सौदा तय किए जाते हैं।

*मुद्रा बाजार में प्रतिभूतियों का मूल्य बड़ा होता है जबकि पूंजी बाजार में प्रतिभूतियों का मूल्य छोटा होता है।

पूंजी बाजार का गठन 

1 श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार

 2 औद्योगिक प्रतिभूति बाजार

 1श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार 

यह पूर्णत सुरक्षित बाजार होता है जिसके पुनर्भूगतान मे कोई जोखिम नहीं होता है। यह सरकारी या अर्ध सरकारी प्रतिभूतियों का बाजार होता है। यह प्रतिभूतियां केंद्र सरकार, राज्य सरकार स्थानीय सरकार, राजकीय विद्युत बोर्ड ,स्वायत्त सार्वजनिक संस्थाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों की होती हैं। 

 इस बाजार में सरकारी या गैर सरकारी प्रतिभूतियों का लेनदेन होता है यह प्रतिभूतियां पूर्ण रूप से सुरक्षित होती हैं इसीलिए स्वर्ण रेखा किन प्रतिभूतियां कहलाती है ।

सरकारी प्रतिभूतियों में अनेक संस्थाएं सौदा करती हैं क्योंकि नियम अनुसार उन संस्थाओं को अपने कोष का एक निश्चित भाग इन प्रतिभूतियों में निवेश करना पड़ता है। 

 आरबीआई द्वारा खुले बाजार की क्रियाएं सरकारी प्रतिभूतियों को खुले बाजार में खरीदने और बेचने से संबंधित होती हैं जिससे मौद्रिक नियंत्रण अर्थव्यवस्था का होता है।

2 औद्योगिक प्रतिभूति बाजार 

इस बाजार में विभिन्न  उद्योगों की कंपनियों द्वारा नए और पुराने प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय किया जाता है । इन प्रतिभूतियों  का क्रय विक्रय का केंद्र स्टॉक एक्सचेंज होता है । यह सरकार की वित्तीय नीति, आरबीआई की मौद्रिक नीति, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नीतियों द्वारा प्रभावित होता है। 

औद्योगिक प्रतिभूति बाजार को भी दो भागों में बांटा गया है 

क प्राथमिक प्रतिभूति बाजार और 

ख द्वितीयक प्रतिभूति बाजार

क प्राथमिक प्रतिभूति बाजार 

इस बाजार के अंतर्गत कंपनियों द्वारा प्रवर्तन के लिए कोषो की आवश्यकता होती है जिसके लिए वह नए अंश ऋण पत्र या बॉन्डको निर्गमित करते हैं।

ख द्वितीयक बाजार

 इसमें विद्यमान कंपनियों के अंश पत्र और ऋण पत्र का क्रय विक्रय किया जाता है। इन प्रतिभूतियों द्वारा कंपनियां अपने दीर्घकालिन कोषो की पूर्ति करती हैं। इस बाजार में व्यवहार करने वाले विभिन्न मध्यस्थ व्यापारिक बैंक ,दलाल और अन्य संस्थाएं होती हैं।

पूंजी बाजार के उपकरण- सरकारी प्रतिभूतियां, अंश पत्र।

अंशपत्र 

अंकपत्र दो प्रकार के होते हैं समता अंश और पूर्वाधिकार अंश।

समता अंश 

यह उद्योग के वित्त व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। अधिकतर कंपनियां अपनी पूंजी का अधिकतर भाग इस अंश  को निर्गमित कर प्राप्त करती हैं जिसके माध्यम से यह स्थाई पूंजी की व्यवस्था करती हैं। कंपनी को लाभ होने पर इन अंशो पर लाभांश दिया जाता है और इन अंशो के धारक ही कंपनी के वास्तव में स्वामी होते हैं।

 समता अंशो के प्रकार

 ब्लूचीप अंश

यह अंश उन कंपनियों द्वारा निर्गत किया जाता है जिनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है ।

विकास अंश

 यह उन कंपनियों द्वारा जारी किया जाता है जिनका विकास तेजी से होता है ।

चक्रीय या गैर चक्रीय अंश

 जिन कंपनियों के अंशों में उतार चढ़ाव होते होता है वह चक्रीय अंश कहलाते हैं जैसे सीमेंट, ऑटोमोबाइल, निर्माण कंपनियों के अंश।

