उद्यमिता

 

उद्यमिता  की परिभाषा

उद्यमिता से आशय उद्यमी द्वारा किए जाने वाले  कार्यों  से है जिसमें उद्यमी किसी नए व्यवसाय को स्थापित करने से संबंधित विभिन्न कार्यों को करता है.

उद्यमी

उद्यमी से ऐसे ऐसे व्यक्ति से है जो जोखिम को उठाता है संसाधनों की व्यवस्था करता है और व्यवसाय के प्रति कौशल दृष्टिकोण रखने वाला होता है.

 संसाधन

मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिन वस्तुओं पर लंबी अवधि तक निर्भर रहा जाता है संसाधन कहलाते हैं.

उद्यमी द्वारा प्रयुक्त संसाधन

पूंजी ,भूमि ,श्रम ,कच्चा माल, संगठन 

उद्यमिता की आवश्यकता एवं महत्व

1 नवाचारों को प्रोत्साहन देने में - यहां नवाचार का मतलब है उत्पादन की नई विधि नई मशीन नई वस्तुओं को नई टेक्नोलॉजी द्वारा उत्पादन करना है .
2 व्यावसायिक इकाइयों की स्थापना में- व्यवसायिक इकाइयों की स्थापना के लिए उद्यमिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके अंतर्गत आधुनिक मशीनें प्रशिक्षित उद्यमी द्वारा सफलतापूर्वक लगाई जाती हैं और उद्योग स्थापित किया जाता है.
3 आर्थिक विकास को तेज करने में- उद्यमिता द्वारा औद्योगिकरण की प्रक्रिया तेज होती है जिससे आर्थिक विकास में मदद मिलती है व्यवसाय कौशल बढ़ते हैं.
4 पूंजी के निर्माण में - उद्यमिता देश की बचतों को इकट्ठा कर गति प्रदान करती है जिससे समुचित प्रत्यय प्राप्त होता है और पूंजी निर्माण में मदद मिलती है.
5 सामाजिक परिवर्तन का आधार- उद्यमिता सामाजिक अर्थ में सामाजिक परिवर्तन का आधार होता है जो कि नए उद्योगों की स्थापना से समाज के रूढ़िवादी विचारधारा को बदलता है

उद्यमिता के कार्य

1 उद्यमिता द्वारा नव सृजन का कार्य होता है जिसके अंतर्गत नए उत्पादन विधि, नए बाजार, नए संगठन, कच्चे माल  की आपूर्ति के नए स्रोत इत्यादि का पता लगाया जाता है

2 उद्यमिता संगठन का निर्माण भी करता है ताकि जिम्मेदार लोगों को कार्यों को सौंपा जा सके और वह निश्चित उद्देश्य को प्राप्त कर सकें.

3 उद्यमिता के अंतर्गत वस्तु उत्पादन से लेकर के वितरण तक के समस्त कार्य सम्मिलित होते हैं.

4 उद्यमिता में सृजनात्मक का महत्वपूर्ण स्थान होता है प्रत्येक उद्यमी ने परिवेश में पुराने उत्पादों में परिवर्तन लाता है और नए अवसरों की खोज कर नए उत्पादों से समाज को परिचित कराता है.

5  उद्यमिता का कार्य जोखिम और चुनौतियों से भरा होता है इसीलिए उन चुनौतियों को पहचान कर कीमत और बाजार के अनिश्चित व्यवहार का सामना उद्यमिता द्वारा ही किया जा सकता है.

उद्यमिता के स्वरूप

1 स्वामित्व के आधार पर
2 परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर
3 स्थान के आधार पर
4 साहसिक कार्य के आधार पर

1  स्वामित्व के आधार पर

इसमें  व्यक्तिगत उद्यमिता, राज्य उद्यमिता, व्यक्ति और सरकार का मिला-जुला, रूप व्यक्तियों का समूह सम्मिलित होते हैं

2 परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर

इसमें उत्पादन की परंपरागत   प्रणाली और 
आधुनिक उत्पादन की विधियां  सम्मिलित होते हैं.

3 स्थान के आधार पर

इसमें किसी क्षेत्र विशेष में स्थापित उपक्रम और एक उपक्रम द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित इकाइयां दोनों सम्मिलित होती हैं

4 साहसिक कार्य के आधार पर

नैत्यक  और नवीन कार्य
नैत्यक  कार्य में साहसी का मुख्य कार्य उपयुक्त योजनाओं को निर्णय को एवं कार्यक्रम को सफल बनाना है उचित तरीके से प्रबंधन करना है.

नवीन कार्य में नवीन विचारों का सृजन उनका क्रियान्वयन लाभ के अवसरों की खोज शामिल किए जाते हैं. 

उद्यमिता के सामाजिक और आर्थिक लाभ

1 लघु व्यवसाय का विकास करना
2 बाजार की व्यवस्था करना एकाधिकार के मूल्य पर नियंत्रण होना
3 श्रेष्ठ वस्तुओं को उचित मूल्य पर उपलब्ध करना
4 संभावी अवसरों की पहचान करना और व्यवसाय को  विकसित करने का प्रयास करना
5 उद्यमिता द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन द्वारा लोगों के सामाजिक जीवन स्तर में वृद्धि करना

 भारत में उद्यमिता की भूमिका

भारत जैसे देश में आत्मविश्वास और दूरदृष्टा व्यक्ति नौकरी के जगह पर छोटा व्यवसाय प्रारंभ करता है .उद्यमिता लोगों को स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है .भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमी प्रगति का कारण उद्यमिता का धीमा विकास है. श्रम शक्ति और संसाधन की पर्याप्तता के बावजूद उद्यमिता की कमी है . इन चीजों को वर्तमान सरकार ने पहचाना है. इसलिए उद्यमियों को विशेष सुविधाएं दी जा रही  हैं . उद्यमियों को दी जाने वाली सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार द्वारा कई संस्थाएं जैसे भारतीय औद्योगिक विकास बैंक
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक ,लघु उद्योग विकास संगठन ,लघु उद्योग निगम उद्योग निदेशालय , स्थापित किए गए हैं . कुछ वित्तीय संस्थाओं द्वारा उभरते युवकों और उद्यमियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है . सरकार और इन संस्थाओं के निरंतर  प्रयत्नों से अनुकूल परिणाम सामने आने लगे हैं . बड़ी संख्या में अति लघु और मध्यम औद्योगिक इकाइयां लगने लगी है .उद्यमिता जिन समस्याओं का सामना करती है उनमें कच्चे माल की कमी पूंजी की कमी, बिजली की कमी ,प्रशिक्षण सुविधा का अभाव, गुणवत्ता का अभाव, विपणन का अभाव सम्मिलित है. सरकार को इसका स्थाई निराकरण करना चाहिए.




leasing पट्टेदारी

 पट्टादारी

 दो पक्षकारों के मध्य एक संविदा है जिसमें संपत्ति का स्वामी एक निश्चित समय अवधि के लिए अपनी संपत्ति को एक निश्चित किराए के बदले दूसरे पक्षकार को प्रयोग करने का अधिकार देता है।

संपत्ति का स्वामी पट्टादाता और प्रयोग करने वाला पक्षकार पट्टाधारी कहलाता है । 
किराए की राशि मासिक त्रैमासिक छमाही या वार्षिक हो सकती है।
पट्टे की अवधि पूर्ण होने पर संपत्ति को स्वामी को लौटा दिया जाता है या पुनः पट्टे का संविदा कर लिया जाता है।
पट्टेदारी जो पुनः पट्टे के अंतर्गत आती है वह अल्पकाल के लिए होती है ।
दीर्घकालीन पट्टे के संविदा में पट्टाधारी पट्टे पर या तो काय करता है या नए सिरे से पट्टा करने का विकल्प रखता है।

 पट्टे के प्रकार
 
1सेवा पट्टा या परिचालन पट्टा

 यह अल्पकालीन पट्टा होता है जिसकी अवधि संपत्ति के जीवनकाल से कम होती है।
संपत्ति के जीवन काल से पट्टे की अवधि कम होने के कारण इससे प्राप्त राशि द्वारा संपत्ति को अपलिखित नहीं किया जा सकता है परिणाम स्वरूप पट्टादता को निवेश की लागत और उस पर प्राप्त प्रत्याय के लिए या तो दोबारा पट्टा का संविदा करना पड़ता है या अपनी संपत्ति को बेचना पड़ता है ।
इस प्रकार पट्टा दाता के लिए यह पट्टा जोखिम भरा होता है जबकि पट्टाधारी के लिए यह उपयुक्त होता है।
 सेवा पट्टा का उपयोग कंप्यूटर, गाड़ी, वाहन, डाटा प्रोसेसिंग, संदेश वाहन प्रणालियों के लिए किया जाता है जिसमें रखरखाव के लिए विशेषज्ञता प्राप्त तकनीकी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।

2 वित्तीय पट्टा 

यह दीर्घकालीन पट्टा होता है जिसमें निवेश की लागत और
 प्रत्याय की रकम संतोषजनक रूप से पट्टादाता को मिल जाती है ।
यह संविदा एक बार होने के बाद इसके समाप्ति के पहले इसे रद्द नहीं किया जा सकता है।
 इसमें नवीनीकरण का विकल्प बहुत कम होता है क्योंकि पट्टे की अवधि लंबी होती है ।
इस पट्टे में सामान्यतः संपत्ति के अनुरक्षण बीमा और सेवा के लिए पट्टाधारी दायी होता है।

वीत्तीय पट्टा के स्वरूप या प्रकार

1 बिक्री तथा प्रति मुद्रा 

2 प्रत्यक्ष पट्टा देना
 
3 उत्तोलक युक्त पट्टा

4 सरल पटा या संशोधित पट्टा 

5 प्राथमिक एवं द्वितीयक पट्टा

1 बिक्री या प्रति मुद्रा पट्टा 

 इसके अंतर्गत एक फर्म द्वारा अपनी संपत्ति को बेचा जाता है और क्रेता द्वारा उस संपत्ति को विक्रेता को पट्टे पर देना होता है। इस प्रकार पट्टे के इस स्वरूप द्वारा विक्रेता फर्म को रोकड़ की प्राप्ति हो जाती है और संपत्ति के प्रयोग का अधिकार भी होता है जिसके लिए वह किराया पट्टे का भुगतान करता है। ऐसी कंपनियां कार्यशील पूंजी की कमी के कारण ऐसा काम करती हैं। इसमें बीमा कंपनियां लिज़िंग कंपनियां ,पेंशन फंड, निजी वित्त कंपनियां और अन्य वित्तीय संस्थाएं आती हैं ।

2 प्रत्यक्ष पट्टा देना
 
इसके अंतर्गत एक फर्म ऐसी संपत्ति के प्रयोग का अधिकार प्राप्त करती है जिसकी वह पहले से स्वामी नहीं होती है प्रत्यक्ष पट्टा में पूर्तिकर्ता  या निर्माता या लीजिंग कंपनी के माध्यम से संपत्ति की व्यवस्था की जाती है।
प्रथम स्थिति में निर्माता या पूर्तिकर्ता पट्टादाता की भूमिका निभाता है जबकि द्वितीय स्थिति जिसमें संपत्ति की व्यवस्था लीजिंग कंपनी द्वारा की जाती है पट्टादाता की भूमिका निभाता है।
यह कंपनी निर्माता या पूर्तिकर्ता से संपत्ति के क्रय का अनुबंध करती है और संपत्ति के पट्टे के लिए पट्टादाता के साथ अनुबंध करती है। 

3 सरल पटा या संशोधित पट्टा

सरल पट्टा के अंतर्गत कंपनी के प्रत्याशित जीवन काल में ही संभवतः किराया चुकाने की अपेक्षा की जाती है जबकि संशोधित पट्टे के अंतर्गत पट्टाधारी के अनेक विकल्प होते हैं वह संपत्ति को क्रय कर सकता है या उसे वापस कर पट्टा समाप्त भी कर सकता है।। 

4 प्राथमिक एवं द्वितीयक पट्टा

 प्राथमिक पट्टे के अंतर्गत पट्टा किराया इस प्रकार से तय किया जाता है कि पट्टे के प्रारंभिक अवधि में ही संपत्ति की लागत और अपेक्षित लाभ प्राप्त हो जाता है और अंतिम अवधि में नाम मात्र का किराया दिया जाता है। दूसरे शब्दों में प्राथमिक अवधि में किराया द्वितीयक अवधि के किराए से अधिक होता है ।

5 उत्तोलक युक्तपट्टा 

इस पट्टे के अंतर्गत पट्टादाता संपत्ति को ऋण द्वारा प्राप्त करता है और उसे पट्टे पर किराए के रूप में देता है।
 पट्टे की संपत्ति दिए गए ऋण के रूप मोर्गेज  रखी जाती है और पट्टे से प्राप्त राशि द्वारा ऋण का भुगतान किया जाता है। इस प्रकार पट्टादार ऋणी के साथ-साथ स्वामी दोनों की भूमिका निभाता है।

पट्टा और किराया क्रय में अंतर 

1 पट्टे में स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं होता है जबकि किराया क्रय में स्वामित्व का हस्तांतरण होता है।

2 पट्टे में पूरा किराया कर में कटौती के रूप में दिखाया जाता है जबकि किराया क्रय में केवल ब्याज को घटाया जाता है ।

3 पट्टा में पट्टेदार द्वारा दावा नहीं किया जा सकता है संपत्ति को लेकर जबकि किराया क्रय में मूल्यह्रास और अन्य भत्ते को लेकर दावा किया जा सकता है।

4 पट्टे में अवशिष्ट मूल्य को पट्टादारद्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जबकि किराया क्रय में पूरे किस्त के भुगतान के बाद संपत्ति के विशिष्ट मूल्य को प्राप्त किया जा सकता है।
 पट्टा दारी और किराया क्रय पद्धति में संक्षिप्त अंतर के बाद हम किराया क्रय की संक्षिप्त जानकारी लेंगे

किराया क्रय 

यह संपत्ति क्रय की ऐसी विधि होती है जिसमें संपत्ति को तत्काल क्रेता को विक्रेता द्वारा हस्तांतरित किया जाता है उसके स्वामित्व को नहीं जब तक की भुगतान किस्तों की समाप्ति नहीं हो जाती है।

 इस प्रकार इसकी विशेषताएं निम्न है 

1 वस्तु को विक्रेता को तत्काल हस्तांतरित कर दिया जाता है । 

2वस्तु की लागत का भुगतान क्रेता द्वारा किस्तों में किया जाता है ।

3 किस्तों की अंतिम राशि देते ही विक्रेता द्वारा वस्तु का स्वामित्व हस्तांतरित कर दिया जाता है ।

4 किसी किस्त के बकाया रहने पर विक्रेता वस्तु को वापस ले सकता है और 

5 जितनी क़िस्तों को भुगतान पहले किया जा चुका है उसे संपत्ति का किराया भाड़ा समझा जा सकता है।

पट्टाधारी को पट्टा देने के लाभ

1 पट्टादारी पट्टा धारक को यह अवसर देता है कि वह बिना संपत्ति को क्रय किए उसका प्रयोग कर सकता है। 

2 पट्टे पर संपत्ति लेकर कार्य करने में संपत्ति के क्रय व्यवसाय में पट्टे पर संपत्ति लेकर व्यवसाय में उसकी स्थापना ऋनों के जोखिम से पट्टाधारी बचता है।
 
3 आधुनिक तकनीकों में तेजी से परिवर्तन के कारण संपत्ति के ऑपरेशन का जोखिम कम होता है और पट्टा धारक के लिए यह लाभप्रद होता है।

 4 बिक्री और पुनः उस संपत्ति को पट्टा पर लेने के कारण पट्टाधारक अपनी नकदी स्थिति को सुधारने योग्य हो जाता है ।

5 पट्टा एक प्रकार का वित्तीय समझौता होता है जिसका उल्लेख तो लेखांकन दृष्टि से होता है आर्थिक चिट्ठे में पट्टे दार के एक बोझ के रूप में होता है लेकिन संपत्ति के प्रयोग को गुप्त करके वह फर्म के ऋण द्वारा पूंजी निर्माण को प्रभावित नहीं करता।

 6 पट्टा किराया कर योग्य लाभों में सहायक होता है और पट्टा दाता को कर दायित्व में कमी करता है और पट्टा धारी के कर देनदारीयों को भी घटाता है। 

7 सेवा पट्टा या संचालन पट्टा पट्टेधारी को इस योग्य बनाता है कि पट्टा समाप्त कर दिया जाए। स्थिर संपत्ति को यह वित्त प्रदान करने का एक बहुत सुविधाजनक और लचीला तरीका है। 

8 पट्टे के अनुबंध में डिस्पोजल के विक्रय का कोई अनुबंध नहीं होता है ।

9 पट्टा समझौता के अंतर्गत यदि संपत्ति के रखरखाव का प्रवधान पट्टा दाता का हो तो पट्टा धारी को प्रशासनिक और रखरखाव के खर्च बसते हैं ।

हानियां 

1पट्टा धारी संपत्ति का मालिक नहीं है इसीलिए वह संपत्ति में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है ।

2 संपत्ति के स्वामित्व के कुछ भाग कुछ लाभ होते हैं जैसे ह्रास और निवेश जिनसे पट्टाधारी वंचित रहता है ।

3 यदि पट्टा धारी पट्टे का समापन समय से पहले करता है तो उसे पेनल्टी देना पड़ता है ।