 गैर चक्रिय अंश में उतार-चढ़ाव नहीं होता है जैसे बीमा कंपनियों के अंश।

स्वेट शेयर

जो शेयर कंपनी के डायरेक्टर और कर्मचारियों को निशुल्क दिए जाते हैं स्वीट शेयर कहलाते हैं ।

अल्फ शेयर

 वे शेयर जो बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद अच्छा प्रत्यय देते हैं अल्फा शेयर कहलाते हैं।

 सुरक्षात्मक शेयर 

ह शेयर अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव के बावजूद भी एक निश्चित प्रत्यय देते हैं।


Money Market

 Money Market मुद्रा बाजार 

(मुद्रा बाजार का अर्थ, मद्रा बाजार की विशेषताएं, मुद्रा बाजार के कार्य,मुद्रा बाजार के अंग)

मुद्रा बाजार का अर्थ

 वित्त बाजार का वह भाग जहां अल्पकालीन प्रतिभूतियों का लेनदेन होता है या अल्पकालीन परिसंपत्तियों का क्रय विक्रय होता है मुद्रा बाजार कहलाता है।

 मुद्रा बाजार की विशेषताएं 

*मुद्रा बाजार एक अल्पकालीन बाजार होता है जिसकी अवधि 1 वर्ष से कम की होती है।
* इसमें अल्पकालीन ऋण ओं का लेनदेन होता हैः 
* इसमें अल्पकालीन ऋण के लिए जिन प्रतिभूतियों या परिसंपत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है उनके अलग-अलग उप बाजार होते हैं।
* यह उद्योगों को कार्यशील पूंजी के लिए धन प्रदान करता है।
*अल्पकालीन ऋण की अवधि 14 दिन 91 दिन और 364 दिन तक के होते हैं।
* मुद्रा बाजार एक ऐसा बाजार होता है जिसके माध्यम से अधिशेष धन घाटे वाले क्षेत्रों में जाते हैं ताकि अस्थाई तरलता के संकट से निपटा जा सके।
 *भारत में दो मुद्रा बाजार केंद्र कोलकाता और मुंबई में है जिन्हें नेशनल मनी मार्केट कहा जाता है।अबअहमदाबाद का स्थान आ रहा है।
*इस बाजार में दलाल का कोई योगदान नहीं होता है।

मुद्रा बाजार के कार्य
*मुद्रा बाजार व्यवसाय निजी संस्थाओं अन्य वित्तीय संस्थाओं गैर वित्तीय संस्थाओं को अल्पकालीन कोर्स उपलब्ध कराता है।
* अतिरिक्त निधियों निधियां जो मुद्रा बाजार में उपलब्ध होती हैं उनका लाभकारी उपयोग मुद्रा बाजार के माध्यम से उपलब्ध होता है।
*यह निधियां बैंक अन्य वित्तीय संस्थाओं व्यवसायिक निगम राज्य व स्थानीय सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं ।
*मुद्रा बाजार अल्पकालीन विधियों को एक बाजार से दूसरे बाजार में भेजने के लिए सस्ता और सुविधा उपलब्ध कराता है 
*एक विकसित मुद्रा बाजार  मुद्रा बाजार को केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों के विभिन्न उपकरणों द्वारा प्रभावित करता है जिससे मुद्रा की आपूर्ति और मांग में स्थिरता बनी रहती है ।
*मुद्रा बाजार में अल्पकालीन विधियों का लेनदेन होता है जहां वचतो का निवेश भी होता है इसलिए निवेश द्वारा प्राप्त संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाता है।

मुद्रा बाजार के अंग 
संगठित मुद्रा बाजार ,असंगठित मुद्रा बाजार और उप बाजार

संगठित मुद्रा बाजार (Organized Money Market)
इसमें आरबीआई शीर्ष संस्था होती है जिसके अधीन राष्ट्रीय कृत बैंक एसबीआई अनुसूचित और गैर अनुसूचित बैंक आते हैं।

असंगठित मुद्रा बाजार (unorganized matket)
इसमें देसी बैंकर ,महाजन ,साहूकार ,चिटफंड आदि आते हैं ।