4 पट्टा धारी संपत्ति के अशिष्ट मूल्य से वंचित रहता है।

पट्टादाता को पट्टे से लाभ

1 कर दायित्व में कमी आती है 

2 पूंजी की लागत और उस पर उचित प्रत्यय प्राप्त होता है ।

3 पट्टे पर प्राप्त लागत और लाभ अन्य परियोजनाओं की अपेक्षा तेजी से लाभ देते हैं ।

4 लीजिंग कंपनियों द्वारा संपत्ति तरह के समझौते से पट्टादाता लाभ की स्थिति में होता है ।

हानियां

 1 पट्टादाता को उच्च प्रचलन का जोखिम उठाना पड़ता है ।

2 पट्टादाता को वर्तमान समय में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है ।

3 मुद्रास्फीति के कारण संपत्ति के मूल्य में कमी होती है इसके बावजूद भी पटादाता को पिछली लागत पर आधारित स्थिर किराया ही मिलता है। 

4 पट्टा व्यापार में जो निश्चित समय अंतराल पर किराए की राशि का भुगतान प्राप्त होता है उस राशि के प्रवाह में बाधाएं आती हैं

 5 पट्टा दाता को संपत्ति की लागत को प्राप्त करने में लंबा समय लग जाता है जो पट्टा किराए के रूप में प्राप्त होता है।
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भारत में लघु उद्योग

भारत में लघु उद्योग 

मित्रों जैसा कि हम जानते हैं कि भारत एक विकासशील देश है जिसकी की बढ़ती आबादी को देखते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों का बेरोजगारी को दूर करने में महत्वपूर्ण स्थान रखा गया है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की बुनियाद औद्योगिकरण की बुनियाद  लोहा और कोयला जैसे खनिज संपदाओं पर निर्भर करता है जिसपर अन्य औद्योगिक ढांचे का निर्माण होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात व्यापार और व्यवसाय में परिवर्तन होने से पाश्चात्य विदेशों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से हमारे संबंध बढे  लेकिन जो लघु और कुटीर उद्योग ग्रामीणों द्वारा अपनाए गए थे वह ज़मीनदोज हो गए।
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों के योगदान को नकारा  नहीं जा सकता है और वर्तमान समय में यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था की गतिशीलता  और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

हम यहां यह जानने का प्रयास करेंगे कि लघु उद्योग होता क्या है ?इसकी परिभाषा क्या है?

लघु उद्योग को परिभाषित करने के लिए 2 क्षेत्रों का चयन किया गया जिनमें निवेश को आधार मानकर  उनको वर्गीकृत किया गया-

1 सेवा क्षेत्र

2 निर्माण क्षेत्र

1 सेवा क्षेत्र

निवेश की राशि की सीमा 

10 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपए तक का निवेश कंपनी को स्थापित करने में।

2 निर्माण क्षेत्र

निवेश राशि की सीमा 

25 लाख  रुपए से लेकर 5 करोड़ रुपये तक का निवेश उद्योग लगाने में जमीन और बिल्डिंग को छोड़कर।
सन् 2020 से पूर्व उद्योगों काश्रेणीयन उद्यमी द्वारा उद्योग स्थापित करते समय निवेश की राशि से निर्धारित होती थी। 

किंतु 19 मई 2020 को उद्योगों के श्रेणीयन (अति लघु लघु और मध्यम श्रेणी) की परिभाषा को बदल दिया गया और नई परिभाषा में उद्योगों को उपरोक्त दो भागों में विभाजित ना करके विभाजन तीन श्रेणियों में निवेश और सालाना टर्नओवर के आधार पर किया गया।

सूक्ष्म उद्योग

 
निवेश.    रुपए एक करोड़ तक
टर्नओवर  रुपए 5 करोड़ तक


लघु उद्योग 

निवेश   रुपए एक करोड़ से अधिक 10 करोड़ तक 
टर्नओवर  50 करोड़ तक 

मध्यम उद्योग 


निवेश रुपए एक करोड़ से लेकर 20 करोड़ तक 
टर्नओवर रुपए 50 करोड़ तक

उद्योगों की प्रकृति के आधार पर लघु उद्योगों को न्यूनतम प्रकार वर्गीकृत किया गया है

1 खनन उद्योग
2 बड़े उद्योगों के सहायक उद्योग
3 पोषक उद्योग
4 निर्माण उद्योग
5 सेवक उद्योग

1 खनन उद्योग में खनन कार्य से संबंधित उद्योग आते हैं।

2 सहायक उद्योग में बड़े उद्योगों के लिए मशीन कलपुर्जे बनाने वाले उद्योग आते हैं।

3 पोषक उद्योग के अंतर्गत विशेष प्रकार के उत्पाद बनाने वाले उद्योग आते हैं जो उन उत्पादों और सेवाओं में विशेषता रखते हैं

4  निर्माण उद्योग वस्तुओं के निर्माण से संबंधित होते हैं।

5 सेवक उद्योगों के अंतर्गत यंत्रों के रखरखाव और मरम्मत का कार्य किया जाता है।

लघु उद्योग की विशेषताएं

1 यह एक व्यक्ति द्वारा संचालित होता है साझेदारी फर्म या कंपनी के रूप में होने पर भी या एक साझेदार या निर्देशक द्वारा संचालित होता है.
2 यह स्थानीय स्तर पर संचालित किया जाता है.
3 इसमें निवेश की रकम के साथ-साथ प्राप्त प्रत्यय की अवधि मध्यम उद्योग की तुलना में कम होती है.
4 यह उद्योग श्रम प्रधान होता है.
5 संतुलित क्षेत्रीय विकास में सहायक होता है और गांव से शहरों की ओर पलायन करने वाले श्रम को रोकता है.
6 इसे सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि भारत के आर्थिक विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है.
7 इसमें श्रम और प्रबंध के मध्य प्रत्यक्ष संबंध होता है.
8 बड़े उद्योग के पूरब के रूप में यह काम करते हैं बड़े उद्योगों के लिए आवश्यक कलपुर्जे तैयार करते हैं.

लघु उद्योग के उद्देश्य

1 रोजगार अवसरों का सृजन
2 पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित कर उसका विकास करना
3 स्थानीय संसाधनों का उपयोग करना और उन्हें गतिशील बनाना
4 जीवन स्तर में सुधार लाना
5 उपभोक्ताओं के मांग की पूर्ति करना

लघु उद्योगों के महत्व


1 रोजगार सृजन के महत्वपूर्ण स्रोत

लघु उद्योग ग्राम प्रधान होते हैं जिसमें श्रम का निवेश अनुपात अधिक होता है .भारत में पूंजी कम श्रम ज्यादा है इसलिए उद्योग द्वारा सहित रोजगार लाभदायक होते हैं.

2 कम पूंजी द्वारा स्थापित

अन्य उद्योगों की तुलना में इसमें कम पूंजी की आवश्यकता होती है .भारत जैसे देश के लिए कम पूंजी पर आधारित उद्योग की आवश्यकता है.

3 स्वरोजगार का माध्यम

लघु उद्योग स्थापित कर बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है और यह स्वरोजगार का एक शब्द बनता है.

4 आर्थिक सत्ता का विकेंद्रीकरण

इसमें उद्योगों पर स्वामित्व कुछ उद्योगपतियों का नहीं रहकर कई लोगों के हाथों में चला जाता है . इस प्रकार उद्योग केंद्र कितना होकर विकेंद्रीकृत हो जाता है.

5 संतुलित क्षेत्रीय विकास

लघु उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित करने पर स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार मिलता है और उनका पलायन रुकता है जिससे संतुलित क्षेत्रीय विकास होता है.

6 छोटी बचत ओं को गतिशील करना

लघु उद्योग छोटी वचनों को सृजित कर उनसे अतिरिक्त पूंजी का निर्माण करते हैं.

7 स्वतंत्र रोजगार के अवसर प्रदान करना
 लघु उद्योग स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं इन पर सरकार का नियंत्रण कम होता है अतः किसी व्यक्ति द्वारा एक उद्योग स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है.

8 कृषि पर आधारित

कृषि पर आधारित लघु उद्योग कृषकों के लिए अतिरिक्त आय का साधन होता है.

9 विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं

 लघु उद्योग के संचालन के लिए किसी विशेष शिक्षा या डिग्री की आवश्यकता नहीं है और ना ही विशेष तकनीकी से संबंधित जानकारी चाहिए इसे कोई भी व्यक्ति स्थापित कर सकता है.

10 विदेशों पर कम निर्भरता

लघु उद्योगों के सही संचालन के लिए कच्चा माल तकनीकी ज्ञान यंत्र पूंजी क्षेत्र आदि के लिए हमें विदेशों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होती है.

लघु उद्योगों की समस्याएं


1 लघु उद्योगों के संचालन में श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन उनके प्रशिक्षण और विकास के कम अवसर के कारण उनसे जितनी अपेक्षा की जाती है वह उतना योगदान नहीं दे पाते जिसके कारण उनकी आदर्श स्थिति अच्छी नहीं होतीहै। श्रमिक अशिक्षित होते हैं और आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में अ सक्षम होते हैं.

2 लघु उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति निरंतर नहीं होने के कारण इस में बाधाएं उत्पन्न होती हैं इसके चलते उनकी वित्तीय स्थिति जो पहले से ही छोटे आकार की होती है और कमजोर हो जाती है और उसकी लागत है बढ़ जाती हैं.

3 लघु उद्योगों को स्थापित करने के लिए स्थापित बैंकिंग संस्थाएं और अन्य वित्तीय संस्थानों के द्वारा पर्याप्त मात्रा में ऋण की सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाती है जिसकी वजह से ऊंचे ब्याज दरों पर इन उद्योगों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है रियायती दरों पर कुछ संस्थाओं के द्वारा विशेष सुविधाएं दी जाती हैं फिर भी  मध्यस्थों की भूमिका के कारण यह सहज तरीक से उद्यमियों को नहीं मिल पाता है।

4 लघु उद्योगों के पास आधुनिक मशीनों और सामान की 
आपूर्ति की समस्या होती है जिसके चलते इन्हें उत्पादन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है इन्हें पुरानी मशीनों पर ही निर्भर करना पड़ता है जिसके कारण उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित होती है.

5 अत्यधिक संख्या में छोटे फर्म  का होना

सरकार द्वारा रियायत अनुदान का फायदा उठाने के लिए अत्यधिक संख्या में लघु इकाइयों की स्थापना कर दी जाती है और उस धन का प्रयोग किसी और क्षेत्र में किया जाता है।

6 पुरानी प्रौद्योगिकी

सरकार द्वारा या अन्य संस्थाओं द्वारा प्रौद्योगिकी सहायता न मिलने के कारण लघु उद्योगों के पास आधुनिक टेक्नोलॉजी नहीं होती जिसके चलते इनके किस्म और स्तर में कमी होती है विकास कार्यक्रम इनके खर्ची ले होते हैं और भारतीय और विदेशी लघु उद्यमों के बीच तालमेल स्थापित कर पाना  मुश्किल हो जाता है.
7 अनुप्रयुक्त स्थान

लघु उद्योगों में प्लांट एंड मशीनरी की आवश्यकता होती है लेकिन स्थान की समस्या के कारण या स्थान के चयन में छुट्टियों के कारण अनुपयुक्त स्थान पर उसकी उसको स्थापित कर दिया जाता है जो निकट भविष्य में उनके लिए समस्याएं  पैदा करता है.

8 विपणन सुविधाओं की कमी

लघु आकार के इकाइयों के पास पर्याप्त साधन की कमी होने के चलते और आर्थिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण विपणन  में कमी होती है और प्रमाणीकरण का अभाव होता है जिसके चलते इन्हें प्रतिस्पर्धा में कठिनाई का सामना करना पड़ता है.

उपरोक्त समस्याओं के निदान

1 लघु उद्योगों द्वारा अपने श्रमिकों को उचित शिक्षण प्रशिक्षण के द्वारा उनके गुणवत्ता और कौशल को बढ़ाया जाना चाहिए और प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रमों पर वह किया जाना चाहिए.

2 प्रभावी नियोजन द्वारा उत्पादन कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए और उसके अनुसार योजनाएं बनाकर उसे क्रमबद्ध तरीके से लागू करना चाहिए.

3 उत्पादन के लिए प्रयुक्त प्लांट और मशीनरी के आधुनिक तरीके को आधुनिक प्रौद्योगिकी को अपनाना चाहिए.

4 राज्य सरकार के विभिन्न संस्थाओं से राज्य विकास निगम लघु उद्योग निगम राज्य तकनीकी सलाह संगठन इन सभी को आपस में तालमेल स्थापित करते हुए उनके विकास और स्थापना के लिए कार्यरत रहना चाहिए.

5 उद्योग स्थापित करने के बाद में कच्ची सामग्री की नियमित आपूर्ति की व्यवस्था होनी चाहिए

6 उद्योग स्थापित करने के लिए आवश्यक वित्त की व्यवस्था परंपरागत साधनों के अतिरिक्त अन्य वैकल्पिक साधनों द्वारा होनी चाहिए.
 
7लघु इकाइयों के ब्रांडिंग लेबलिंग विपणन की व्यवस्था पर सरकार को ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इन वस्तुओं के विपणन के लिए आवश्यक बाजार उपलब्ध कराना चाहिए.

सरकार द्वारा किए जाने वाले उपाय

1 लघु उद्योगों की सहायता के लिए सरकार द्वारा अनेक संस्थाएं स्थापित किए गए हैं जो इस प्रकार हैं
 कुटीर उद्योग बोर्ड 
राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम
 खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड 
केंद्रीय विपणन संस्थान
 जिला उद्योग केंद्र
 क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र 
अखिल भारतीय हस्तकला एवं हथकरघा बोर्ड इत्यादि.

2 लोगों को लाइसेंस और विपणन संबंधित विषयों पर एक ही स्थान पर सुविधाएं प्रदान करने के लिए जिला उद्योग केंद्र स्थापित किए गए हैं जो राज्य के प्रत्येक जिले में स्थित है.


3 लघु उद्योगों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा अनेक उपाय किए गए हैं जिसमें राज्य की संस्थाएं और बैंकिंग संस्थाओं के अलावा भारत सरकार के कई संस्थाएं कार्यरत हैं राज्य वित्त निगम क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक सहकारी बैंक सभी भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशन एवं मार्गदर्शन में ऋण गारंटी योजना के माध्यम से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती हैं और उदार दरों पर ऋण देती हैं.

4 उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा लघु उद्योग क्षेत्र स्थापित किए गए हैं जहां पर सरकार द्वारा जमीन मुहैया कराई जाती है और उन्हें स्थापित करने के लिए सारी बुनियादी सुविधाएं दी जाती है. इसके अलावा जो महत्वपूर्ण सुविधाएं हैं वह ऋण प्रदान  करना जो सरल किस्तों में चुकाने होते हैं.

5 लघु और कुटीर उद्योगों को सरकार द्वारा करों में छूट दी गई है जिसके कारण यह रियासतों और लाखों का लाभ उठाकर विकास करते हैं.

6 लघु उद्योग के उत्पादों के वितरण के लिए प्रयासों के अंतर्गत देशभर में कई वाणिज्यिक केंद्र स्थापित किए गए हैं उनके विक्रय को बढ़ावा देने के लिए कुटीर उद्योग वाणिज्य केंद्र भी स्थापित किया गया है

7 सिडबी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य लघु आकार के उद्योगों का संवर्धन, उनका विकास करना है . सिडबी द्वारा देश में  लघु उद्योग के विकास और संवर्धन  कार्यों का संचालन किया जाता है. इसके लिए उसके द्वारा बहुत से कार्यक्रम चलाए जाते हैं जैसे ग्रामीण औद्योगिक कार्यक्रम , उद्योग साधना, महिला विकास निधि योजना, ग्रामीण उद्यमिता विकास कार्यक्रम इत्यादि. 









Mutual funds पारस्परिक निधियां

पारस्परिक निधि Mutual fund

पारस्परिक निधि एक संस्था है जो वित्तीय मध्यस्थ की भूमिका निभाता है ।यह जनता के बचत को इकट्ठा कर कंपनियों के विभिन्न प्रतिभूतियों में इस प्रकार विनियोग करता है कि निवेशक को लगातार रिटर्न मिलता रहे और जोखिम भी कम हो ।
SEBIअधिनियम 1996 के अनुसार ,

"पारस्परिक निधि एक कोष है जो ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया जाता है ताकि वह जनता को इकाइयों को बेचकर मुद्रा अर्जित कर सके।
वह एक या एक से ज्यादा स्कीमों के प्रतिभूतियों में  विनियोग करने से संबंधित हैजिसमें मुद्रा बाजार भी शामिल है। "

भारत में सबसे पहले 1964 में यूटीआई द्वारा पारस्परिक निधि का काम शुरू किया गया। पारस्परिक निधि को विनियोग ट्रस्ट, बनियोग कंपनी के रूप में भी जाना जाता है। इसे यूएसए में विनियोग ट्रस्ट कहा जाता है। निवेशकों के जरूरत के हिसाब से पारस्परिक निधियों को पांच भागों में बांटा गया है

 1 स्वामित्व के आधार पर 

इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की पारस्परिक निधियां और निजी क्षेत्र की पारस्परिक निधियां शामिल होती हैं ।

2 कार्य योजना के अनुसार 

इसमें खुली अंतिम योजना ,बंद अंतिम योजना और अंतर योजना शामिल है ।

3 पोर्टफोलियो के अनुसार 

इसमें आय कोष ,वृद्धि कोष, परिवर्तन विरोधी कोष, समता कोष, बांड कोष, विशिष्ट कोष ,उत्तोलक कोष, कर निर्धारण कोष, इंडेक्स फंड ,मुद्रा बाजार की पारस्परिक निधियां शामिल होती हैं। 