उप बाजार 
इसके अंतर्गत अल्पसाख सूचना बाजार ,व्यापारिक बिल बाजार, वाणिज्य पत्र बाजार, जमा पत्र बाजार, अंतर बैंक भागीदारी प्रमाण पत्र आते हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात है हमने पिछले ब्लॉक में संगठित बाजार के अंतर्गत आने वाले कुछ संस्थाओं के बारे में बताया है और असंगठित बाजार के बारे में आने वाले ब्लॉक में चर्चा होगी ।अभी उप बाजारों  की संक्षिप्त जानकारी हम ले लेते हैं।

अल्प सूचना बाजार(Call Money Market)
इस बाजार में अल्पकालीन निधियों की अवधि 14 दिनों तक की होती है यह पूर्णता तरल होता है इस बाजार में उपलब्ध प्रतिभूतियां नकद के लगभग बराबर होती हैं जिस दर पर बाजार में को सुधार दिया या लिया जाता है उसे अल्प सूचना साख दर का जाता है।

व्यापारिक बिल बाजार(Commercial Bill Market)
इसमें अल्पकालीन व्यापारिक दिलों का क्रय विक्रय होता है ।व्यापारिक बिल में लिखने वाला व्यक्ति द्वारा जारी किया जाता है। इसमें किसी वाहक को या आदेशित व्यक्ति  को वह मुद्रा की निश्चित राशि के भुगतान का आदेश होता है ।दूसरे शब्दों में विनिमय बिल एक लिखित आदेश होता है जिसमें ऋणदाता ऋणी को मुद्रा की एक निश्चित रकम स्वयं को या आदेशित व्यक्ति को या वाहक को भुगतान  करने का आदेश देता है।

कार्य की दृष्टि से बिल बाजार का विभाजन

*प्रचलित बाजार 
इसमें दलाल बट्टा करने वाले व्यापारी या कंपनियों से सौदा तय करते हैं और कमीशन लेते हैं ।

*बिल ब्रोकर 
यह कंपनियां खुद ही बिलों का बट्टा करती हैं ।

*बट्टा कंपनियां
यह व्यापारियों से डिस्काउंट पर बिलों को खरीदकर उन्हें पूंजी प्रदान करते हैं।

*स्वीकृति बाजार
 इस बाजार में अल्पकालीन बिलों पर वित्तीय मध्यस्थों की स्वीकृति होती है जिन पर स्वीकृति मध्यस्थों द्वारा दे दी जाती है उनकी साख और विनिमय सध्यता बढ़ जाती है और उनकी पुनर्टौती भी आसानी से हो जाती है।

Note
         
विनिमय बिल के पक्षकार
 बिल लिखनेवाला, बिल स्वीकार करने वाला और जिसे बिल की रकम का भुगतान किया जाता ह

बिल की विशेषता 
यह एक लिखित आदेश होता है ।
यह शर्त रहित आज्ञा पत्र होता है ।
इस पर ऋणी के हस्ताक्षर होते हैं। इसपर एक निश्चित रकम लिखी होती है ।
रकम का भुगतान किसी व्यक्ति या वाहक को किया जाता है।

बिल बाजार की कमियां
यह कृषि संबंधी आवश्यकताओं से कोई मतलब नहीं रखते हैं।
 ऋणऔर बिल की रकम की न्यूनतम सीमा निर्धारित होने के कारण छोटे बैंक इस योजना से लाभ नहीं उठा सकते ।
देसी बैंकर और  गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं बिनिमय में बिल से संबंधित कार्य नहीं करते हैं इनके द्वारा सामान्यता मुद्रा बाजार से ही साख सृजन होता है}

ट्रेजरी बिल बाजार
ट्रेजरी बिल बाजार में ट्रेजरी बिलों का क्रय विक्रय होता है।

ट्रेजरी बिल 
यह एक सरकारी प्रतिभूति होती है जिसे आरबीआई द्वारा एक प्रतिज्ञा पत्र के रूप में जारी किया जाता है जिसमें निश्चित तिथि पर एक रकम आरबीआई द्वारा भुगतान की गारंटी दी जाती है।
विशेषता 
यह एक वित्तीय उपकरण है जिसे अंकित मूल्य से कम मूल्य पर ही आरबीआई द्वारा निर्गत किया जाता है किंतु परिपक्वता की अवधि पूर्ण होने पर अंकित मूल्य के बराबर भुगतान किया जाता है। 

भारत में दो प्रकार के ट्रेजरी बिल होते हैं तदर्थ और सामान्य।
 तदर्थ बिलों के प्रयोग की अनुमति राज्य सरकारों और शासकीय विभागों और  देशों के केंद्रीय बैंक को ही है।

ट्रेजरी बिल आरबीआई द्वारा सरकार के एजेंट के रूप में कोष प्राप्त ने के लिए जारी किया जाता है जबकि व्यापारिक बिल निजी वित्तीय संस्था के द्वारा कोस प्राप्त करने के लिए जारी किया जाता है।

वाणिज्य पत्र बाजार(commercial Bill Market)
यह असुरक्षित विनिमय साध्य अल्पकालीन प्रतिज्ञापत्र होते हैं जिनकी एक निश्चित परिपक्वता तिथि होती है विशेषता यह अल्पकालीन प्रतिज्ञापत्र होता है इस प्रपत्र की जिम्मेदारी जारीकर्ता वाणिज्य बैंक तक ही सीमित होती है या अंकित मूल्य से कम मूल्य पर जारी किया जाता है इसकी परिपक्वता की अवधि 3 महीने से 6 महीने तक की होती है इस पर एक निश्चित ब्याज दर होता है इसे खुले रूप में हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है ।

वाणिज्य पत्रों का महत्व 

*कम ब्याज दरों पर कंपनी को ऋण प्राप्त हो जाता है।

*खुले बाजार प्रतियोगिता द्वारा बैंकों को ऋण दरों में 
 कमी करना पड़ता है।

*उद्योग जगत को ऋण प्राप्त करने में और उनकी व्यवस्था के एक भाग के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जमा प्रमाण पत्र (Certificate of Deposits)
जमा प्रमाण पत्र बैंकों द्वारा सावधि जमा के स्वामित्व के लिए निर्धारित किया जाता है 

विशेषता 
*यह अंकित मूल्य से कम उस पर जारी किया जाता है परिपक्वता पर अंकित मूल्य धारक को भुगतान किया जाता है ।
*इसकी परिपक्वता अवधि 30 दिन से 1 वर्ष तक की होती है इस पर स्टांप  ड्यूटी देय हैः।
*अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी करने पर इसे यूरो प्रमाण पत्र कहा जाता है।






वित्तीय बाजार ( Financial Market)


वित्तीय बाजार (Financial Market)

सामान्य अर्थ में बाजार से तात्पर्य स्थान विशेष पर क्रेता विक्रेता का इकट्ठा होना और वस्तुओं का क्रय विक्रय करना है लेकिन इन बाजारों की तरह वित्त बाजार का कोई स्थान नहीं होता। इसमें वे सभी क्षेत्र शामिल किए जाते हैं जहां वित्तीय परिसंपत्तियों का लेनदेन यानी क्रय विक्रय होता है। वित्तीय परिसंपत्तियों के अंतर्गत निम्न चीजें आती हैं ऋण और जमा शेयर ,बाँण्ड, सरकारी प्रतिभूतियां ,बिल, चेक आदि।

वित्तीय बाजार की विशेषताएं
*वित्तीय बाजार का संबंध अन्य बाजारों की तरह किसी निश्चित क्षेत्र से नहीं होता यह व्यापक क्षेत्र होता है

*वित्तीय बाजार में परिसंपत्तियों में अल्पकालीन परिसंपत्तियों और दीर्घकालीन कालीन परिसंपत्तियों का क्रय विक्रय होता है या लेनदेन होता है।

*वित्तीय बाजार कोषों के मांग और पूर्ति में संतुलन से संबंधित होता है।

* इस बाजार में तरलता और सुरक्षा पर ध्यान दिया जाता है।

वित्तीय बाजारों का वर्गीकरण
वित्तीय बाजाार को दो भागों बाटा जाता है

 1संगठित बाजार
 
2 असंगठित बाजार 

1संगठित बाजार

 इसमें उन वित्तीय संस्थाओं को शामिल किया जाता है जो आधुनिक एवं यूरोपीय शैली में कार्य करते हैं और उन पर मौद्रिक अधिकारियों का नियंत्रण होता है 