4 स्थापना के अनुसार 

इसमें घरेलू कोष औरऑफ शोर कोष शामिल है ।

5 बाजार पूंजीकरण के अनुसार

बाजार पूंजीकरण के अनुसार इसे तीन भागों में विभक्त किया जाता है लघु ,मध्यम और वृहद पूंजी वाले पारस्परिक निधियां।

पारस्परिक निधि के लाभ 

1 विभिन्न निवेशकों द्वारा जुटाए गए धन द्वारा पारस्परिक निधि प्रबंधक विभिन्न प्रतिभूतियों में इस प्रकार धन का विनियोग करते हैं जिससे जोखिम कई हिस्सों में बंटकर कम हो जाता है और उचित रिटर्न की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।

 २ छोटे बचतकर्ता है द्वारा पारस्परिक निधि में प्रयोग किया जाता है। पारस्परिक निधि के प्रबंधक बाजार विश्लेषक होते हैं जो विभिन्न प्रतिभूतियों की स्थिति को अच्छी तरह से जानते हैं उन प्रतिभूतियों में ही इन बचतों का निवेश इनके द्वारा किया जाता है। 

3 इनका लाभ यह है कि इस योजना में विनियोग करने पर जल्दी ही प्रतिभूतियों को नकद में बदला जा सकता है।

 4 इसमें अन्य प्रतिभूतियों की अपेक्षा जोखिम कम होता है ।

5 कई ऐसी योजनाएं हैं  जिसमें  पारस्परिक निधियों में ज्यादा पैमाने पर विनियोगकरनेपर बड़े पैमाने की बचत होती है जिससे लागत कम होता है और लाभ प्राप्त होता है ।

6 पारस्परिक निधि विनियोग लचीला होता है और जरूरत के अनुसार विनियोग किए गए राशि को निकाला जा सकता है।

7 सेबी द्वारा इसे सुरक्षा प्रदान की जाती है।

8 कुछ पारस्परिक निधियों में निवेश करने पर कर से राहत भी मिलती है।

भारत में पारस्परिक निधियां

भारत में पारस्परिक निधियों का विकास तीन चरणों में हुआ
 प्रथम चरण 1964 से 1987 तक का था जिसमें यूटीआई ही अकेला था। 
1987 में बैंकिंग विनियम अधिनियम द्वारा संशोधन करके भारत सरकार ने वाणिज्य बैंकों को पारस्परिक निधि शुरू करने की आज्ञा दे दी है।
वाणिज्यिक बैंकों द्वारा पारस्परिक निधि शुरू कर दिए जाने से हर प्रकार के समाज के बच्चों से पैसा इकट्ठा किया जाने लगा।
 एसबीआई ने भी 1987 में ही इसकी शुरुआत की। पीएनबी ने 1990 में ,एलआईसी ने 1989 में और जीआईसी ने 1990 में ही पारस्परिक निधि की शुरुआत की थी ।
कुल 31 पारस्परिक निधियों की शुरुआत यूटीआई को छोड़कर 1993 तक हुई जिसमें 10 सार्वजनिक समूह के और एक प्राइवेट क्षेत्र के थे।
1993 के बाद प्राइवेट संस्थाओं द्वारा पारस्परिक निधियों में प्रवेश किया गया ।
वर्तमान में पारस्परिक निधियोंके संपत्ति का 50% हिस्सेदारी इन्हीं संस्थाओं की है।

भारत में पारस्परिक निधियों की समस्याएं 

1 पारस्परिक निधियों में निवेश करने वाले जब किसी निधि से बाहर निकलना चाहते हैं तो उनके बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं होता बुरी डिलीवरी कई प्रकार की समस्याएं खड़ी कर देती है 

2 निवेशकों को आवश्यकता के मुताबिक पारस्परिक निधियों की कमी है। 

3 इन नदियों पर शोध की कमी के चलते इनके शोध के लिए वाहे स्रोतों पर निर्भर करना पड़ता है इस प्रकार पर्याप्त विकास के लिए यह आवश्यक है कि शोध एवं विकास पर भारत सरकार द्वारा या अन्य भारतीय संस्थाओं द्वारा मुद्रा खर्च की जाए ।

4 पारस्परिक निधियों द्वारा होने वाली हानि रक्षा की गारंटी नहीं दी जाती इसका कारण इसमें जोखिम होता है। 

5 इसमें विनियोगकों की शिकायतों का शीघ्र निपटारा करने में देर होती है ।

6जोखिम प्रबंध में कमी के कारण अपेक्षित रिटर्न  बनियोगर्को को मिल नहीं पाता।

विकास बैंक (Development Bank)

औद्योगिकरण के इस युग में उद्योगों को स्थापित करने और व्यवसाय विस्तार के लिए उन्हें आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है । इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पूंजी की व्यवस्था करना उद्योग जगत के लिए कठिन कार्य होता है । पूंजी की अल्पकालीन आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह मुद्रा बाजार की सहायता लेते हैं और दीर्घकालीन पूंजी के लिए पूंजी बाजार पर निर्भर करते हैं फिर भी बिना बैंकिंग संस्थाओं के सहयोग के उद्योग जगत अपनी पूंजी की व्यवस्था नहीं कर पाता। इस दृष्टि t से बैंकों की महत्ता काफी बढ़ जाती है इस ब्लॉक में विकास बैंक की चर्चा करेंगे किसी भी देश के आर्थिक विकास में विकास में की महत्वपूर्ण भूमिका होती है इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता है।
विकास बैंक क्या होते हैं इसे देखते हैं

विकास बैंक की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है विभिन्न विद्वानों द्वारा इसकी विशेषताओं को ही परिभाषित किया गया है अतः परिभाषा ओं के निष्कर्ष को ही प्रियता दी जाती है जो इस प्रकार है

विकास बैंक ऐसे वित्तीय संस्थान है जो उद्योगों को स्थापित करने के लिए उन्हें व्यवसाय विस्तार के लिए मध्यकालीन और दीर्घकालीन ऋण प्रदान करते हैं ।
यह उद्योगों को सलाहकार के रूप में और अन्य उद्यमी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

विशेषताएं

*औद्योगिक संस्थाओं के लिए मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन ऋण प्रदान करना ।

*आर्थिक विकास हेतु तकनीकी ज्ञान उपलब्ध करना ।

*नए क्षेत्रों में उद्योग लगाने हेतु वित्तीय सहायता उपलब्ध 
करना ।

*तकनीकी सहायता उपलब्ध करना ।

*पूंजी बाजार को प्रभावी घटक के रूप में गतिशील नेतृत्व प्रदान करना ।

*वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लाभ ऋण प्रदान और उनके संग्रह के बीच के पूरक ऋण उद्योग जगत को प्रदान
 करना।

*नए साहसी के सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना।

विकास बैंक के कार्य

*यह (gap filler )के रूप में कार्य करते हैं अर्थात जब औद्योगिक संस्थाओं को विशिष्ट या सामान्य स्रोत से वित्त उपलब्ध नहीं होते हैं तो यह बैंक उन्हें वित्त की पूर्ति करते हैं ।

*यह अंशपत्रों और ऋणपत्रों को खरीद कर उनका अभिगोपन करते हैं ।

*इनके वित्त के मुख्य स्रोत केंद्र सरकार, केंद्रीय बैंक और सार्वजनिक संस्थाएं होती हैं ।

*यह उद्योगों में कौशल निर्माण में सहायता करते हैं ।

*टेक्नोलॉजी से संबंधित परामर्श भी देते हैं ।

*सलाहकार के अतिरिक्त यह अन्य उद्यमी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

भारत में विकास बैंक

1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इसके सामने सबसे बड़ी समस्या पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था थी जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्षतिग्रस्त कर दिया था और गुलामी के कारण इसकी दशा काफी जर्जर हो चुकी थी। देश के विभाजन से भी अर्थव्यवस्था पंगु हो गई थी। तेजी से औद्योगिकरण में प्रगति करने के लिए और साथ ही साथ उद्योगों के आधुनिकीकरण और पुरानी मशीनों के प्रतिस्थापन की सख्त जरूरत थी। उस समय ऐसी एजेंसियों की आवश्यकता थी जो बड़े पैमाने पर उद्योग के लिए वित्त जुटा सके। इसकी पहल करते हुए भारत सरकार द्वारा 1948 में भारतीय उद्योग वित्त निगम की स्थापना की गई ।फिर 1955 में भारतीय औद्योगिक उधार एवं  निगम स्थापित किया गया। इसी प्रकार अन्य संस्थाएं भी स्थापित हुई।