संगठित वित्तीय बाजार को भी दो भागों में बांटा जाता है 

क मुद्रा बाजार और

ख पूंजी बाजार

क मुद्रा बाजार

इसमें अल्पकालीन निधियों (funds) का लेनदेन होता है। इसमेंRBI UTI LIC GIC इत्यादि शामिल है । 
इसके महत्वपूर्ण घटकों को उपबाजार भी कहा जाता है।
इसके उप बाजार भी कई प्रकार के होते हैं 

*अल्पसाख मुद्रा बाजार 
*बिल बाजार 
*ट्रेजरी बिल बाजार 
*जमा प्रमाण पत्र बाजार

अल्पसाख मुद्रा बाजार 
इसमें ऋण की अवधि 1 से 14 दिनों की होती है ।

बिल बाजार
 इसमें अल्पकालीन विनिमय बिलों की कटौती  कर ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं।

 ट्रेजरी बिल बाजार 
इसमें सरकारी बिलों की सौदेबाजी होती है। सरकारी बिल के भुगतान की गारंटी आरबीआई द्वारा दी जाती है।

जमा प्रमाण पत्र बाजार 
जमा प्रमाण पत्र वाणिज्य बैंकों का एक निश्चित अवधि के लिए सावधि जमा के स्वामित्व का बाजार में बिक्री योग्य दस्तावेज होता है जिसे वाणिज्यिक  बैंकों द्वारा निर्मित किया जाता है ।जमा के आधार पर इसकी परिपक्वता की अवधि 30 दिन से 1 वर्ष तक की होती है।

ख पूँजी बाजार
यह दीर्घकालीन निधियों का बाजार होता है जिसमें वित्तीय संस्थाएं निजी बचतों को जुटाकर दीर्घकालीन फंड प्रदान करती हैं।इसके अंतर्गत IFCI, ICICI ,IDBI IRDB, LIC ,GIC ,SIDBI आदि आते हैं।

पूंजी बाजार के घटक

इसेेे भी दो भागों में बांटा जाता है 

*श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार और 

*औद्योगिक प्रतिभूति बाजार 

श्रेष्ठ प्रतिभूति बाजार 

यह सरकारी प्रतिभूतियों का बाजार है 
केंद्र और राज्य सरकारें स्थानीय निकाय ,बैंक और वित्तीय संस्थाओं को दीर्घकालीन बॉण्ड और प्रतिभूतियां बेचती है।
 इनको केंद्र सरकार का समर्थन होता है ।
यह पूरी तरह से सुरक्षित होती है।
 इन्हें स्वर्णरेखा के प्रतिभूतियां भी कहा जाता है 

औद्योगिक प्रतिभूति 
बाजार इसमें औद्योगिक कंपनियों के नए पुराने शेयर और ऋण पत्रों का व्यापार होता है ।
 इसे भी दो भागों में बांटा जाता है 

प्राथमिक बाजार 
इसमें पब्लिक लिमिटेड कंपनियों के नए यीशु लाए जाते हैं। इसमें शेयर परिवर्तनीय ऋणपत्र शेयर और ऋण पत्र सीधे जनता को निर्गमित किए जाते हैं।

द्वितीयक बाजार
 इसमें पुराने अंश पत्र और ऋण पत्रों का क्रय -विक्रय होता है। इसे पुराने निर्गमन का बाजार भी कहा जाता है।
2 असंगठित वित्तीय बाजार 
 इस बाजार की कार्यप्रणाली अनौपचारिक होती है। इसकी कार्यप्रणाली से लेकर नियम तक अलग-अलग होते हैं। इसका विनियामक नियंत्रण नहीं होता है ।इसमें देशी साहूकार ,देशी बैंकर सम्मिलित होते हैं।

इस पोस्ट में वित्तीय बाजार की संक्षिप्त जानकारी है। यह जानकारी कैसी लगी जरूर बताएं☺😊


वित्तीय मध्यस्थ (financial intermediary)

पिछले ब्लॉग में हमने वित्तीय प्रणाली के बारे में संक्षिप्त अध्ययन किया था । जिसमें वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटकों के बारे में चर्चा की गई थी। इस ब्लॉग में हम वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक को में से एक वित्तीय मध्यस्थ के बारे में चर्चा करेंगे।


वित्तीय मध्यस्थ

 वित्तीय मध्यस्थ बचतकर्ता और निवेशकों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं । वित्तीय मध्यस्थ में वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक, ऋण समितियां, बीमा कंपनियां और अन्य वित्तीय संस्थाएं शामिल है। वित्तीय मध्यस्थों का मुख्य कार्य प्राथमिक प्रतिभूतियों को द्वितीयक प्रतिभूतियों में बदलना है।