भारत के शीर्ष विकास बैंक और उनकी स्थापना

भारतीय औद्योगिक साख तथा विनियोग निगम 1955 

भारतीय औद्योगिक विकास बैंक 1964 

भारतीय औद्योगिक विनियोग बैंक 1971

भारतीय औद्योगिक वित्त निगम 1982 

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक 1990 

राज्य स्तर पर राज्य वित्त निगम  1951 

राज्य औद्योगिक विकास बैंक     1960


इस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक देश में बहुत से विकास बैंक स्थापित हुए हैं जिनके कारण औद्योगिक विकास में काफी सहायता मिली है। औद्योगिक वित्त संस्थाओं द्वारा उद्योगों को दी जाने वाली स्वीकृति और वितरित राशियों में निरंतर वृद्धि हुई है जो देश के वर्तमान स्वरूप का कारण हैं।

personal selling

पिछले ब्लॉग में हमने सेल्समैनशिप और सेलिंग स्टॉक के बारे में जाना। इस ब्लॉग में हम पर्सनल सेलिंग यानी व्यक्तिगत विक्रय के बारे में जानेंगे।
 
पर्सनल सेलिंग क्या होती है 

सामान्य अर्थ में पर्सनल सेलिंग से कोल्हार्टा में पर्सनल सेलिंग से होता है। विभिन्न वैराइटी ने पर्सनल सेलिंग की परिभाषा इस प्रकार दी है 

अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन के, "पर्सनल सेलिंग प्रतियोगिता के माध्यम से व्युत्पत्ति के उद्देश्य से क्रेता के समसामयिक सामान और सेवाओं का एक प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण है। यह क्रेता की सहमति प्राप्त करने की योग्यता है जिससे एक या क्रेटा सामान और सेवाओं का लाभ ले सके तो दूसरी ओर विक्रेता को भी फायदा हो।

 स्टैंटन के, "पार्सनल सेलिंग में वैयक्तिक संचार द्वारा वैयक्तिक संचार को शामिल किया जाता है, जो विज्ञापन के अनुसार वैयक्तिक संचार के तरीके, वैयक्तिक दृष्टि और अन्य संचार संगम के विपरीत होता है।

उत्साह 

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वैयक्तिक विक्रय अर्थात वैयक्तिक विक्रय के अंतर्गत विक्रयकर्ता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से आविष्कार से संपर्क कर अपनी वस्तु को उद्यम या क्रेता की सहमति लेकर उसे बेचने का प्रयास किया जाता है या उसे प्रेरित किया जाता है।

व्यक्तिगत सेलिंग की वास्तविक परिभाषाओं से निम्न विशेषताएँ प्रकट होती हैं 

1 पर्सनल सेलिंग के अंतर्गत मॅनेजर संचार होता है। 
2 पर्सनल सेलिंग विक्रय का एक तरीका है पर्सनल सेलिंग में क्रेता और विक्रेता की बिक्री सामने आती है।
3 इसके अंतर्गत वस्तु या सेवाएँ का बेचान किया जाता है।
4 विक्रेताओं द्वारा इसमें रीता को स्मारक पूरा करने के लिए उत्प्रेरित किया जाता है।
5 कृतियों में क्रेता के समसामयिक प्रस्तुत कर उनके प्रयोग के तरीके बताए गए हैं।
6. इसमें प्रत्यक्ष प्रदर्शन से ग्राहक वस्तुओं के प्रयोग से परिचित हो जाते हैं
7 शोधकर्ताओं की जिज्ञासा या संदेह का समाधान प्रत्यक्ष रूप से विखंडित किया जाता है।
8 यह द्विमार्गी संप्रेषण होता है। 
9 क्रेता और विक्रेता का संबंध मजबूत होता है।

व्यक्तिगत बिक्री का उद्देश्य 
1 भावी विंटेज को आकर्षित करना .
2 वस्तुओं और सेवाओं के प्रति प्रत्यक्ष रूप से शोध करना।
3 क्रेस्टों से प्रत्यक्ष रूप से मिले-जुले तत्वों के विखंडित केलिए इच्छा उत्पन्न करना।
4 अनन्तावस्तुओं का विश्वास अन्तःवस्तु उन्हें अव्यवस्थित करना।

पर्सनल सेलिंग का स्वभाव या कार्य

1 व्युत्पत्ति करना- इसके अंतर्गत नए विश्विद्यालय से संपर्क स्थापित कर नए ऑर्डर प्राप्त करना और पुराने विश्विद्यालय से पुनः आरंभ ऑर्डर प्राप्त करना शामिल होता है।

2 वैयक्तिकृत वैयक्तिक विज्ञापन जिसमें व्युत्पत्ति का प्रत्यक्ष प्रदर्शन और व्युत्पत्ति को सलाह शामिल होती है।

3 क्रेटा का रिकॉर्ड रखें और इसे बेकार ऑफिस में रखें।

4 विक्रयकर्ता को प्रशिक्षण देना .

5 बाजार की स्थिति का अध्ययन करने के लिए प्रशासन को सुझाव दें 

6 वस्तुओं के प्रतिरूपों में रुचि पैदा करना और वस्तुओं के प्रयोग में आने वाली वस्तुओं के बारे में प्रशासन को जानकारी देना।

7 अपनी और संस्था की प्रतिष्ठा में विश्विद्यालय को बेहतर व्यवसाय में वृद्धि करना।

पर्सनल सेलिंग के प्रकार

पर्सनल सेलिंग के विभिन्न प्रकार हैं 

1 प्राप्त ऑर्डर करने वाले सेल्समैन ऑर्डर प्राप्त करने वाला विक्रेता
यह वैशिष्ट्यवादी नए उत्पादों को नई सेवा, नए विचार और नई वस्तुओं के लिए ग्राहकों के लिए हैं और आपके संपर्क कर ऑर्डर प्राप्त करते हैं।
 ऑर्डर प्राप्त करने वाले की तीन श्रेणियां हैं

एक निर्माता द्वारा आदेशित करने वाले से विक्रय पात्र औद्योगिक उपकरण और कच्चे माल से संबंधित चीजें प्राप्त होती हैं। 

बी थोक विक्रेताओं के लिए ऑर्डर प्राप्त करने वाले वे थोक विक्रेता में - थोक विक्रेताओं के लिए ऐसे थोक विक्रेता को नियुक्त करते हैं जो फुटकर विक्रेता से संपर्क कर ऑर्डर प्राप्त करते हैं।

C फ़ुटकर सामान के लिए ऑर्डर प्राप्त करने वाले विक्रयकर्ता-
यह विक्रेता फुटकर सामान के लिए ऑर्डर प्राप्त करते हैं।

2आदेश लेने वाले अनुचित कर्ता ऑर्डर ट्रैकिंग सेल्समैन
 वैयक्तिक व्युत्पत्ति का अधिकांश हिस्सा गैर-लाभकारी संस्थाओं द्वारा जारी किया जाता है।

ये तीन प्रकार के होते हैं
*निर्माता के 
*थोक व्यापारियों के 
*और फ़ुटकर विक्रेता के विक्रयकर्ता।

3 सहारा देने वाले 

 यह निर्माता-निर्माता के लिए काम करते हैं और अपनी कृति के मूल्य में सहारा देते हैं। यह व्युत्पत्ति के तकनीकी और उसके गुणों को प्रदर्शित करता है और वितरण में मदद करता है। 
ये दो तरह के होते हैं 
एक ऐसे व्युत्पत्तिकर्ता जो संस्था के लिए मांग पैदा करते हैं संस्था के प्रतिष्ठा में वृद्धि करते हैं और थोक थोक को प्रशिक्षण देते हैं। वाइट वाइट कर्ता भी कहा जाता है।
बी प्रौद्योगिकी जानकारी रखने वाले वेले कर्ता
 यह प्राय: इंजीनियर या वैज्ञानिक होते हैं। ग्राहक द्वारा आदेश प्राप्त कर वैट विक्रेता अपनी संस्था को क्रेटा की सामग्री के बारे में बताता है। संस्था द्वारा तकनीकी सेवाएं उपलब्ध करायी जाती हैं और उनके रहस्यों और संदेहों को दूर किया जाता है।


औद्योगिक इकाइयों का स्थानीयकरण

औद्योगिक इकाइयों के स्थानीयकरण का अर्थ 
एक उद्यम के स्थानीयकरण से आशय औद्योगिक इकाइयों के किसी विशेष स्थान अथवा क्षेत्र की ओर आकर्षित एवं केंद्रित होने से है। यह वह स्थान या क्षेत्र है जहां पर औद्योगिक उत्पादन के विभिन्न साधन सुलभता से उपलब्ध होते हैं। उदाहरण के लिए भारत का सूती वस्त्र उद्योग मुंबई और अहमदाबाद में ही केंद्रित है क्योंकि वहां पर अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा सूती वस्त्र उत्पादन के विभिन्न साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
एक उद्यम के स्थानीयकरण की परिभाषा

प्रोफ़ेसर डी एच रॉबर्टसन के अनुसार
"विशेष क्षेत्र के उद्योगों के आकर्षित होने केंद्रित होने तथा पनपने की प्रवृत्ति को ही एक उद्यम का स्थानीयकरण करते हैं ।" 