प्राथमिक प्रतिभूतियां

ये प्रतिभूतियों प्रत्यक्ष रूप से जनता को निर्गमित किए जाते हैं इसमें कंपनी जनता से सीधे संपर्क स्थापित करती है।

 द्वितीयक प्रतिभूतियां

जो प्रतिभूतियां वित्तीय मध्यस्थों द्वारा जनता को जारी  की जाती है उनसे जिस कोष का निर्माण होता है उनको विभिन्न कंपनियों के प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है यानी उन कोषो से विभिन्न कंपनियों के शेयर ,बॉन्ड्स, ऋण पत्र का क्रय होता है। 

उदाहरण के लिए जनता द्वारा अपनी बचत से यूटीआई के प्रतिभूतियों को खरीदना प्राथमिक प्रतिभूति का उदाहरण है जबकि जनता से प्राप्त कोषो के द्वारा यूटीआई द्वारा धन का विनियोग अंशऔर ऋणपत्रों में करना यह द्वितीय प्रतिभूति के उदाहरण है।

वित्तीय मध्यस्थों की भूमिका

😊यह बचतों को एकत्रित कर उन्हें गति प्रदान करते हैं।

😊व्यापार के पूंजी निर्माण में मदद करते हैं ।

😊वित्तीय प्रणाली के अंतर्गत माल और सेवाओं के भुगतान के लिए सुविधाजनक तरीके इनके द्वारा प्रदान किए जाते हैं जो डेबिट कार्ड ,क्रेडिट कार्ड या चेक भुगतान के रूप में होते हैं।

😊वित्तीय प्रणाली की तरलता को बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।

😊यह निवेशकों को निवेश के अवसर चुनने में मदद करते हैं और संपत्तियों के जोखिम पूर्ण आवंटन में सहायता करते हैं।

वित्तीय मध्यस्थों के कार्य

😊बचतो को इकट्ठा करके उसे उद्योग जगत को और सरकार को फंड्स के रूप मेें प्रदान करते हैं ।

😊सावधि जमा या बीमा पॉलिसी द्वारा फंड्स को प्राप्त करते हैं और मुद्रा बाजार की प्रतिभूतियां खरीदते हैं। इस प्रकार यह कोषो के द्वारा साख सृजन करते हैं।

 😊अंतिम बचतकर्ता और निवेशकों के मध्य यह जोखिम उठाते हैं और उधारकर्ताओं के जोखिम को कम कर देते हैं ।

😊इनके द्वारा नयी संपत्तियों और  दायित्व का निर्माण किया जाता है ।

😊यह ग्राहकों के संपत्ति में यथा बॉन्ड्स, ऋण पत्र को नकद में बदलने के लिए तत्पर रहते हैं । इस प्रकार ये अर्थव्यवस्था में तरलता को बनाए रखने का काम करते हैं ।

😊वित्तीय मध्यस्थों की विद्यमानता के कारण ब्याज दरों में कमी आती है और विनियोग को प्रोत्साहन मिलता है जिससे पूंजी निर्माण की दर में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास प्रोत्साहित होता है।

वित्तीय मध्यस्थों के प्रकार

1 बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ

इसमें बाणिज्य बैंंक सरकारी बैंक और क्षेत्रीय बैंक सम्मिलित होतेे हैं ।
यह प्राथमिक प्रतिभूतियों  को क्रय करतेे हैं और स्वं ही प्रतिभूतियां और मांग जमाएँ प्रदान करते हैं ।
द्वितीय प्रतिभूतियों का निर्माण करते हैं।

विशेषता

*यह  बचतकर्ता से कोष  प्राप्त कर  प्राथमिक प्रतिभूतियों को खरीदते हैं ।

*बचतो को इकट्ठा कर ऋण योग्य कोष उत्पन्न कर ऋण दाताओं की भूमिका निभाते हैं।
*पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार में तरलता को बनाए रखते हैं और मुद्रा की मांग की पूर्ति करते हैं।
*संगठित क्षेत्र की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में यह सरकार और अन्य बड़े कारपोरेट को  कोष की प्राप्ति में सहायता करते हैं।

2 गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं 

इन्हें भी दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है संगठित क्षेत्र और गैर संगठित क्षेत्र।

संगठित क्षेत्र में आईडीबीआई ,आईएफसीआई; नाबार्ड आते हैं जबकि एलआईसी, जीआईसी ,यूटीआई ,पोस्ट ऑफिस विशिष्ट संस्थाएं हैं।
इसमें यूटीआई एक नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन है जबकि अन्य दो एलआईसी और जी आई सी बीमा धन जमा करती हैंऔर उसे प्रतिभूति बाजार में निवेश करती हैं।डाकघर छोटी बचत को गतिशील बनाते हैं।





वित्तीय प्रणाली (Financial System)

पिछले ब्लॉग में हमने विकास बैंक के बारे में जाना। विभिन्न प्रकार के विकास बैंकों के बारे में विस्तार से चर्चा आने वाले ब्लॉक में होगी। इस ब्लॉग में हम वित्तीय प्रणाली की संक्षिप्त चर्चा करते हैं। बैंक वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटकों में से एक हैं । अतः वित्तीय प्रणाली की जानकारी आवश्यक है। 

हम जानते हैं कि वित्त अर्थव्यवस्था की धुरी होती है जिसके चारों और आर्थिक क्रियाएं चक्कर लगाती हैं । इन आर्थिक क्रियाओं में वित्त यानी फंड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके द्वारा आर्थिक क्रिया संपन्न होती हैं । फंड का सृजन और इसके उपयोग वित्त की महत्वपूर्ण विशेषता होते हैं । इसके सृजन और उपयोग के लिए एक प्रणाली होती है जिसमें तीन लोग मुख्य भूमिका निभाते हैं जमाकर्ता, निवेशक और मांगकर्ता। इस प्रकार वित्तीय प्रणाली वह प्रणाली होती है जो  जमाकर्ता ,निवेशकर्ता ,मांगकर्ता के बीच फंड्स का आवागमन कराती है।

इसमें बहुत सी संस्थाएं सम्मिलित होती हैं जो समाज के बचत को इकट्ठा कर गतिमान करती हैंऔर विनियोग के लिए वित्तीय सेवाएं मुहैया करती हैं।

वित्तीय प्रणाली की विशेषता

☺यह अर्थव्यवस्था में तरलता को बनाए रखती है ।इसके लिए फंड्स को इकट्ठा कर उपयोगकर्ताओं को प्रदान किया जाता है।

उदाहरण ः

☺वाणिज्यिक बैंक द्वारा समाज की बचत को इकट्ठा कर फंड का निर्माण किया जाता है और निवेश कर्ताओं को या उद्योगों में पूंजी लगाने हेतु इसे ऋण के रूप उपलब्ध कराया जाता है। उद्योग स्थापित होने पर अर्थव्यवस्था गतिशील होती है और फंड्स के प्रवाह से अर्थव्यवस्था में तरलता भी बनी रहती है।

☺औद्योगीकरण को तीव्र करने के लिए उत्पादन और विपणन के लिए वित्त की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति वित्तीय तंत्र द्वारा की जाती है।

☺यह सरकार के फंड प्राप्ति का भी एक माध्यम है ।

☺मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार देश के वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण तंत्र होते हैं जो मुद्रा के प्रवाह को निर्बाध गति देते हैं
 
☺यह पूंजी निर्माण के महत्वपूर्ण शोध के रूप में कार्य करती है 

☺नई संपत्तियों के सृजन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक

1 आरबीआई (नियामक) भारत में वित्तीय प्रणाली की सर्वोच्च मौद्रिक और बैंकिंग संस्था है। इसके बारे में संक्षिप्त परिचय पिछले ब्लॉक में दिया जा चुका है।

2 वित्तीय मध्यस्थ इसे दो वर्गों में विभाजित करते हैं बैंकिंग मध्यस्थ और गैर बैंकिंग मध्यस्थ।

☺बैंकिंग मध्यस्थ में वाणिज्य बैंक, सहकारी बैंक व अन्य बैंक खाते हैं 
☺गैर बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ में एलआईसी जीआईसी म्यूच्यूअल फंड इत्यादि आते हैं।

कैसी लगी संक्षिप्त जानकारी कमेंट जरूर करें।




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