डॉक्टर पीएस लोकनाथन के अनुसार 
"एक उद्यम के स्थानीयकरण से अभिप्राय विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों के केंद्रीय करण से है जो अंतरराष्ट्रीय पहलू से क्षेत्रीय श्रम विभाजन का लाता है।"
 प्रोफेसर सुबीन के अनुसार " आदर्श उद्यम का स्थानीयकरण वही है जो वस्तु या सेवा के उत्पादन एवं वितरण की न्यूनतम प्रतीक आई लागत को संभव बनाता है" 

एस्प्रिनगरल एवं लेंस वर्ग के अनुसार "एक उद्यम का स्थानीयकरण प्राय: विरोधी सामाजिक ,आर्थिक, सरकारी एवं भौगोलिक कारणों के बीच तालमेल का परिणाम है।

 निष्कर्ष 

किसी क्षेत्र अथवा स्थान विशेष पर उद्योगों के आकर्षित होने ,केंद्रित होने एवं बढ़ते जाने की प्रवृत्ति को एक उद्यम का स्थानीयकरण कहते हैं।
एक उद्योग को प्रभावित करने वाले दो घटक प्राथमिक घटक और गौंण घटक होते हैं ।

प्राथमिक घटक 

इसमें उद्योगों के प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय वितरण प्रभाव डालते हैं इन्हें प्रादेशिक कारण भी कहा जाता है। इसमें कच्चे माल की आपूर्ति ,बाजारों से उद्योग की निकटता, श्रम की उपलब्धता, शक्ति स्रोतों की उपलब्धता यातायात और संदेश वाहन के साधनों की निकटता, वित्त की उपलब्धता आते हैं।

गौण कारण या घटक 

यह वे घटक होते हैं जो कि उद्योगों के पुन: वितरण पर केंद्रीकरण एवं विकेंद्रीकरण कृतियों द्वारा प्रभाव डालते हैं। इसके अंतर्गत राजकीय नियम, प्राकृतिक साधन और जलवायु संबंधी सुविधाएं ,प्रतियोगी उद्योग, पूरक उद्योग और व्यक्तिगत घटक शामिल होते हैं। यहां पूरक उद्योग का अर्थ है ऐसे उद्योग जिन पर मुख्य उद्योग अपने सामग्री के लिए निर्भर करता है।

उद्योग के स्थानीयकरण के महत्त्व या लाभ 

1 पूंजी विनियोग में कमी 
उद्योग का स्थान निर्धारण पूंजी  के विनियोग में पर्याप्त कमी करता है क्योंकि कच्चे माल की आपूर्ति और ईंधन की आपूर्ति कम लागत पर ही उस स्थान पर प्राप्त हो जाती है.
 
2 साधनों का अनुकूलतम उपयोग 
आदर्श स्थान निर्धारित होने पर साधनों का अनुकूलतम उपयोग संभव हो जाता है.

3 संचालन व्यय में कमी 
उद्योग की स्थापना से कच्चा माल, परिवहन, श्रम ,इंधन उपकरण, मरम्मत ,सामग्री आदि की सुविधा समीप ही उपलब्ध हो जाती है. परिणास्वरूप संचालन व्यय में कमी आती है.
 
4 लाभ में वृद्धि 
सभी प्रकार की लागतो में कमी और कुशल उत्पादन के कारण प्रति इकाई लागत में कमी आती है जिससे लाभ की मात्रा में वृद्धि होने की संभावना रहती है.
 
5श्रम की उपलब्धता 
एक उद्योग के स्थानीयकरण में कुशल श्रम की उपलब्धता का महत्वपूर्ण स्थान होता है दूर-दूर के श्रमिक ऐसे स्थानों पर आकर्षित होते हैं ।

6 अनुसंधान सुविधाओं का विकास 
कोई उद्योग जब एक ही स्थान पर स्थापित होते हैं तो यह मिलकर संयुक्त रूप से अनुसंधानसाला की स्थापना कर लेते हैं जहां औद्योगिक अनुसंधान में कमी हो जाती है।
 
7 संतुलित क्षेत्रीय विकास 
औद्योगिक स्थान सरकारी नीतियों के अनुरूप होने पर देश में संतुलिविकास को बल मिलता है और पिछड़े क्षेत्रों में विकास होता है । उद्योग के एक ही स्थान पर स्थापित हो जाने से उस स्थान की ख्याति बढ़ जाती है ।उद्योग के नाम से माल का विक्रय होने लगता है ।जैसे अलीगढ़ के ताले,आगरा के चमड़े के जूते इत्यादि 

8 सुरक्षा में वृद्धि 
आदर्श स्थान होने पर वहां बाढ़ ,अग्नि, विदेशी ,आक्रमण चोरी, डकैती आदि से सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है। यहां बीमा कंपनियां भी उन्हें बीमा की सुरक्षा प्रदान करती है।

Approaches of selling process

 विक्रय प्रक्रिया के अंतर्गत विक्रय कर्ता द्वारा अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न प्रकार के विक्रय दृष्टिकोण को अपनाना पड़ता है क्योंकि ग्राहकों की मनोंृतया ,स्वभाव, आय, रहन सहन सभी चीजों को विक्रय कर्ता  द्वारा ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इनको देखते हुए हम पांच प्रकार के विक्रय दृष्टिकोण को अपना सकते हैं ।

1 मित्र दृष्टिकोण 

इस दृष्टिकोण के अंतर्गत संगठनात्मक संरचना में विपणन गतिविधियो में सहायता करने के लिए कम से कम 2 लोगों को एक साथ रखा जाता है जिनमें मैत्रीपूर्ण संबंध होते हैं और यह विपणन के काम को आसान बना देते हैं।

 इसमें यह धारणा भी शामिल होती है कि कोई भी व्यक्ति अपने करीबी दोस्त के साथ ही व्यापारिक संबंध बनाना चाहता है जिसके बारे में वह व्यक्तिगत रूप से जानता है । संबंधों में किसी प्रकार का दिखावा हो तो यह विपणन कार्य में बाधक होता है । एक और चीज स्पष्ट करना अनिवार्य है कि विपणन कर्ता यदि व्यक्तिगत रूप से ग्राहकों के साथ संपर्क करता है तो उसमें मैत्रीपूर्ण आत्मीयता की भावना का होना अनिवार्य है ।

2 समाधान दृष्टिकोण 

इसके अंतर्गत विक्रय करता को ध्यान से ग्राहकों को सुनना होता है उससे कुछ प्रश्नों के द्वारा उसकी आवश्यकता ओं को जानने का प्रयास किया जाता है और फिर ग्राहक को वस्तु क्रय करने के लिए सलाह दिया जाता है ।

यदि मुझे भारतीय अर्थव्यवस्था के पुस्तक की आवश्यकता है और किताब विक्रेता द्वारा पुस्तक के लेखक के नाम और प्रकाशन के बारे में पूछे जाने पर मैं नहीं बता पाता तो पुस्तक विक्रेता द्वारा यह पूछना कि किस उद्देश्य से आप पुस्तक खरीदना चाहते हैं ,मैं उसे बताता हूं । वह मुझे सिविल सर्विसेस की किताब खरीदने की सलाह देता है।मेरे द्वारा वह पुस्तक खरीद ली जाती है उसे पढ़ने के साथ ही उस पुस्तक की भाषा और लेखन शैली मुझे काफी प्रभावित करती है इस प्रकार मेरे सामने जो पुस्तक ख़रीद को लेकर समस्याएं उत्पन्न हुई थी उसे विक्रय करता द्वारा काफी अच्छे तरीके से समाधान किया गया। 

3 गुरु दृष्टिकोण 

इसके अंतर्गत आप अपने को एक विश्लेषक और तार्किक व्यक्ति के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं जिसमें बौद्धिक क्षमता के द्वारा समस्याओं के समाधान करने और सलाहकार की भूमिका निभाने की क्षमता होती है । इस प्रकार के दृष्टिकोण रखने वाला सेल्सपर्सन एक मोटीवेटर के रूप में अपना काम करता है और बहुत सारे रेफरल बनाता है जो इसे फॉलो करते हैं । 

इसके अलावा एक सेल्सपर्सन अपने क्षेत्र का अच्छा जानकार होता है जिसे अपने क्षेत्र के विभिन्न चुनौतियां का सामना करने का अच्छा अनुभव होता है।

4 परामर्शदात्री बिक्री दृष्टिकोण

सामान्यतः तकनीकी से संबंधित विक्रय के लिए इसका विशेष महत्व होता है ।इसमें विक्रय कर्ता अपने ग्राहकों के साथ मित्रता और विश्वसनीयता के संबंध स्थापित करता है। अपनी समझ ज्ञान और अनुभव द्वारा वह ग्राहकों के समस्याओं का विश्लेषण कर उसे उचित परामर्श देता है। 

5 ग्राहक  व्यक्तित्व दृष्टिकोण 

इसके अंतर्गत एक विक्रय कर्ता खरीदार के प्रकार के अनुसार अपने विक्रय दृष्टिकोण को अपनाता है | पहले वह खरीदार को परखता है उसके बाद वह विक्रय के उस तरीके को अपनाता है जो उसे अधिक प्रभावित कर सकता है | 

मान लीजिए ए और बी दो मित्र हैं | ए पेशे से एक साइकल विक्रय कर्ता है जबकि बी एक शिक्षक है | ए द्वारा बी को साइकिल खरीदने की सलाह दी गई। ए ने साइकिल खरीदने के लिए बी पर जोर नहीं दिया और ना ही उससे सहमति लेने का भी प्रयास किया । ए ने तुरंत हां ना करके 4 दिन पश्चात साइकिल लेने की इच्छा जाहिर की । ए साइकिल का एक विक्रय कर्ता था इसीलिए उसने बी को साइकिल बेच दी।

 यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि ए का बी के साथ घनिष्ठ संबंध था इसलिए वह एक पेशेवर के रूप में बी को साइकिल नहीं भेज सकता था ।

बी द्वारा इस बात की पुष्टि कर ली जाती है उन4 दिनों में कि ए द्वारा उसे उचित सलाह दिया गया है। इसलिए वह बी से ही साइकिल खरीदने की अपनी इच्छा जाहिर करता है। 

इस प्रकार उपरोक्त विक्रय दृष्टि को ध्यान में रखकर एक विक्रय कर्ता  विपणन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

selling process विक्रय प्रक्रिया

: विक्रय प्रक्रिया विपणन के अंतर्गत जो सम्मिलित क्रियाएं होती हैं इसका एक भाग है जो व्यवसाय में निरंतर चलता रहता है। इसमें संभावित ग्राहकों की पहचान से लेकर के ग्राहकों की संतुष्टि तक के समस्त कार्य को सम्मिलित किया जाता है। विक्रय प्रक्रिया  के निम्न चरण हैं 
1 पूर्वेक्षण करना 
2 पूर्व पहुंच 
3 रीच एवं प्रस्तुतिकरण 
4अभिनय 
5 समाप्ति समाप्ति
6 व्यसनों का उपचार 
7 समाप्ति या समाप्ति और 
8 अनुगमन

1 पूर्वेक्षण करना
अव्यवस्थित प्रक्रिया की यह सबसे पहली अवस्था है। इसमें यह दर्शाया गया है कि उस वस्तु की आवश्यकता वाले शब्द और संकेत हैं। इसका कारण यह है कि बिना आवश्यकता वाले या अयोग्य लोगों की ओर से अधिक प्रयास करने से बिक्री में वृद्धि नहीं होती है, विक्रेता का समय और परिश्रम कम हो जाता है और कोई आर्थिक लाभ भी नहीं होता है।

2 पूर्व पहुंच
जब वैराइटी को भावी वियेंटल का पता लगता है तो वैराइटी क्रिया की दूसरी अवस्था पूर्व पहुंच की आ जाती है। इससे क्रेता के संबंध में सामान्यता उसकी आयु, आयु, परिवार, मैत्री संबंध, रुचि में सभी की मित्रता का संबंध होता है। ऐसे साक्षात्कार से बातचीत करने वाला व्यक्ति इन साड़ियों में समय का विशेष ध्यान रखता है। उदाहरण के लिए अगर ग्राहक ने लिखा है तो बिना पढ़े ग्राहक की तुलना में कुछ और प्रकार का होगा। इसी प्रकार यदि एक तकनीकी ज्ञान वाला ग्राहक होगा तो उसके साथ व्यावसायीकरणकर्ता का व्यवहार दूसरा होगा।

3 रीच एवं प्रस्तुतिकरण
क्रेटा का पता लगाएं और उसके बारे में जानकारी प्राप्त करें इस बात की आवश्यकता है कि उस तक पहुंच जाए और वस्तु को प्रस्तुत किया जाए क्रेता तक पहुंच के कई तरीकों से संदर्भ शामिल है पहुंच, परिचय पहुंच, वास्तु पहुंच और उपभोक्ता लाभ पहुंच। 
संदर्भ रीच के अंतर्गत उपयोगकर्ता पुराने ग्राहक का कोई यह पत्र नोट ग्रह का नाम से लिखा है और फिर से लेकर वह ग्राहक के पास जाता है तो ऐसी रीच प्रसंग रीच कहलाती है 
पूर्व परिचय रीच 
जब कोई पत्र नहीं होता है तो वह इस तरीके को अपनाता है। इसमें ग्राहक का रेटिंग कर अपना परिचय दिया गया है और बताया गया है कि उसका नाम क्या है, वह किस कंपनी में काम करता है और किस सामान के लिए वह उसके पास आया है।
वस्तु पहुंच 
इसमें ग्राहक के पास की वैरायटी अपनी वस्तु को सामने रख देती है जिससे ग्राहक को उसके वैयक्तिक पात्र की भावना समझ में आ जाती है। 
उपभोक्ता लाभ पहुंच 
यह विधि आम तौर पर सामानों पर आधारित होती है। वस्तु से उपभोक्ता को क्या लाभ होता है इसकी जानकारी विक्रेता द्वारा उपभोक्ता को दी जाती है और उसे इसमें अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जाता है।

4
इसमें ग्राहक के संयोजन के रूप में एक नाटक का प्रदर्शन किया जाता है जिससे कि ग्राहक अपनी दृष्टि से प्रभावित हो और वस्तु को विखंडित करने के लिए लालायित हो जैसे कि जीवन बीमा का उद्देश्य जोखिम को सहन करना है जबकि बीमा धारक बीमाधारक ऐसा नहीं सोचता है। वह तो अपने आप को निश्चित काल तक जीवित रहने की बात करता है। वैसे ही समय बीमा कलाकार नाटक अपना खेलता है और अपने थैले में कुछ पत्रों के बारे में बताता है और बताता है कि नवयुवक की मृत्यु में मृत्यु किस प्रकार उसके परिवार को अंधेरे में डाल देती है यदि इस छात्र ने अपना जीवन बीमा करा लिया हो
तो परिवार वालों को इतना धन मिल जाता है कि वे अपने जीवन के रूप में काम कर सकते हैं।

5 समाप्ति समाप्ति
 जब विक्रेता ने अपनी बात का भुगतान कर दिया है और वस्तु का प्रदर्शन भी कर दिया है तो उसे अब इस बात का पता चल गया है कि ग्राहक ने वस्तु के बारे में निर्णय लिया है या नहीं। कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं जिनका विषय-वस्तु में पता नहीं चलता क्योंकि वह उस वस्तु पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते। ऐसी स्थिति में वैराइटी कलाकारों को ऐसे प्रश्न करने के लिए कहा जाता है, जिससे पता चलता है कि ग्राहक ने इसे तैयार किया है या नहीं। आपको कौन सा मॉडल पसंद है? आपको किस रंग को पसंद आएगा? आपके लिए किचन पैक कर दूं आदि।
6 व्यसनों का उपचार
 जब ग्राहक वस्तु को विक्रीटेड करने की स्थिति में नहीं होता या वस्तु पसंद नहीं आती तो वह विभिन्न प्रकार की व्यग्रताएं उठाता है। एक एवं अच्छे कुशल विचक्षण कलाकारों को क्रीड़ाओं से डरना नहीं चाहिए बल्कि अपने शिष्ट कला का प्रदर्शन करने वाले इन चरित्रों को दूर करने में ऐसा करना चाहिए जिससे कि ग्राहक नैतिक दृष्टि से दब जाए और क्रीड़ा करने का आदेश दे दे।

7 समाप्ति या समापन 
एक व्युत्पत्ति द्वारा ग्राहक का पता तब तक चलाया जाता है जब तक कि ग्राहक वस्तु को ग्राहकों की सुरक्षा के लिए पेश न कर दे।

8 अनुगमन
समाप्ति तिथि के अंत में इस बात की आवश्यकता होती है कि ग्राहक का अनुगमन किया जाए। अनुगमन में विभिन्न विशेषताएँ शामिल हैं जिनमें दो प्रमुख हैं एक ग्राहक को वस्तु उसके ऑर्डर के अनुसार मिल जाएगी और दो ग्राहक रहेंगे तो भविष्य में ऑर्डर मिलने की संभावना बनी रहेगी। समय-समय पर ऑनलाइन बिक्री नीति के तहत ऐसा किया जाता है कि ग्राहकों से दूसरे ग्राहकों की ओर से आकर्षित नहीं किया जाता है और गैर-लाभकारी ग्राहकों से ग्राहक हो जाते हैं।


उद्यमिता

  उद्यमिता  की परिभाषा उद्यमिता से आशय उद्यमी द्वारा किए जाने वाले  कार्यों  से है जिसमें उद्यमी किसी नए व्यवसाय को स्थापित करने से संबंधित ...